रसायनशास्त्र का संक्षिप्त व रोचक इतिहास

कुछ मायनों में हम यह कह सकते हैं कि मानव सभ्यता का इतिहास वास्तव में रसायनशास्त्र का इतिहास है. यह पदार्थ और इसके गुणधर्मों का इतिहास है. मनुष्य ने हमेशा से उसके आसपास मौजूद पदार्थों को पहचानने, उनका उपयोग करने, और उन्हें परिवर्तित करने का प्रयास किया है. मिट्टी के बर्तन बनानेवाले सबसे पहले व्यक्तियों ने अपने बर्तनों को चमकाने और सजाने के लिए रंगबिरंगे रत्नों और खनिजों का उपयोग किया. गडरियों, शराब और आसव बनाने वालों ने किण्वन (fermentation) की विधियों में सुधार करके चीज़, बीयर, और शराब बनाई. गृहणियों ने तेल और सोडा खनिज का उपयोग करके सबसे पहले साबुन बनाया. धातु गलानेवालों ने तरह-तरह की धातुओं को एक-साथ गलाकर देखा. तांबा और टिन को गलाकर उन्होंने कांसा बनाया. कारीगरों ने कांच बनाया और चमड़े का काम करनेवालों ने चमड़े को और अधिक मुलायम और उपयोगी बनाने के लिए तरह-तरह के प्रयोग किए.

कहा जाता है कि आठवीं शताब्दी ईसवी में जाबिर इब्न हय्यान (Jābir ibn Hayyān) नामक एक अरबी खगोलशास्त्री, दार्शनिक, और वैज्ञानिक ने पदार्थों के वैज्ञानिक पद्धति से अध्ययन करने की परंपरा की नींव डाली. उसे उसके लेटिन नाम जेबर (Geber) के द्वारा रसायनशास्त्र का पिता कहा जाता है. यह माना जाता है कि उसने अपनी 22 रचनाओं में आसवन (distillation), क्रिस्टलीकरण (crystallization), ऊर्ध्वपातन (sublimation), और वाष्पन (evaporation) की अनेक विधियों का वर्णन किया है. उसने अम्लों (acids) का अध्ययन और उनका आसवन करने की मशीन बनाई जिसे एलेम्बिक (alembic) कहते हैं. उसने ही सबसे पहले पदार्थों का उनके गुणों के आधार पर वर्गीकरण और अध्ययन करने की पद्धति खोजी. उसके द्वारा बनाए गए वर्ग इस प्रकार थेः

द्रव — वे पदार्थ जो गरम किए जाने पर भाप बन जाते थे.
धातु — कठोर पदार्थ जैसे लोहा, टिन, तांबा, सीसा आदि.
रेतीले पदार्थ — ऐसे पदार्थ जिन्हें पीसकर चूरा बनाया जा सकता है, जैसे पत्थर, कांच आदि.

यूरोप में रसायनशास्त्र का विधिवत अध्ययन सबसे पहले कीमियागरों (alchemists) ने किया जिनका एकमात्र उद्देश्य सामान्य धातुओं को सोने और चांदी में बदलना था. वे लंबा जीवन या अमरता देने वाले किसी रसायन या टॉनिक की भी खोज कर रहे थे. उनके ये उद्देश्य कभी पूरे नहीं हो पाए लेकिन उन्होंने तरह-तरह के प्रयोग किए जिनसे पदार्थों के बारे में जानकारियों में इजाफा होता गया. रसायनशास्त्र में अनेक बड़ी व महत्वपूर्ण खोजें उनके प्रयोगों के आधार पर हुईं.

Robert Boyle

रॉबर्ट बॉयल (Robert Boyle, 1627-1691) ने गैसों की प्रकृति और व्यवहार का अध्ययन करके यह खोज की कि किसी गैस के आयतन और दबाव में गहरा संबंध है. उसने यह गहरी बात भी कही कि “सभी वास्तविकताओं और परिवर्तनों को मूलभूत कणों और उनकी गतियों के माध्यम से समझाया जा सकता है,” जो कि परमाणु थ्योरी के बारे में कही गई पहली बात थी. उसने 1661 में रसायनशास्त्र की पहली पाठ्यपुस्तक लिखी जिसका नाम था “The Sceptical Cymist”. इस पुस्तक में भौतिक व रासायनिक पदार्थों को ईश्वरीय या कीमियागरी (alchemy) की छाया से दूर रखकर विशुद्ध वैज्ञानिक प्रकाश में देखा गया था.

