जीवन को सही तरीके से जीने का वास्तविक तरीका क्या है?

यह प्रश्न बहुत कठिन है. और जैसा कि मैं अक्सर बहुत से प्रश्नों के उत्तर में कहता हूं, इस प्रश्न का उत्तर भी अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग हो सकता है. और एक कहानी के माध्यम से मैं इस प्रश्न का जो उत्तर देने जा रहा हूं उसे भी हर व्यक्ति अपनी समझ और अंतर्दृष्टि के अनुरूप अलग-अलग तरीके से ग्रहण कर सकता है.

तो कहानी यह है कि… आपने लाओत्सु का नाम तो सुना ही होगा. वह प्राचीन चीन में महान संत और विचारक था.

तो, लाओत्सु जब युवक था तब उसने मछली पकड़ना सीखने का निश्चय किया. उसने मछली पकड़ने की एक छड़ी बनाई, उसमें डोरी और हुक लगाया. फ़िर वह उसमें चारा बांधकर नदी किनारे मछली पकड़ने के लिए बैठ गया.

कुछ समय बाद एक बड़ी मछली हुक में फंस गई. लाओत्सु इतने उत्साह में था कि उसने छड़ी को पूरी ताक़त लगाकर खींचा. मछली ने भी भागने के लिए पूरी ताक़त लगाई. इसके परिणामस्वरूप छड़ी टूट गई और मछली भाग गई.

लाओत्सु ने दूसरी छड़ी बनाई और दोबारा मछली पकड़ने के लिए नदी किनारे गया. कुछ समय बाद एक दूसरी बड़ी मछली हुक में फंस गई. लाओत्सु ने इस बार इतनी धीरे-धीरे छड़ी खींची कि मछली लाओत्सु के हाथ से छड़ी छुड़ाकर भाग गई.

लाओत्सु ने तीसरी बार छड़ी बनाई और नदी किनारे आ गया. तीसरी मछली ने चारे में मुंह मारा. इस बार लाओत्सु ने उतनी ही ताक़त से छड़ी को ऊपर खींचा जितनी ताक़त से मछली छड़ी को नीचे खींच रही थी. इस बार न छड़ी टूटी न मछली हाथ से गई. मछली जब छड़ी को खींचते-खींचते थक गई तब लाओत्सु ने आसानी से उसे पानी के बाहर खींच लिया.

शाम को लाओत्सु ने अपने मित्रों से कहा – “आज मैंने संसार के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत का पता लगा लिया है. यह समान बलप्रयोग करने का सिद्धांत है. जब यह संसार तुम्हें किसी ओर खींच रहा हो तब तुम समान बलप्रयोग करते हुए दूसरी ओर जाओ. यदि तुम प्रचंड बल का प्रयोग करोगे तो तुम नष्ट हो जाओगे, और यदि तुम क्षीण बल का प्रयोग करोगे तो यह संसार तुमको नष्ट कर देगा”.


लाओत्सु का जो ऑब्ज़रवेशन है उसे समझना यदि कुछ कठिन लग रहा हो तो मैं सरल भाषा में कुछ और कहना चाहूंगा जो शायद आपको अधिक जंचेः

  • जीवन जीने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि ऐसे जिया जाए कि जीवन में पछतावे और कड़वाहटें संख्या में भी कम-से-कम हों और आकार में भी लघुत्तम हों.
  • जीवन चुनाव करने और निर्णय लेने का दूसरा नाम है. आपकी नियति उन बातों से निर्धारित होती है जिन्हें आप ठुकरा देते हो, न कि उन बातों से जिन्हें आप स्वीकार कर लेते हो.
  • हम सबको लगता है कि जो भी निर्णय हम लेते हैं वे तार्किक होते हैं और बहुत सोचविचार के बाद लिए जाते हैं, जबकि तथ्य यह है कि हमारा अवचेतन पहले से ही वह निर्णय किए बैठा होता है और हमारा मन केवल उसे वैद्यता देने का अमली जामा पहनाता है.
  • इसका मतलब यह कि हमारे भीतर निर्णय लेने वाली जो भी शक्ति है वह हमारी वास्तविक पहुच और नियंत्रण के बाहर होती है.
  • इसके परिणामस्वरूप हमारे अधिकतर निर्णय बाद में जाकर अफसोस में बदल जाते हैं, क्योंकि हम जो चाहते हैं, हम जो सोचते हैं, और जो हम सोचते हैं कि हमें चाहना चाहिए था, उसमें हमेशा टकराव होता रहता है.
  • ऐसे में सदाचार व नैतिकता की नीति पर चलने वाले व्यक्ति के मार्ग पर अंधेरा नहीं छाता. उसकी अंतःप्रज्ञा सारी बाधाओं और शंकाओं का निवारण करती रहती है.
  • ऐसा व्यक्ति जब किसी दोराहे पर पहुंचता है तो जिस पथ पर वह पहले कभी नहीं चला था उसपर बेखटके चलने का निर्णय लेता है.
  • क्योंकि उसका जीवन उसे बताता है कि जो राह उसने नहीं चुनी वह उसके लिए थी ही नहीं.

(image credit)

There are 8 comments

  1. Prakash Pandya

    इस कला का शास्त्रों में कुछ इस तरह वर्णन इस तरह आया है-
    उत्तम प्रणिपातेन शूरम् भेदं योजयेत्।
    नीचं अल्प प्रदानेन,समशक्त पराक्रमैः।

    प्रेरणास्पद प्रस्तुति के लिए बधाई और आभार…

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