उन मोटीवेशनल गुरुओं से बचें जिनकी कथनी और करनी में अंतर है

भारत में पले-बढ़े हम सब लोग उस पुरानी कहानी के बारे में जानते हैं जिसमें एक पिता अपने बच्चे की गुड़ खाने की आदत छुड़ाने के लिए किसी महात्मा के पास ले जाता है. यह कहानी इतनी प्रसारित हो चुकी है कि इसमें हर नए-पुराने महापुरुष को महात्मा की जगह आरोपित कर दिया जाता है. मैंने इस कहानी में महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, यहां तक कि भगवान बुद्ध के बारे में भी पढ़ा है.

आपको कहानी पता होगी लेकिन एक अच्छी कहानी को बार-बार पढ़ने में भी रस आता है. तो यह रही वह कहानी:

एक बच्चा बहुत अधिक गुड़ खाता था. बच्चे के माता-पिता उसकी इस आदत से परेशान थे. एक दिन पिता बच्चे को गांव में रहनेवाले एक महात्मा के पास ले गया और उनसे अनुरोध किया कि वे बच्चे को गुड़ खाने से होने वाले नुकसान के बारे में बताएं और आदत छोड़ने के लिए कहें.

तो पिता ने महात्मा से कहा, “गुरुदेव, मेरा बालक 8 वर्ष का है और हम इससे बहुत प्रेम करते हैं. लेकिन वह बहुत अधिक गुड़ खाता है और इससे उसका स्वास्थ्य खराब हो रहा है. हमने हर तरह से उसकी आदत छुड़ाने की कोशिश की है लेकिन हम हार गए हैं. अब आप ही हमारी सहायता करें और उसकी बुरी आदत छुड़ा दें.”

लेकिन गुरु के उत्तर ने पिता को अचरज में डाल दिया. गुरु ने कहा, “तुम अभी वापस लौट जाओ और दो सप्ताह बाद आना.”

अब महात्मा से कौन किसी तरह की बहस या ज़िद करे. पिता-पुत्र अपने घर लौट गए.

दो सप्ताह के बाद वे महात्मा के पास दोबारा आए. महात्मा ने कहा, “अब ठीक है. अब हम इसकी आदत छुड़ा सकते हैं.”

पिता ने कहा, “गुरुदेव, लेकिन आपने इसके लिए हमें दो सप्ताह बाद आने के लिए क्यों कहा? आपने पहले कभी ऐसा नहीं किया.”

महात्मा ने कहा, “मैंने तुम्हें दो सप्ताह बाद आने के लिए इसलिए कहा क्योंकि मैं भी जीवन भर मीठा खाने की इस बुरी आदत से ग्रस्त रहा हूं. लेकिन जब मैं खुद ही अपनी आदत नहीं छोड़ सका तो तुम्हारे बालक को इसके लिए कैसे कहता! इन दो सप्ताहों में मैंने खुद अपनी आदत पर नियंत्रण किया है ताकि मैं तुम्हारे बालक को इसे छोड़ने के लिए प्राधिकार से कह सकूं.”

इस कहानी में महात्मा का जैसा चरित्र दर्शन होता है वैसा कहीं मिलना कठिन है. अब ऐसे लोग चिराग लेकर खोजने से भी नहीं मिलते. अब साधारण लोग ही नहीं बल्कि तथाकथित महान शिक्षक, गुरु, राजनेता, और संत भी कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं.

इंटरनेट और ब्लॉगिंग का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रह गया है. कुकुरमुत्तों की तरह सैंकड़ों-हजारों वेबसाइटें खुल गई हैं जहां ज्ञान की नदियां बहती हैं और जीवन में सफलता और प्रसन्नता हासिल करने के मंत्र साझा किये जाते हैं.

क्या इसमें कुछ बुराई है? वस्तुतः इसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि एक अच्छी बात किसी से भी सीखी जा सकती है. कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए थे और उनके गुरुओं में वेश्या, सांप, मांस नोचने वाला पक्षी, पतंगा और मकड़ी जैसे जीव भी शामिल थे.

फिर भी इसमें ऐसा कुछ है जिसके लिए इसकी आलोचना की जा सकती है. और वह बात यह है कि किसी भी व्यक्ति को कोई महत्वपूर्ण तथ्य या जानकारी तभी बांटनी चाहिए जब वह उसका अपने निजी जीवन में अनुपालन करता हो.