Joseph Priestley

सन् 1700 तक यूरोप में ज्ञान के युग (Age of Enlightenment) का आरंभ हो चुका था. वैज्ञानिक जोसेफ प्रीस्टली (Joseph Priestley, 1733-1804) ने इस विचार को खारिज कर दिया कि हवा एक अदृश्य तत्व है. उसने प्रयोगों द्वारा दर्शाया कि हवा कई गैसों का मिश्रण है. उसने हवा से ऑक्सीजन को पृथक करके दिखाया और सात अन्य गैसों की खोज की. जाक चार्ल्स (Jacques Charles, 1746-1823) ने बॉयल के काम को आगे बढ़ाते हुए गैसों के ताप और दाब में परस्पर गहरे संबंध को दर्शाया.  1794 में जोसेफ़ प्रूस्त (Joseph Proust, 1754-1826) ने शुद्ध रासायनिक यौगिकों का अध्ययन किया और सुनिश्चित अनुपात का नियम (Law of Definite Proportions) प्रतिपादित किया जिसके अनुसार किसी भी रासायनिक यौगिक में इसके घटक तत्वों का अनुपात हमेशा विषिष्ट और स्थाई रहेगा. उदाहरण के लिए, पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का अनुपात हमेशा 2ः1 रहेगा.

Antoine Lavoisier

एंतोइन लेवोज़्जिए (Antoine Lavoisier, 1743-1794) फ़्रांसीसी रसायनशास्त्री थे जिन्होंने अनेक महत्वपूर्ण खोज और अविष्कार किए. टैक्स अधिकारी के रूप में काम करते हुए उन्होंने मीट्रिक पद्धति को विकसित किया ताकि नापतौल में होनेवाली गड़बड़ियों को दूर किया जा सके. बहुत कम उम्र में ही उन्हें फ़्रेंच विज्ञान अकादमी में सदस्य चुना गया था. इसके दो वर्ष बाद उन्होंने 28 वर्ष की अवस्था में अपने सहयोगी की 13 वर्षीय कन्या मेरी-एन लेवोज़्जिए (Marie-Anne Lavoisier) से विवाह किया. मेरी ने अपने पति को वैज्ञानिक कार्यों में सहयोग दिया और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पत्रों का अनुवाद किया. इसके अलावा मेरी ने वैज्ञानिक प्रयोगों को दर्शानेवाले चित्र भी बनाए.

लेवोज़्जिए ने मापन के क्षेत्र में शुद्धता को बल दिया जिससे वे द्रव्यमान संरक्षण नियम (Law of Conservation of Mass) की खोज कर सके. 1787 में लेवोज़्जिए ने रासायनिक नामकरण की विधियां (Methods of Chemical Nomenclature) नामक लेख छपवाया जिसके नियमों के आधार पर रखे गए रासायनिक यौगिकों के नामों को हम आज भी प्रयुक्त करते हैं. उसकी पुस्तक “Elementary Treatise of Chemistry” (1789) आधुनिक रसायनशास्त्र की पहली पाठ्यपुस्तक मानी जाती है. इसने पहली बार तत्व को पदार्थ के ऐसे रूप में बताया जिसके भार को रासायनिक क्रियाओं द्वारा बदला नहीं जा सकता. इस पुस्तक में पहली बार ऑक्सीजन, आयरन, कार्बन, सल्फर जैसे लगभग 30 तत्वों के बारे में बताया गया था. इस पुस्तक में कुछ गलतियां भी थीं, जैसे इसमें प्रकाश और ऊष्मा को भी तत्व बताया गया था.

Amedeo Avogadro

अमेदेओ एवोगाद्रो (Amedeo Avogadro, 1776-1856) इटालियन वकील थे. उन्होंने वर्ष 1800 में विज्ञान और गणित का अध्ययन प्रारंभ किया. उन्होंने बॉयल और चार्ल्स के काम से प्रेरणा लेते हुए परमाणुओं और अणुओं में अंतर को परिभाषित किया.  उन्होंने यह भी बताया कि एक समान ताप और दाब पर अलग-अलग गैसों के समान आयतन में अणुओं की संख्या समान होती है. किसी तत्व के 1 ग्राम आण्विक भार (1 मोल) में उपस्थित अणुओं की संख्या के मान को उनका नाम दिया गया है. परीक्षणों के द्वारा इसका मान 6.023 x 10²³ स्थापित किया गया है और यह रासायनिक प्रतिक्रियाओं में पदार्थों के द्रव्यमान को निर्धारित करने में प्रयोग में लाई जाती है.

