ईश्वर का प्रेमी : The Lover of God

गड़रिया मार्ग में प्रार्थना कर रहा था:

“हे ईश्वर, तू कहां है? मैं तेरी मदद करना चाहता हूं. मैं तेरे जूते झाड़ना और तेरे बालों में कंघी करना चाहता हूं. मैं तेरे कपड़े धोना और लीखें निकालना चाहता हूं.”

“जब तू सोने को जाए तो मैं तेरे पीने के लिए दूध लाना, तेरे हाथों और कदमों को चूमना चाहता हूं.”

“मैं तेरा कमरा बुहारकर साफ़ करना चाहता हूं. ईश्वर, मेरी भेड़ और बकरियां सब तेरी ही हैं.”

मूसा ने गड़रिये की बातें सुनकर अचरज से पूछा, “तुम किससे बातें कर रहे हो? ईश्वर को तुम्हारे दूध की कोई ज़रूरत नहीं है. जिसके पैर ही न हों वह तुम्हारे जूते लेकर क्या करेगा? कुछ तो समझो!”

गड़रिया बहुत दुखी हो गया. उसने छटपटाहट में अपने कपड़े तार-तार कर दिए और रेगिस्तान में भटकता रहा.

और तब ईश्वर ने मूसा से कहा:

“तुमने मेरे प्रियवर को मुझ से दूर क्यों कर दिया?”

“मेरे पैगंबर, तुम उन्हें मुझसे जोड़ने के लिए आए हो या जुदा करने के लिए?”

“मैंने दुनिया में हर किसी को जानने-पहचानने के लिए अनूठी दृष्टि दी है और कुछ कहने का तरीका सबका अलग है.”

“जिसे तुम गलत समझते हो वह किसी और के लिए सही है.”

“जो किसी के लिए विष है वह दूसरे के लिए मधु के समान है.”

“भक्तिभाव में पावन या अपावन, समर्पण या आलस्य का मेरे लिए कोई मोल नहीं है.”

“मैं इन सबसे पृथक हूं. किसी की भी आराधना या साधना का महत्व किसी अन्य व्यक्ति की आराधना या साधना से न तो कम है न अधिक है. मेरे लिए सब एक समान है.”

“जब कोई मेरी पूजा करता है तो वह मुझे नहीं बल्कि स्वयं का ही पूजन करता है.”

“मैं उनके मंत्रोच्चार या भजन के शब्दों को नहीं वरन उनकी साधुता को देखता हूं.”

“शास्त्रों को भुला दो. दहन करो, भंजन करो. तपो और स्वयं को तप में रत करो.”

“अपने विचारों और अभिव्यक्तियों को राख कर दो.”

“प्रेम की अग्नि में रूपांतरित हो.”

“प्रेमियों को झिड़को नहीं. जिसे तुम “अनुचित” प्रार्थना कहते हो वह सैंकड़ों “उत्तम” प्रार्थनाओं से श्रेष्ठ है.”

“तुम किसी दर्पण में स्वयं को ही देखते हो. तब तुम दर्पण को नहीं देखते.”

“बांसुरी बजानेवाला जब बांसुरी में फूंकता है तो संगीत रचता है?”

“बांसुरी संगीत नहीं रचती. उसे बजानेवाला उसका रचयिता है!”

“जब कोई मुझे धन्यवाद दे और मेरी बड़ाई करे तो उतनी ही सादगी और सहजता से करे जैसे उस प्यारे गड़रिये न की.”

रूमी के काव्य “मूसा और गड़रिय़ा” से…

(~_~)

shepherd on the road praying:
“Lord, where are you? I want to help you, to fix your shoes and comb your hair. I want to wash your clothes and pick the lice off.
“I want to bring you milk to kiss your little hands and feet when it’s time for you to go to bed.
“I want to sweep your room and keep it neat. God, my sheep and goats are yours.”
“Who are you talking to?” Moses could stand it no longer.
“Only something that grows needs milk. Only some one with feet needs shoes. Not G’d!”
The shepherd repented and tore his clothes and sighed and wandered out into the desert.
A sudden revelation came then to Moses.
“You have separated me from one of my own.
“Did you come as a Prophet to unite, or to sever?
“I have given each being a separate and unique way of seeing and knowing and saying that knowledge.
“What seems wrong to you is right for him.
“What is poison to one is honey to someone else.
“Purity and impurity, sloth and diligence in worship, these mean nothing to me.
“I am apart from all that. Ways of worshipping are not to be ranked as better or worse than one another.
“It’s not me that’s glorified in acts of worship. It’s the worshippers!
“I don’t hear the words they say. I look inside at the humility.
“Forget phraseology. I want burning, burning. Be friends with your burning.
“Burn up your thinking and your forms of expression!
“Lovers who burn are another.
“Don’t scold the Lover. The “wrong” way he talks is better than a hundred “right” ways of others.
“When you look in a mirror, you see yourself, not the state of the mirror.
“The flute player puts breath into a flute, and who makes the music?
“Not the flute. The flute player!
“Whenever you speak praise or thanksgiving to Me, it’s always like this dear shepherd’s simplicity.”
from Rumi’s “Moses and the Shepherd, translated by Coleman Barks

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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