संसार की शुद्धि

यह दुनिया हमारा ही अक्स है. हमारा प्रतिबिंब. हम जैसे होंगे, हमें दुनिया भी वैसी ही दिखेगी.

और हम कौन? हम दुनिया के लोग. हमसे ही तो यह दुनिया बनी है! यदि दुनिया बदलनी है तो हमें बदलना पड़ेगा. वो गायत्री परिवार का नारा है न, “हम बदलेंगे, युग बदलेगा”!

आज से 50 साल पहले की दुनिया इतनी जटिल नहीं थी. अपराध पहले भी होते थे, लेकिन लोग एक दूसरे पर यकीन करते थे. वे एक-दूसरे की परवाह करते थे. 100 साल पहले की दुनिया की दुनिया उससे भी बेहतर थी. आप अपने ही दादा-परदादा का जमाना याद करें, जब कोई वक्त-बेवक्त घर आए मेहमान को खाना खिलाए बिना नहीं जाने देता था. आजकल तो कोई घर आए तो लोग भीतर-ही-भीतर कुढ़ते रहते हैं, बाहर भले ही दिखावटी हैलो-हाय करते रहें.

अब वैसी दुनिया तो लौटकर आ नहीं सकती. कभी आएगी भी नहीं, यह दुनिया उसके लिए तैयार ही नहीं है. इस गजब की आपाधापी में वही बहुत है कि एक घर के चार लोग साथ बैठ खाना खा लें.

लेकिन लोग थोड़ा कम स्वार्थी बनें, दूसरों की परवाह करें… वगैरह-वगैरह… तो शायद दुनिया में कुछ शांति लाई जा सकती है.

इस बारे में मुझे एक पुरानी सूफ़ी कहानी याद आती है. उसका संबंध दुनिया में शांति लाने से था.

तो हुआ यह कि एक सूफी गुरु इब्न-अल-हुसैन से उनके एक शिष्य ने पूछा – “दुनिया में शांति और पवित्रता कैसे आएगी?”

हुसैन ने कहा – “दमिश्क में अबू मूसा अल-कुमासी नामक एक शेख रहता था. उसके इल्म और अच्छाई की सब मिसाल देते थे लेकिन हक़ीक़त में किसी को यह पता नहीं था कि वह वाकई भला आदमी है भी या नहीं.”

“एक रोज़ किसी वज़ह से शेख का घर ढह गया और शेख और उसकी बीवी मलबे में दब गए. घबराए हुए पड़ोसियों ने मलबे में उनकी तलाश शुरू कर दी. उन्होंने शेख की बीवी को खोज लिया. बीवी ने पड़ोसियों को देखते ही कहा – “मेरी फ़िक्र मत करो और पहले मेरे शौहर को बचाओ! वे उस कोने में बैठे हुए थे!”

“पड़ोसियों ने बीवी की बताई जगह पर से मलबा हटाया और उन्हें लकड़ी की एक शहतीर के नीचे दबा शेख दिख गया. उन्हें देखते ही शेख ने चिल्लाकर कहा – “मैं ठीक हूँ! पहले मेरी बीवी को बचाओ! बेचारी उस कोने में कहीं दबी होगी!”

गुरु ने कहा, “जब भी कोई व्यक्ति ऐसा आचरण करेगा जैसा इन पति-पत्नी ने किया तो वह दुनिया में शांति और पवित्रता में इजाफ़ा ही करेगा”.

Photo by Scott Webb on Unsplash

There are 5 comments

  1. सुज्ञ

    सुन्दर बोध कथा,
    पर-उपकार शान्ति के लिए सर्वोत्कृष्ट सदाचार है, किन्तु स्वार्थ और संकुचित मानस उस उँचाई तक पहुँच ही नहीं पाता। इस बोध-कथा में ‘पति-पत्नी’ का दृटांत पाकर लोग उपकार को भी स्वार्थवश ‘अपनों’ तक सीमित कर देते है। संजय जी ने सही कहा…लोग इसे “बेवकूफी” में खपा देते है।

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