तीन अपराधियों की कहानी

बहुत पहले किसी राज्य में तीन अपराधियों को राजा के सामने प्रस्तुत किया गया.

इन तीनों को नगर के चौक से चोरी करते हुए पकड़ा गया और नियमानुसार उन्हें मौत की सजा दी जानी थी. लेकिन राजा उन्हें जीवित रहने का एक अवसर देना चाहता था. इसलिए राजा ने उनसे कहा कि वे अपने बचाव के लिए उचित कारण बताएं. राजा को जिस अपराधी की अपील सबसे उपयुक्त लगेगी उसे वह अभयदान दे देगा.

इस योजना के अनुसार तीनों अपराधियों को अपनी सफाई में कुछ कहने के लिए एक-एक मिनट का समय दिया गया.

पहले अपराधी ने राजा के सामने दंडवत होकर कहा, “महामहिम, मैं मरना नहीं चाहता. मैंने सुना है कि आप बड़े दयालु हैं. कृपया मेरी जान बख्श दें.”

दूसरे अपराधी ने कहा, “हे राजा, मेरी तीन प्यारी छोटी बेटियां हैं. यदि मैं मर गया तो वे अनाथ हो जाएंगी और उनके साथ फिर न जाने क्या हो! कृपा करके मुझे जीवित रहने का अवसर दें.”

तीसरे अपराधी ने राजा से कहा, “राजन, आपके सामने आज अपराधी के रूप में मेरे खड़े होने का कारण यह है कि मैं अपनी मरणासन्न पत्नी के लिए दवा चुराने का प्रयास कर रहा था. वह आपके महल में सेविका है और शाही समारोह में दिन-रात काम करने के कारण वह थकान से बहुत बीमार हो गई. यदि आप मुझे अभयदान देते हैं तो आप वास्तव में दो व्यक्तियों को प्राणदान देंगे. मैं इसके लिए अपनी अंतिम सांस तक आपके कर्तव्यनिष्ठ सेवक के रूप में काम करूंगा.”

राजा ने पहले अपराधी को देखकर कहा, “इसे मृत्युदंड दे दो”. सैनिक उसे राजाज्ञा का पालन करने के लिए ले गए.

दूसरे अपराधी के लिए भी राजा ने यही निर्णय लिया. उसे भी मृत्युदंड के लिए ले जाया गया.

राजा ने तीसरे आदमी से कहा, “तुम जाने के लिए स्वतंत्र हो. मेरे पास सेवकों की कोई कमी नहीं है, इसलिए मुझे तुम्हारी सेवाएं नहीं चाहिए, लेकिन जाने से पहले मुझे बताओ कि तुमने जो कुछ भी कहा वह कितना सच है?”

उस आदमी ने राजा की आँखों में गहराई से देखते हुए कहा, “सच कहने वाले कभी झूठ नहीं बोलते”, और वह वहां से चला गया.


राजा ने केवल तीसरे आदमी के जीवन को ही क्यों चुना? क्या यह सिर्फ एक मनचाहा निर्णय था या इसमें कोई गहरी बात थी?

तीसरा आदमी इसलिए बच गया क्योंकि उसने अरस्तू के तीनों साधनों का उपयोग किया था.

पहले व्यक्ति ने केवल राजा के अधिकार का लाभ उठाने की कोशिश करके उसकी दया का पात्र बनने के लिए नैतिकता की अपील की.

दूसरे व्यक्ति ने अपने बच्चों का हवाला देकर और एक भावुक संबंध बनाकर नैतिकता और भावना की अपील की.

तीसरे व्यक्ति ने नैतिकता, भावना, और तर्क का उपयोग किया. सबसे पहले उसने अपनी पत्नी की बीमारी के लिए राज समारोह अर्थात राजा पर ही अप्रत्यक्ष रूप से दोषारोपण किया. फिर उसने तर्क का उपयोग करते हुए कहा कि उसे अभयदान देकर राजा न केवल दो व्यक्तियों के जीवन को बचाएगा बल्कि उसे एक कर्तव्यनिष्ठ सेवक की प्राप्ति भी होगी.

तो, मेरे प्रिय पाठक मित्रों, मुझे नहीं लगता कि आपको कभी असल जीवन में जीवन और मृत्यु के बीच चुनाव करने की स्थिति का सामना करना पड़े… ईश्वर करे ऐसा कभी न हो, लेकिन यदि आप दूसरों से अपनी बात मनवाने की इस त्रिस्तरीय नीति का उपयोग करेंगे तो आपको पराजय और असफलता का सामना नहीं करना पड़ेगा.

Photo by Angel Luciano on Unsplash

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