हम किसी ऐसे डॉक्टर के पास इलाज के लिए जाना पसंद नहीं करेंगे जो अपने स्वास्थ्य की देखभाल नहीं करता. हम अपने बालक को कोई खेल सीखने के लिए ऐसे कोच के पास कभी नहीं भेजेंगे जिसे उस खेल की तकनीकों का ज्ञान नहीं हो. क्या हम किसी ऐसे व्यक्ति की आर्थिक सलाहों को मानेंगे जो अपने पैसे गंवाकर बैठा हो?

आज दुनिया सेल्फ़-हेल्प गुरुज़, लाइफ़ कोचेस और उपदेशकों से भर गई है. हर व्यक्ति को यह लगता है कि वह बहुत कुछ जानता है और उसे दूसरों को यह बताने का हक है कि उन्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए.

ऐसा नहीं कि दुनिया में अच्छे शिक्षक और मार्गदर्शक नहीं हैं. हमें उनकी खोज करनी चाहिए और उनकी बातों पर ध्यान देना चाहिए. मोटीवेशन की फ़ील्ड में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन में बहुत विषम परिस्तिथियों का सामना किया है. वे अपनी प्रेरक पोस्टों में जीवनानुभव निचोड़ कर रख देते हैं. वे हमें जो कुछ भी करने के लिए कहते हैं उसमें सद्भावना होती है. वे हमें धोखे में नहीं रखते. वे अपने जीवन के ऐसे अनुभव भी हमसे बांटते हैं जिन्हें साधारण व्यक्ति सामने लाने से डरते हैं.

जिन लेखकों की कथनी-करनी में अंतर होता है उनके लेखन से परिपक्वता नहीं झलकती. वे लेखक भी नहीं बल्कि मूलतः कॉपी-पेस्ट प्रकृति के ब्लॉगर हैं. वे बहुत सारी बातें सही कहते हैं लेकिन उनके विषय के ज्ञान की कमी के कारण यदि हम उनकी किसी अनुचित सलाह को मान लें तो नुकसान उनका नहीं बल्कि हमारा ही होगा. खान-पान में बदलाव करके स्वस्थ रहने से संबंधित ऐसे बहुत से ब्लॉग हैं जिनमें दी जाने वाली सलाह शरीर को नुकसान पहुंचा सकती है. मोटीवेशन के क्षेत्र में भी यह उतना ही सच है.

उपदेश और सलाह देना सरल है. खूब सारी किताबें और ब्लॉग पढ़कर बहुत से लोगों के मन में मोटीवेशनल गुरु जैसा व्यक्ति बन जाने का वहम हो जाता है. लेकिन उपदेश कृत्रिम नहीं होने चाहिए. वे मन की गहराइयों से निकलने चाहिए. उनमें जीवन का गहन विश्लेषण होना चाहिए, ईमानदारी होनी चाहिए, उन्हें जीवन के अच्छे-बुरे अनुभवों द्वारा प्रमाणित होना चाहिए. यदि ऐसा नहीं है तो सब कुछ दिखावा है, छलावा है.

यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि जीवन कुछ और नहीं बल्कि सीखे गए कौशलों, अर्जित ज्ञान और प्राप्त अनुभवों का समुच्चय है. हम किसी विषय का ज्ञान पूरी तरह से होने का दावा तभी कर सकते हैं जब हमें उसके सैद्धांतिक ही नहीं बल्कि प्रायोगिक या व्यावहारिक पक्ष का भी ज्ञान हो.

आप जीवन में सफलता, समृद्धि, शांति आदि पाने के सूत्र उस व्यक्ति से लें जो आपका मेंटर बनने की योग्यता रखता हो. उसे ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसे युद्ध लड़ने की तकनीकों और रणनीतियों के बारे में जानकारी हो और जो गौलियों की बौछारों का सामना भी कर चुका हो क्योंकि:

“A little learning is a dangerous thing;
Drink deep, or taste not the Pierian  spring :
There shallow draughts intoxicate the  brain,
And drinking largely sobers us again.” – Alexander Pope

जो व्यक्ति हमेशा ज्ञान का प्रदर्शन कर रहा हो उससे सावधान रहें. उससे भी दूर रहें जो विषय और सिद्धांतों की जानकारी के बिना अभ्यास कर रहा हो. उस व्यक्ति की पहचान करें जिसका अपना निजी जीवन दर्शन हो, जिसे अनुभवजन्य ज्ञान हो, और वह दर्शन और ज्ञान उसके व्यक्तित्व से मेल खाता हो.

Photo by Johnny McClung on Unsplash

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