जीवन में सबसे महत्वपूर्ण क्या है? – 2

Quora पर किन्हीं GJ Flannery ने यह लिखा था. मुझे अच्छा लगा और आपके लिए मैं इसे हिंदीज़ेन पर अनुवाद करके प्रस्तुत कर रहा हूं. (image credit)


एक बार मैं एक बाक्सिंग मैच में अपने पुलिस ऑफिसर दोस्त से लड़ रहा था. वह मुझसे बड़ा और ज्यादा ताक़तवर था लेकिन मैं अधिक चुस्त था और पहले भी उससे बॉक्सिंग कर चुका था. मैंने उसे लगातार चार या पांच पंच मारे. ये शानदार था. मैं जीत रहा था!

फिर एक पल के लिए मैंने अपना हेड गार्ड गिरा दिया. और उसने मुझे एक जबरदस्त पंच दिया. इसने मुझे नॉक आउट तो नहीं किया, मुझे कोई चोट नहीं लगी या तब इसका अहसास नहीं हुआ, मैं अपने पैरों पर ही खड़ा था, सुन्न-सुन्न सा, और मेरी सारी फ़ाइटिंग स्पिरिट हवा हो गई.

फ़ाइट खत्म हो गई. फिर सुन्न होने का वह अहसास गायब हो गया. दर्द उभर आया.

इसके कुछ महीने बाद मेरी मां गुज़र गईं. वो लंबे समय से बीमार थीं लेकिन अचानक ही चली गईं. क्रिसमस के दिन हम डिनर करने गए थे. उसके एक हफ्ते बाद वो चल बसीं.

मुझे वह पल याद है जब मुझे उनके नहीं रहने के बारे में पता चला. इसका अहसास भी उस पंच की तरह था. मुझे लगा कि ज़िंदगी जैसे मुझसे दूर बही जा रही थी, और ठीक उसी वक्त यह भी लग रहा था कि पूरी दुनिया में एक तरह का खालीपन आ गया था जिसे भरना नामुमकिन था. मैं दबे पांव बाथरूम में गया, दरवाज़ा बंद किया, और आईने में खुद को देखता रहा. निपट खालीपन था.


इसके कुछ महीनों बाद मैंने किसी का दिल तोड़ दिया. मैं ऐसा नहीं करना चाहता था, लेकिन मैं बस 16 का ही था. मुझे पता नहीं था कि मैं किसी के लिए कितना ज़रूरी हो सकता था.

मैंने उसे अगले दिन मेरे एक दोस्त के दादाजी के अंतिम संस्कार के समय देखा. वहां हर व्यक्ति दुःखी था. मैं सारे रिवाज़ पूरे हो जाने के बाद उससे मिला. उसकी आंखें बिल्कुल खाली थीं. मुझे लगा जैसे मैं खुद को ही आईने में देख रहा था. जैसे मैं दुनिया के उस खालीपन में झांक रहा था जिसमें मेरी मां की आत्मा कभी रहती थी.

अंत्येष्टि में आए किसी भी व्यक्ति का चेहरा वह बयां नहीं कर रहा था… हम दोनों के सिवा.

मैं घर गया और इस वाकये पर सोचता रहा. मैंने उसे चोट पहुंचाई जिससे मैं प्रेम करता था. मैं ही उसकी आंखो के सूनेपन की वज़ह था. मुझे मां के चले जाने का अहसास और गहराई से होने लगा.

तभी सुन्न होने का वह अहसास चला गया और पीड़ा उभर आई.

अगले 6 महीने जैसे नर्क में बीते.


कुछ समय बाद मैंने यह पाया कि जख़्म भरने शुरु हो गए थे.

मुझे किसी तरह का ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ. कोई परमसत्य मेरे सामने प्रकट नहीं हुआ. समय ने अपने आप ही घाव का रिसना रोक दिया. सांस-दर-सांस जीवन मुझमें दोबारा लौट आया.

मैंने किसी तरह दर्द का सामना करना सीख लिया. कुछ लोगों ने भी मदद की. कुछ ने नहीं भी की. कुछ चीज़ें सही थी पर कुछ गैरकानूनी भी थीं. मैं चोरी छिपे ऐसी जगहों में गया जहां मुझे नहीं जाना चाहिए था, और इससे मुझे मदद मिली. मैं सुबह 4 बजे तक जागकर रोज़ लिखता रहा और क्लास में पूरे वक्त सोता रहा. मैंने घर के पिछवाड़े में मिले बिल्ली के बच्चों की देखभाल की. मां के बगीचे में लगे पेड़-पौधों को मैंने खराब होने से बचा लिया और उन्हें बढ़ता देखता रहा. ये कुछ सबसे अच्छे उपाय थे.

चोट का निशान कभी नहीं गया. ये अपने हाथ को गंवाने जैसा था. मेरा एक हिस्सा बिखर गया था. लेकिन मेरा बाकी बचा भाग बेहतर हो रहा था.


मां को गुज़रे लगभग 10 साल हो गए हैं. साल के पहले दिन उनकी दसवीं डेथ एनिवर्सरी होगी… कुछ ही घंटों के बाद.

आपको किसी चीज की अहमियत का अहसास तब तक नहीं होता जब वह आपको छोड़कर चली जाती है.

लेकिन जब आप ठीक मौके पर जाग जाते हैं तो आपको दूसरा मौका मिल जाता है. आपका दिन कितना ही बुरा क्यों न बीता हो, आपकी ज़िंदगी कितनी ही दुःख भरी क्यों न हो, आपको दोबारा मौका ज़रूर मिलेगा. ताकि आप इसे पहले से अलग बना सकें, बेहतर बना सकें, जी सकें.

हम पंच झेलते हैं. हम टूटते हैं. हम दूसरों को तोड़ते हैं. हम दूसरों को खोते हैं.

लेकिन हम अपनी चोटों से उबरते हैं. हम बीज बोते हैं. हम कल, परसों और उसके भी अगले दिन कोशिश करते रहते हैं.

और जब हम गुज़र जाते हैं तब हम अपने प्रियजनों को उस बगीचे की देखरेख करने की प्रेरणा दे जाते हैं जिसे हमने कभी लगाया था.

मां, ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति दे.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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