ईश्वर के दस आदेश : Ten Commandments

alice popkorn photo

कई शताब्दी पहले, ईश्वर ने पृथ्वी पर आकर जर्मन लोगों से कहा, “मैंने मनुष्यों के लिए कुछ आदेश बनाए हैं जिनके पालन से सबका भला होगा.”

जर्मन लोगों ने पूछा, “कैसे आदेश?”

ईश्वर ने कहा, “जीवन जीने के नियम.”

“आप कोई नियम बताइए?”

ईश्वर ने कहा, “तुम किसी की हत्या नहीं करोगे.”

“कोई हत्या नहीं? माफ कीजिए, हमें ऐसे नियम नहीं चाहिए.”

तब ईश्वर इटली के लोगों के पास गया और बोला, “मैंने कुछ आदेश बनाए हैं…”.

इटलीवालों ने भी उदाहरण के लिए कोई आदेश सुनना चाहा. ईश्वर ने कहा, “तुम चोरी नहीं करोगे.”

“चोरी नहीं करेंगे? नही, हमें ऐसे आदेशों में कोई रूचि नहीं है.”

फिर ईश्वर ने फ्रांसीसियों को भी आदेशों के बारे में बताया.

फ्रांसीसियों ने भी कोई एक आदेश सुनाने के लिए कहा. ईश्वर बोले, “तुम अपने पड़ोसी की पत्नी पर बुरी नज़र नहीं डालोगे.”

फ्रांसीसियों ने भी ऐसा आदेश सुनकर उन्हें ग्रहण करने से इंकार कर दिया.

अंत में ईश्वर ने यहूदियों को आदेशों के बारे में बताया.

“आदेश?”, यहूदियों ने कहा, “ये कितने के हैं?”

“ये तो मुफ्त हैं”, ईश्वर ने कहा.

“तो हमें दस दे दो.”

(~_~)

Centuries ago, God came down, went to the Germans and said, “I have Commandments that will help you live better lives.”

The Germans ask, “What are Commandments?”

And the Lord says, “Rules for living.”

“Can you give us an example?”

God says, “Thou shalt not kill.”

“Not kill? We’re not interested.”

So God went to the Italians and said, “I have Commandments…”

The Italians wanted an example and the Lord said, “Thou shalt not steal.”

“Not steal? We’re not interested.”

Next the Lord went to the French saying, “I have Commandments…”

The French wanted an example and the Lord said, “Thou shalt not covet thy neighbor’s wife.”

And the French were not interested.

God then went to the Jews and said, “I have Commandments…”

“Commandments,” said the Jews, “How much are they?”

“They’re free.”

“We’ll take 10.”

About these ads

4 Comments

Filed under Humor

The Rumor Mill – तीन छन्नियां

प्राचीन यूनान में सुकरात अपने ज्ञान और विद्वता के लिए बहुत प्रसिद्द था. सुकरात के पास एक दिन उसका एक परिचित व्यक्ति आया और बोला, “मैंने आपके एक मित्र के बारे में कुछ सुना है.”

“दो पल रुको”, सुकरात ने कहा, “मुझे कुछ बताने से पहले मैं चाहता हूँ कि हम एक छोटा सा परीक्षण कर लें जिसे मैं ‘तीन छन्नियों का परीक्षण’ कहता हूँ”.

“तीन छन्नियाँ? कैसी छन्नियाँ?”, परिचित ने पूछा.

“हाँ”, सुकरात ने कहा, “मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताने से पहले हमें यह तय कर लेना चाहिए कि तुम कैसी बात कहने जा रहे हो. किसी भी बात को जानने से पहले मैं यह तीन छन्नियों का परीक्षण करता हूँ. इसमें पहली छन्नी सत्य की छन्नी है. क्या तुम सौ फीसदी दावे से यह कह सकते हो कि जो बात तुम मुझे बताने जा रहे हो वह पूर्णतः सत्य है?

“नहीं”, परिचित ने कहा, “दरअसल मैंने सुना है कि…”

“ठीक है”, सुकरात ने कहा, “इसका अर्थ यह है कि तुम आश्वस्त नहीं हो कि वह बात पूर्णतः सत्य है. चलो, अब दूसरी छन्नी का प्रयोग करते हैं जिसे मैं अच्छाई की छन्नी कहता हूँ. मेरे मित्र के बारे में तुम जो भी बताने जा रहे हो क्या उसमें कोई अच्छी बात है?

