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इस पेज पर कॉपीराइट/अनकॉपीराइट के विषय पर जो विचार व्यक्त किए गए हैं उन्हें मैंने लियो बबौटा के ब्लॉग ज़ेनहैबिट्स से लिया है. लियो बबौटा अपने ब्लॉग पर बताते हैं कि उन्होंने अपने विचारों पर अनकॉपीराइट करके प्रतिमाह बड़ी रकम कमाने के मौके खोना क्यों ठीक समझा. उनके कॉपीराइट संबंधित विचार यहां पढ़ें. उन्मुक्त जी ने भी अपने ब्लॉग में कॉपीराइट और ओपन सोर्स नीति पर बहुत अच्छी हिंदी पोस्टें लिखी हैं. ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर के बारे में मैंने हिंदी में इतनी जानकारीपूर्ण पोस्ट और कहीं नहीं पढ़ी है. यह है वह पोस्ट.

अनकॉपीराइट वर्तमान युग की अनूठी अवधारणा है. यह ज्ञान की सामग्री को प्राप्त करने और उसे दूसरों से बाँटने के मार्ग में आने वाले समस्त बंधनों से मुक्त है. इसे कई स्तरों पर लागू किया जा सकता है जहाँ रचनाकार को यह स्वतंत्रता होती है कि वह अपनी रचना पर कितना अधिकार रखे. यह मानव की स्वार्थगत लालसा पर नियंत्रण रखती है. ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर क्रांति इसी की देन है. मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह भविष्य में बहुत फूले-फलेगी.

इस ब्लॉग की समस्त सामग्री आपकी है. मुद्रित पुस्तक के रूप में इसका व्यावसायिक उपयोग करके धन अर्जित करना निषेध है, अन्यथा आप इसका किसी भी रूप में उपयोग कर सकते हैं. चाहें तो इसे बेहतर बनाने के लिए रूपांतरित/परिवर्तित भी कर सकते हैं. इसके लिए किसी प्रकार की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है. बस एक निवेदन है कि यदि आप सामग्री को कॉपी करके कहीं प्रयुक्त करें तो कृपया इस ब्लॉग का लिंक वहां पर दे दें. इससे ब्लॉग का प्रचार-प्रसार होगा.

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There are 13 comments

  1. aradhana

    मुझे भी ये कॉपीराइट की अवधारणा अच्छी नहीं लगती. मेरे पिताजी ने बचपन से हमें यही सिखाया था कि ज्ञान हमेशा बाँटने से बढ़ता है, तो इस पर ताला क्यों लगाया जाये? मैंने हमेशा अपने खुद के लिखे नोट्स अपने साथियों को बाँटे हैं. यहाँ तक कि आई.ए.एस. के लिये मेहनत से बनाये नोट्स भी. बस इतना किया कि वे कॉपी करके ओरिजिनल मुझे वापस कर दें, जिसे मैं औरों को दे सकूँ.
    खैर यह अपनी-अपनी व्यक्तिगत राय हो सकती है, पर मुझे ये पसन्द नहीं.

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  2. aadesh thakur

    अनकॉपीराइट पर यह मुझे एक नई बात सुनाई दी। फिलहाल मैंने आपकी बातों को देखा ही है बस। कोशिश करूँगा कि यह बात मैं अच्ची तरह से समझ लूँ। इस बारे में मैं कहूँ तो मैने लगातार महसूस किया है कि लोग डिप्लोमेटिकली अपनेआप को प्रस्तुत करते हैं। खासकर मेरे भारत महान में। मैं छत्तीसगढ़ रायपुर से संबंध रखता हूँ। बहुत से ऐसे कांसेप्ट हैं जिन पर मैंने यहाँ काम किया, जो यहाँ की ज़रूरतें थीं। लेकिन लोगों ने इनका उपयोग अपने आपको प्रस्तुत करने में किया और काफी तरक्की भी कर ली (अपनी)। न समाज, न शहर और न ही प्रदेश की। मेरी मंशा लोगों के लिए अच्छी चीजें करने की थी। बहरहाल, इतना ही कहूँगा कि आपकी जानकारी स्तुत्य है। इसका प्रसार मैं आने वाले समय में ही कर पाऊँगा। क्योंकि इस समय मैं रोजी रोटी के जुगाड़ में लगा हूँ। जल्द ही सारी व्यवस्थाओं को एक सिरा देने के बाद मैं अनकॉपीराइट के लिए जुट जाऊँगा।
    फिलहाल आपको मैं धन्यवाद ही दे सकता हूँ।

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  3. Sourav Roy

    जान कर सच में ख़ुशी हुई कि आप सभी लोग हिंदी भाषा के उद्धार के लिए तत्पर हैं | आप सभी को मेरी ढेरों शुभकामनाएं |

    मैं ख़ुद भी थोड़ी बहुत कविताएँ लिख लेता हूँ | उन्मुक्त जी को मेरी कविताएँ काफी पसंद भी आई थीं जिसे मैं अपना श्रेय मानता हूँ ! आप लोग मेरी कविताएँ यहाँ पर पढ़ सकते हैं- http://souravroy.com/poems/

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  4. Dalip vairagi

    निशांत जी यह बात सही है कि ज्ञान बाँटने के लिए होता है और इसे बंधना नहीं चाहिए . मेरी यहाँ आपसे यह जानने की इच्छा है कि जब कोई आपकी सामग्री को अपने नाम से छपवा लेता है और आपका नामोल्लेख तक नहीं करता है तब आपको कैसा महसूस होता है ? अभी किसी मित्र ने मेरे ब्लॉग के कुछ लेखों को फेसबुक पर नोट के रूप में खुद के नाम से चला दिया था . .. कोलेज के दिनों में मैंने एक नाटक लिखा था उसे शहर की ही एक रंग मण्डली ने किसी दूसरे शहर में अपने नाम से मानचित करके राष्ट्रीय स्तर का पुरूस्कार जीता था | उझे अखबार से पाता चला था . अपने लिखे पहले नाटक के पहले मंचन की खुशी कुछ इस तरह मुझ तक पहुंची थी . ऐसी स्थितियों से आप कैसे पेश आते हैं ?

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  5. Shravan Kumar Shukla

    दिलीप वैरागी जी.. यह गलत है कि आपके नाटक का मंचन करके कोई और पुरस्कार जीते.. पहली बात कि इस ब्लॉग का कामर्सियल उपयोग वर्जित है दूसरा आप मुद्रित नहीं करवा सकते.. कही अगर प्रयोग करते हैं तो ब्लॉग का लिंक देना होगा.. यह बात काफी अच्छी है . मै भी यही करता हूं. आप मेरा ब्लॉग भी देख सकते हैं .. ज्यादा समय नहीं दे पाता फिर भी कुछ बेहतर करने की इच्छा है .. http://www.jeewaneksangharsh.blogspot.com

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