John Dalton

1803 में एक अंग्रेज मौसमविज्ञानी जॉन डाल्टन (John Dalton, 1766-1844) ने जलवाष्प का गहराई से अध्ययन करना प्रारंभ किया. उन्हें यह पता था कि जलवाष्प वातावरण में उपस्थित थी लेकिन उनके प्रयोग यह दर्शा रहे थे कि जलवाष्प कुछ विशेष गैसों से नहीं बनती थी. उन्होंने यह अनुमान लगाया कि इसका कारण उन गैसों के कणों से संबंधित कोई विशेषता थी. शायद उन गैसों के पदार्थ में इतना स्थान नहीं था कि जलवाष्प उसमें समा पाती. या तो उन भारी गैसों के कणों के भीतर और छोटे कण थे या वे कण अधिक बड़े थे. उन्होंने अपने आंकड़ों और सुनिश्चित अनुपात के नियम का प्रयोग करते हुए 6 ज्ञात तत्वों (हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन, सल्फर, और फ़ॉस्फ़ोरस ) के कणों का भार निर्धारित किया. यह परमाण्विक सिद्धांत की स्थापना करनेवाली पहली बड़ी खोज थी. इसके अनुसारः

  • तत्वों का निर्माण अतिसूक्ष्म कणों से होता है जिन्हें परमाणु कहते हैं.
  • एक तत्व के परमाणुओं का आकार, भार और अन्य गुण एक समान होते हैं. अलग-अलग तत्वों के परमाणुओं के गुण भी अलग-अलग होते हैं.
  • परमाणुओं की रचना नहीं की जा सकती. उन्हें तोड़ा या नष्ट नहीं किया जा सकता.
  • भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणु एक सुनिश्चित अनुपात में संयुक्त होकर रासायनिक यौगिक बनाते हैं.
  • रासायनिक प्रतिक्रियाओं में परमाणु जुड़कर, अलग होकर, और अपना स्थान बदलकर नए यौगिक बनाते हैं.

Dmitri Mendeleev

दिमित्री मेंदेलीव (Dmitri Mendeleev, 1834-1907) रूसी रसायनशास्त्री थे जो तत्वों की आवर्ती सारणी के जन्मदाता के रूप में प्रसिद्ध हैं. उन्होंने उस समय तक ज्ञात 63 तत्वों को उनके रासायनिक गुणों के आधार पर चार्ट के रूप में दर्शाया. तत्वों को परमाणु भार के बढ़ते क्रम में जमाते समय उन्होंने देखा कि कुछ तत्व एक-दूसरे से बहुत अधिक समानता दर्शा रहे थे. कुछ अपवादों को छोड़कर हर सातवें तत्व (आठवें समूह के तत्व अक्रिय गैसों की तब तक खोज नहीं हुई थी) के रासायनिक गुणों में बहुत अधिक समानता थी. मेंदेलीव ने यह अनुभव किया कि उनकी सारणी में कुछ स्थान खाली छूट रहे थे और वहां कोई ज्ञात तत्व फिट नहीं बैठ रहे था. उन्होंने खाली स्थानों वाले अज्ञात तत्वों के भौतिक व रासायनिक गुणों का पूर्वानुमान उनके पड़ोसी तत्वों के गुणों के आधार पर लगाया. मेंदेलीव की आवर्ती सारणी में अब प्रकृति में मिलनेवाले 92 तत्व और मानव निर्मित 26 तत्वों को स्थान दिया गया है.

Henri Becquerel

1896 में हेनरी बैकुरेल (Henri Becquerel, 1852-1908) ने रेडियोएक्टीविटी की खोज की. मेरी और पियेर क्यूरी के साथ प्रयोग करके उन्होंने दिखाया कि कुछ तत्व निश्चित दर से ऊर्जा का उत्सर्जन करते हैं. इस खोज के लिए तीनों वैज्ञानिकों को सम्मिलित रूप से 1903 में नोबल पुरस्कार दिया गया. 1900 में मैक्स प्लांक ने यह खोज की कि ऊर्जा का उत्सर्जन सुनिश्चित यूनिट्स में होता है, जिसे उन्होंने क्वांटा (quanta) कहा. क्वांटा को अब फ़ोटॉन (photons) कहा जाता है. इससे पहले लोग यह मानते थे कि ऊर्जा सतत तरंगों के रूप में बहती है. उन्होंने परमाणुओं के और भी छोटे गतिशील कणों से मिलकर बने होने का अनुमान लगाया.

