Daughter of the Servant – नौकर की पुत्री

भारत के किसी राज्य में बहुत पहले एक राजकुमार था जो जल्द ही राजा बनने वाला था. राज्य की परंपरा के अनुसार राजा बनने से पहले उसे विवाह करना आवश्यक था.

दरबार के एक बुद्धिमान व्यक्ति ने उसे सलाह दी कि वह राज्य की सभी विवाह योग्य युवतियों को बुलाकर उनमें से अपने लिए सुयोग्य वधु का चुनाव करे.

राजकुमार के महल में एक स्त्री काम करती थी जिसकी पुत्री भी विवाह योग्य थी. जब उसने राजकुमार के विवाह के लिए की जा रही तैयारियां होते देखा तो उसका दिल डूबने लगा क्योंकि उसकी पुत्री राजकुमार से बहुत प्रेम करती थी.

उसने घर पहुंचकर राजकुमार के विवाह की खबर अपनी पुत्री को दी. वह यह जानकर अचंभित हो गई कि उसकी पुत्री भी स्वयंवर में जाना चाहती थी.

उसने अपनी पुत्री से कहा, “बिटिया, तुम वहां जाकर क्या करोगी? वहां तो पूरे देश से सुंदर और धनी लड़कियां राजकुमार का वरण करने के लिए आएंगी. राजकुमार से विवाह की इच्छा अपने मन से निकाल दो. मैं जानती हूं कि तुम्हें इससे दुख होगा लेकिन अपने दुख को खुद पर हावी करके अपने जीवन को व्यर्थ न होने दो!”

पुत्री ने कहा, “मां, तुम चिंतित न हो. मैं दुखी नहीं हूं और मेरा निर्णय सही है. मुझे पता है कि राजकुमार मुझे नहीं चुनेगा लेकिन इसी बहाने मुझे कुछ समय के लिए उसके निकट होने का मौका मिलेगा. मेरे लिए यही बहुत है. मैं जानती हूं कि मेरी किस्मत में महलों का प्रेम नहीं लिखा है.”

स्वयंवर की रात को सभी नवयुवतियां महल पहुंचीं. वहां सुंदर-से-सुंदर और धनी युवतियों का जमघट था जो सुंदर वस्त्रों और बहुमूल्य आभूषणों से स्वयं को सुसज्जित करके राजकुमार की नजरों में आने के किसी भी मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहती थीं.

राजकुमार ने तब भरे दरबार में सभी युवतियों से कहा, “मैं तुममें से प्रत्येक को एक बीज दूंगा. इस बीज से पौधा निकलने के छः महीने बाद जो युवती मुझे सबसे सुंदर फूल लाकर देगी मैं उसी से विवाह करुंगा और वही इस राज्य की रानी बनेगी.”

सभी युवतियों को गमले में एक-एक बीज रोपकर दे दिया गया. महल की नौकरानी की पुत्री को बागवानी या पौधे की देखभाल के बारे में कुछ पता नहीं था फिर भी उसने बहुत धैर्य और लगन से गमले की देखभाल की. राजकुमार के प्रति उसके दिल में गहरा प्रेम था और वह आश्वस्त थी कि पौधे से निकलनेवाला फूल बहुत सुंदर होगा.

तीन महीने बीत गए लेकिन गमले में कोई पौधा नहीं उगा. नौकरानी की पुत्री ने सब कुछ करके देख लिया. उसने मालियों और किसानों से बात की, जिन्होंने उसे बागवानी की कुछ तरकीबें सुझाईं, लेकिन किसी ने काम नहीं किया. उसके गमले में कुछ नहीं उगा. इसी सब में छः महीने बीत गए.

अपने खाली गमले को लेकर वह राजमहल पहुंची. उसने देखा कि बाकी युवतियों के गमलों में बहुत अच्छे पौधे उगे थे और हर पौधे में एक अद्वितीय फूल खिला था. हर फूल एक-से-बढ़कर-एक था.

