गीत-ग़ज़ल-कविता

कविता – सौ बातों की एक बात है – रमानाथ अवस्थी

सौ बातों की एक बात है. रोज़ सवेरे रवि आता है दुनिया को दिन दे जाता है लेकिन जब तम इसे निगलता होती जग में किसे विकलता सुख के साथी तो अनगिन हैं लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं सौ… Read More ›

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना – कविता – नये साल की शुभकामनाएँ!

नये साल की शुभकामनाएँ! खेतों की मेड़ों पर धूल-भरे पाँव को, कुहरे में लिपटे उस छोटे-से गाँव को, नए साल की शुभकामनाएँ! जाते के गीतों को, बैलों की चाल को, करघे को, कोल्हू को, मछुओं के जाल को, नए साल… Read More ›

बच्चन – कविता – जो बीत गई सो बात गई

  जो बीत गई सो बात गई जीवन में एक सितारा था माना वह बेहद प्यारा था वह डूब गया तो डूब गया अम्बर के आनन को देखो कितने इसके तारे टूटे कितने इसके प्यारे छूटे जो छूट गए फिर… Read More ›

बच्चन – कविता – कोई बिरला विष खाता है

कोई बिरला विष खाता है! मधु पीने वाले बहुतेरे, और सुधा के भक्त घनेरे, गज भर की छातीवाला ही विष को अपनाता है! कोई बिरला विष खाता है! पी लेना तो है ही दुष्कर, पा जाना उसका दुष्करतर, बडा भाग्य… Read More ›

रमानाथ अवस्थी – कविता – जिसे नहीं कुछ चाहिए

जिसे नहीं कुछ चाहिए, वही बड़ा धनवान। लेकिन धन से भी बड़ा, दुनिया में इन्सान। चारों तरफ़ मची यहाँ भारी रेलमपेल। चोर उचक्के खुश बहुत, सज्जन काटें जेल। मतलब की सब दोस्ती देख लिया सौ बार। काम बनाकर हो गया,… Read More ›

अज्ञेय – कविता – मैंने आहुति बन कर देखा

  मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल… Read More ›

कैलाश वाजपेयी – कविता – ऐसा कुछ भी नहीं

ऐसा कुछ भी नहीं जिंदगी में कि हर जानेवाली अर्थी पर रोया जाए. काँटों बीच उगी डाली पर कल जागी थी जो कोमल चिंगारी, वो कब उगी खिली कब मुरझाई याद न ये रख पाई फुलवारी. ओ समाधि पर धूप-धुआँ… Read More ›

बच्चन – कविता – रीढ़ की हड्डी

  मैं हूँ उनके साथ,खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़ कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार कभी नही जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़ मैं हूँ… Read More ›

रामावतार त्यागी – कविता – एक भी आँसू न कर बेकार

एक भी आँसू न कर बेकार जाने कब समंदर माँगने आ जाए पास प्यासे के कुँआ आता नहीं है यह कहावत है अमरवाणी नहीं है और जिसके पास देने को न कुछ भी एक भी ऎसा यहाँ प्राणी नहीं है… Read More ›

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना – कविता – उठ मेरी बेटी सुबह हो गई

पेड़ों के झुनझुने, बजने लगे; लुढ़कती आ रही है सूरज की लाल गेंद। उठ मेरी बेटी सुबह हो गई। तूने जो छोड़े थे, गैस के गुब्बारे, तारे अब दिखाई नहीं देते, (जाने कितने ऊपर चले गए) चांद देख, अब गिरा,… Read More ›