“नहीं, बल्कि वह तो…”, परिचित ने कहा.

“अच्छा”, सुकरात ने कहा, “इसका मतलब यह है कि तुम मुझे जो कुछ सुनाने वाले थे उसमें कोई भलाई की बात नहीं है और तुम यह भी नहीं जानते कि वह सच है या झूठ. लेकिन हमें अभी भी आस नहीं खोनी चाहिए क्योंकि छन्नी का एक परीक्षण अभी बचा हुआ है. और वह है उपयोगिता की छन्नी. जो बात तुम मुझे बतानेवाले थे, क्या वह मेरे किसी काम की है?”

“नहीं, ऐसा तो नहीं है”, परिचित ने कहा.

“बस, हो गया”, सुकरात ने कहा, “जो बात तुम मुझे बतानेवाले थे वह न तो सत्य है, न ही भली है, और न ही मेरे काम की है, तो मैं उसे जानने में अपना कीमती समय क्यों नष्ट करूं?”

* * * * * * * * * *

In ancient Greece, Socrates was reputed to hold knowledge in high esteem. One day an acquaintance met the great philosopher and said, “Do you know what I just heard about your friend?”

“Hold on a minute,” Socrates replied. “Before telling me anything I’d like you to pass a little test. It’s called the Triple Filter Test.”

“Triple filter?”

“That’s right,” Socrates continued. “Before you talk to me about my friend, it might be a good idea to take a moment and filter what you’re going to say. That’s why I call it the triple filter test. The first filter is Truth. Have you made absolutely sure that what you are about to tell me is true?”

“No,” the man said, “actually I just heard about it and…”

“All right,” said Socrates. “So you don’t really know if it’s true or not. Now let’s try the second filter, the filter of goodness. Is what you are about to tell me about my friend something good?”

“No, on the contrary…”

“So,” Socrates continued, “you want to tell me something bad about him, but you’re not certain it’s true. You may still pass the test though, because there’s one filter left: the filter of usefulness. Is what you want to tell me about my friend going to be useful to me?”

“No not really …”

“Well,” concluded Socrates, “if what you want to tell me is neither true nor good nor even useful, why tell it to me at all?” This is why Socrates was a great philosopher & held in such high esteem.

10 Comments

Filed under दार्शनिक

सच : Truth

truth

स्पेन के अखबार “ला वेनगार्दिया” में यह छपाः

“सच क्या है?”, स्पेन की एक अदालत के न्यायाधीश जोसेप मारिया पिजुआन ने बलात्कार की शिकार एक 11 वर्षीय लड़की से अदालत में पूछा. जोसेप इस बात की तस्दीक कर लेना चाहते थे कि लड़की की बताई बातों में कहीं कोई उलझाव नहीं है. इस मामले में लड़की की ओर से पैरवी कर रही वकील को मन में यह खटका-सा लग रहा था कि लड़की कहीं कोई ऐसी बात न कह दे जो उसकी गवाही को कमज़ोर कर दे.

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान एक मौके पर न्यायाधीश ने लड़की से दार्शनिकतापूर्ण प्रश्न किया, “सच क्या है? क्या सच यह है कि तुम अपने साथ इस घटना के होने की कल्पना कर रही हो या वह है जो तुम्हारी वकील तुम्हें अदालत में बोलने के लिए कह रही है?”

लड़की कुछ पल के लिए ठहरी-सी रही, फिर उसने कहाः

“सच यह है कि उन्होंने मेरे साथ गलत काम किया”.

इस मामले से जुड़ी प्रसिद्ध न्यायविद जुफ्रेसा ने कहा कि उन्होंने अपने पूरे कैरियर में सच की इतनी सटीक और सरल परिभाषा पहले कभी नहीं सुनी.

(पाउलो कोएलो के ब्लॉग से)

(~_~)

I read the following piece of news in the Spanish newspaper “La Vanguardia”.
“What is truth? The President of the Court, Josep Maria Pijuan, had to check which of the versions of rape offered by the girl victim, 11-year-old J., was closest to reality. The lawyers attending the questioning did not believe that she would manage to avoid contradicting herself in her deposition.
“At a certain moment the judge asked a rather philosophical question: What is truth? Is it what you imagine or what they asked you to tell?”
The girl stopped for a minute, then she answered:
“Truth is the bad they did to me.”
“Lawyer Jufresa, a renowned and prestigious jurist, said that was one of the most brilliant definitions she had heard in her whole career.”
(from the blog of Paulo Coelho)

2 Comments

Filed under Uncategorized

गोबर : Bullshit

mathilda huhn by alice popkorn

एक मुर्गी खेत में बैल से बातें कर रही थी. वह बोली, “मैं उस पेड़ की ऊंची टहनी तक पहुंचना चाहती हूं, लेकिन मुझमें इतनी ताकत नहीं है.”