अंत में वह घड़ी आ गई जिसकी सभी बाट जोह रहे थे. राजकुमार दरबार में आया और उसने सभी युवतियों के गमलों और फूल को बहुत गौर से देखा.

फिर राजकुमार ने परिणाम की घोषणा की. उसने नौकरानी की पुत्री की ओर इशारा करके कहा कि वह उससे विवाह करेगा.

वहां उपस्थित सभी जन रोष व्यक्त करने लगे. उन्होंने कहा कि राजकुमार ने सुंदर फूल लेकर आई युवतियों की उपेक्षा करके उस युवती को चुना जो खाली गमला लेकर चली आई थी.

राजकुमार ने शांतिपूर्वक सभी को संबोधित कर कहा, “केवल यही युवती रानी बनने की योग्यता रखती है क्योंकि उसने सच्चाई और ईमानदारी का फूल खिलाया है. जो बीज मैंने छः महीने पहले सभी युवतियों को दिए थे वे निर्जीव थे. उनसे पौधा उगकर फूल खिलना असंभव था.”

(~_~)

In ancient India a certain prince was about to be crowned Emperor; before that, in accordance with the law, he had to get married.
Advised by a wise man, he decided to call all the young women in the region to choose the most suitable among them.

An old lady who had been a servant in the palace for many years heard the comments on the preparations for the audience and felt a deep sadness, for her daughter nurtured a secret love for the prince.

On reaching home and conveying the news, she was astonished to hear that her daughter also intended to present herself before the prince.

“My child, what are you going to do there? All the prettiest and richest young women in the court will be there. Get that silly idea out of your head! I know that you must be suffering, but don’t change your suffering into madness!”

“Dearest mother, I am not suffering and far less have I gone crazy; I know that I shall never be the chosen one, but it’s my chance to be at least for a few minutes close to the prince. That makes me happy, even knowing that my fate lies elsewhere.”

At night, when the young woman reached the palace, indeed all the prettiest young ladies were there, dressed in the prettiest clothes, displaying the most beautiful jewels, and willing to fight in every possible way for the opportunity that lay open to them.

Surrounded by his court, the prince announced the challenge: “I shall give each of you a seed. The one who brings me the prettiest flower in six months’ time will be the future Empress of India.

The young girl took her seed, planted it in a vase, and even though she did not know much about the art of gardening, took care of the earth with great patience and tenderness, for she thought that if the beauty of flowers was as deep as her love, then she did not need to worry about the result.

Three months passed by and nothing bloomed. The young woman tried a bit of everything, spoke to farmers and peasants – who taught her all sorts of gardening techniques – but nothing worked, all her efforts came to nothing.

Finally, the six months came to an end and nothing had flourished in her vase.

Even knowing that she had nothing to show, she decided to return to the palace, realizing that this would be the last meeting with her beloved. The day arrived for the new audience.

The girl appeared with her vase without a plant, and saw that all the other pretenders had managed to produce fine results, each of them with a prettier flower than the next, all with a variety of shapes and colors.

At last came the moment everyone was waiting for: the prince entered and observed each of the pretenders with great care and attention.

After reviewing them all, he announced the result, pointing to his servant’s daughter as his chosen wife.

Everyone present began to complain, saying that he chose precisely the one candidate who had failed in the assigned task.

Then the prince very calmly clarified the reason for his choice: “She was the only one among you all to cultivate the flower that made her worthy to become an Empress: the flower of honesty. All the seeds that I distributed were sterile, and there was absolutely no way that they could flourish.”

Image credit

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 3 comments

  1. Goinda Raju

    नमस्ते सर मैंने अभी -अभी आपके ब्लोग का सब्सक्रिबशन लिया है मै हमेशा ही आपके
    ब्लोग की कहानियाँ खाली समय में पढता रहता हूँ । यह कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी
    आगे भी मुझे ऐसी कहानियो का इन्तजार रहेगा धन्यवाद ।

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