Ernst Rutherford

1911 में अर्न्स्ट रदरफ़ोर्ड (Ernst Rutherford, 1871-1937) ने यह प्रदर्शित किया कि परमाणु के भीतर पॉज़िटिव चार्ज का एक सघन क्षेत्र था जिसके चारों ओर बहुत अधिक खाली स्थान था जिसमें संभवतः निगेटिव चार्ज वाले बहुत सूक्ष्म कण (इलेक्ट्रॉन) घूमते थे. उनका अनुमान था कि इलेक्ट्रॉन परमाणु के केंद्र की परिक्रमा सुनिश्चित कक्षाओं में उसी प्रकार से करते थे जैसे सौरमंडल के ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं. लेकिन परमाणु के नाभिक के विशाल और सघन होने के कारण वे यह नहीं समझा सके कि इलेक्ट्रॉन नाभिक में गिरकर परमाणु को नष्ट क्यों नहीं कर देते.

Niels Bohr

नील्स बोर (Niels Bohr, 1885-1962) ने परमाणु के मॉडल से जुड़ी समस्या को बहुत हद तक हल कर दिया. इस कार्य में उन्हें प्लांक द्वारा लिखे गए महत्वपूर्ण लेखों से सहायता मिली. उन्होंने बताया कि फ़ोटॉन्स विद्युत द्वारा आवेशित परमाणुओं से सुनिश्चित आवृत्तियों पर ही निकलते हैं. उनकी परिकल्पना थी कि इलेक्ट्रॉन ऊर्जा के अलग-अलग स्तरों पर रहते हैं और कोई भी वस्तु प्रकाश तभी उत्सर्जित करती है जब विद्युत द्वारा आवेशित इलेक्ट्रॉन अपनी ऊर्जा के स्तर को छोड़ने पर विवश हो जाता है.

ऊर्जा के अपने पहले स्तर पर इलेक्ट्रॉन नाभिक के सबसे निकट होते हैं. वे नाभिक से दूर नहीं जा सकते और उनमें कम ऊर्जा होती है. नाभिक से दूर के स्तरों पर इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा बढ़ती जाती है. नाभिक से सबसे दूर स्थित इलेक्ट्रॉन नाभिक से कठोरता से जुड़े नहीं होते और अन्य तत्वों के साथ मिलकर यौगिक बनाने के दौरान इनकी अदला-बदली होती है. तत्वों के गुणधर्मों में दिखने वाली आवृत्ति ऊर्जा के बाहरी स्तरों पर उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या से निर्धारित होती है जो रासायनिक बंध स्थापित कर सकते हैं. हालांकि बोर के परमाणु मॉडल से बेहतर परमाणु मॉडल प्रतिपादित और स्वीकृत किया जा चुका है लेकिन इनमें निहित मूलभूत सिद्धांत वही हैं जो बोर ने बताए थे और रासायनिक प्रतिक्रियाओं को दर्शानेवाले चित्रों में उसे आसान होने के कारण उपयोग किया जाता है.

James Chadwick

इस बीच परमाणु के स्वरूप को लेकर हमारी समझ में लगातार विस्तार होता गया है. 1935 में जेम्स चैडविक (James Chadwick, 1891-1974) को उनकी इस खोज के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया कि परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन जितनी ही संख्या में आवेशहीन कण होते हैं, जिन्हें न्यूट्रॉन कहा गया. चूंकि इन कणों में कोई पॉज़िटिव या निगेटिव चार्ज नहीं होता इसलिए वे प्रोटॉन या इलेक्ट्रॉन से प्रभावित नहीं होते. बाद में इस बात का भी पता चला कि न्यूट्रॉन में प्रोटॉन से अधिक द्रव्यमान होता है. इस जानकारी का उपयोग न्यूट्रॉनों की बौछार करके नाभिक को तोड़ने में किया गया. इस प्रक्रिया को नाभिकीय विखंडन कहते हैं. इसमें अपार ऊर्जा निकलती है. हाल के वर्षों में हमें यह ज्ञात हुआ है कि इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन और भी सूक्ष्म कणों से मिलकर बने हैं जिन्हें सब-एटॉमिक पार्टिकल कहा जाता है. रसायन और भौतिकी के विज्ञान एक स्थान पर आकर एक-दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश करने लगते हैं. इनके कुछ सिद्धांत एक-दूसरे का समर्थन करते हैं तो कुछ सिद्धांतों में द्वंद भी होता है, लेकिन सम्मिलित रूप से ये हमें विश्व को समझने में सहायता करते हैं. (featured image)

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