बैल ने कहा, “तुम्हें पता है, हमारे गोबर में बहुत पौष्टिक तत्व होते हैं. तुम इसे थोड़ा-थोड़ा रोज़ खाओगी तो तुममें ताकत आ जाएगी”.

मुर्गी ने गोबर में चोंच मारकर देखा और उसे यह वाकई पौष्टिक लगा. उसमें थोड़ी ताकत आ गई और वह पेड़ की निचली टहनी तक पहुंच गई.

अगले दिन उसने फिर थोड़ा गोबर चखा और वह पेड़ की दूसरी शाखा तक पहुंच गई.

गोबर खाते-खाते चार-पांच दिनों के भीतर मुर्गी में इतनी जान आ गई कि वह पेड़ की सबसे ऊपरी शाखा पर चढ़ बैठी. बदकिस्मती से किसान ने उसे कोई बुरी चिड़िया समझकर गोली से उड़ा दिया.

इस छोटी सी कहानी से मिलनेवाली सीख बहुत रोचक है जिसे नीचे मूल अंग्रेजी में पढ़ना ही सही होगा :)

(~_~)

A hen was chatting with a bull. “I would love to be able to get to the top of that tree,” sighed the hen, “but I haven’t got the energy.”

“Well, why don’t you nibble on some of my droppings?” replied the bull. “They’re packed with nutrients.”

The hen pecked at a lump of dung, and found it actually gave him enough strength to reach the lowest branch of the tree.

The next day, after eating some more dung, he reached the second branch.

Finally after a fourth night, the hen was proudly perched at the top of the tree. He was promptly spotted by a farmer, who shot him out of the tree.

Moral of the story: Bullshit might get you to the top, but it won’t keep you there.

7 Comments

Filed under Stories

भविष्यवेत्ता : A Future-teller

HKD Flickr
एक बहुत पूरानी यूनानी कहानी सुनाता हूं आपको. उन दिनों कहीं एक बहुत प्रसिद्ध भविष्यवेत्ता रहता था. एक दिन वह राह चलते कुएं में गिर गया. हुआ यूं कि वह रात के दौरान तारों का अवलोकन करते हुए चला जा रहा था. उसे पता न था कि राह में कहीं एक कुंआ है, उसी कुंए में वो गिर गया.
उसके गिरने और चिल्लाने की आवाज़ सुनकर पास ही एक झोपड़ी में रहनेवाली बुढ़िया उसकी मदद को वहां पहुंच गई और उसे कुंए से निकाला.
जान बची पाकर भविष्यवेत्ता बहुत खुश हुआ. वह बोला, “तुम नहीं आतीं तो मैं मारा जाता! तुम्हें पता है मैं कौन हूं? मैं राज-ज्योतिषी हूं. हर कोई आदमी मेरी फीस नहीं दे सकता – यहां तक कि राजाओं को भी मेरा परामर्श लेने के लिए महीनों तक इंतज़ार करना पड़ता है – लेकिन मैं तुमसे कोई पैसा नहीं लूंगा. तुम कल मेरे घर आओ, मैं मुफ्त में तुम्हारा भविष्य बताऊंगा”.
यह सुनकर बुढ़िया बहुत हंसी और बोली, “यह सब रहने दो! तुम्हें अपने दो कदम आगे का तो कुछ दिखता नहीं है, मेरा भविष्य तुम क्या बताओगे?”

(~_~)

I have heard an ancient story, it happened in Greece. A great astrologer, the most famous of those days, fell into a well. Because in the night he was studying the stars, walking on the road he forgot that there was a well by the side and fell into it.

The sound of his falling and his crying…. An old woman who lived in a hut by the side came out, helped him to get out of the well.

He was very happy. He said, “You have saved my life! Do you know who I am? I am the royal astrologer. My fee is very great — even kings have to wait for months to consult me — but for you I will predict your future. You come tomorrow morning to my house, and I will not take any fee.”

The old woman laughed and she said, “Forget all about it! You cannot see even two feet ahead — how can you see my future?”

6 Comments

Filed under Stories