84th Problem – 84वीं समस्या

compassionकिसी व्यक्ति ने जब बुद्ध की ख्याति सुनी तो वह उनके दर्शन और अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उनके पास गया. जैसा हम सबके जीवन में प्रायः होता है, वह किसान भी अनेक कठिनाइयों का सामना कर रहा था. उसे लगा कि बुद्ध उसे कठिनाइयों से निकलने का उपाय बता देंगे. उसने बुद्ध से कहा:

“मैं किसान हूँ. मुझे खेती करना अच्छा लगता है. लेकिन कभी वर्षा पर्याप्त नहीं होती और मेरी फसल बर्बाद हो जाती है. पिछले साल हमारे पास खाने को कुछ भी नहीं था. और फिर कभी ऐसा भी होता है कि बहुत अधिक वर्षा हो जाती है और हमारी फसल को नुकसान पहुँचता है.”

बुद्ध शांतिपूर्वक उसकी बात सुनते रहे.

“मैं विवाहित हूँ”, किसान ने कहा, “मेरी पत्नी मेरा ध्यान रखती है… मैं उससे प्रेम करता हूँ. लेकिन कभी-कभी वह मुझे बहुत परेशान कर देती है. कभी मुझे लगने लगता है कि मैं उससे उकता गया हूँ”.

बुद्ध शांतिपूर्वक उसकी बात सुनते रहे.

“मेरे बच्चे भी हैं”, किसान बोला, “वे भले हैं… पर कभी-कभी वे मेरी अवज्ञा कर बैठते हैं. और कभी तो…”

किसान ऐसी ही बातें बुद्ध से कहता गया. वाकई उसके जीवन में बहुत सारी समस्याएँ थीं. अपना मन हल्का कर लेने के बाद वह चुप हो गया और प्रतीक्षा करने लगा कि बुद्ध उसे कुछ उपाय बताएँगे.

उसकी आशा के विपरीत, बुद्ध ने कहा, “मैं तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता.”

“ये आप क्या कह रहे हैं?”, किसान ने हतप्रभ होकर कहा.

“सभी के जीवन में कठिनाइयाँ हैं”, बुद्ध ने कहा, “वास्तविकता यह है कि हम सबके जीवन में 83 कठिनाइयाँ हैं, मेरा, तुम्हारा, और यहाँ उपस्थित हर व्यक्ति का जीवन समस्याओं से ग्रस्त है. तुम इन 83 समस्याओं का कोई समाधान नहीं कर सकते. यदि तुम कठोर कर्म करो और उनमें से किन्हीं एक का उपाय कर भी लो तो उसके स्थान पर एक नयी समस्या खड़ी हो जायेगी. जीवन का कोई भरोसा नहीं है. एक दिन तुम्हारी प्रियजन चल बसेंगे, तुम भी एक दिन नहीं रहोगे. समस्याएँ सदैव बनी रहेंगीं और कोई भी उनका कुछ उपाय नहीं कर सकता.”

किसान क्रुद्ध हो गया और बोला, “सब कहते हैं कि आप महात्मा हो! मैं यहाँ इस आस में आया था कि आप मेरी कुछ सहायता करोगे! यदि आप इतनी छोटी-छोटी बातों का उपाय नहीं कर सकते तो आपकी शिक्षाएं किस काम की!?”

बुद्ध ने कहा, “मैं तुम्हारी 84वीं समस्या का समाधान कर सकता हूँ”.

“84वीं समस्या?”, किसान ने कहा, “वह क्या है?”

बुद्ध ने कहा, “यह कि तुम नहीं चाहते कि जीवन में कोई समस्या हो”.

* * * * * * * * * *

There is an old story about a man who came to see the Buddha because he had heard that the Buddha was a great teacher. Like all of us, he had some problems in his life, and he thought the Buddha might be able to help him straighten them out. He told the Buddha that he was a farmer. “I like farming,” he said, “but sometimes it doesn’t rain enough, and my crops fail. Last year we nearly starved. And sometimes it rains too much, so my yields aren’t what I’d like them to be.”

The Buddha patiently listened to the man.

“I’m married, too,” said the man. “She’s a good wife…I love her, in fact. But sometimes she nags me too much. And sometimes I get tired of her.”

The Buddha listened quietly.

“I have kids,” said the man. “Good kids, too…but sometimes they don’t show me enough respect. And sometimes…”

The man went on like this, laying out all his difficulties and worries. Finally he wound down and waited for the Buddha to say the words that would put everything right for him.

Instead, the Buddha said, “I can’t help you.”

“What do you mean?” said the man, astonished.

“Everybody’s got problems,” said the Buddha. “In fact, we’ve all got eighty-three problems, each one of us. Eighty-three problems, and there’s nothing you can do about it. If you work really hard on one of them, maybe you can fix it – but if you do, another one will pop right into its place. For example, you’re going to lose your loved ones eventually. And you’re going to die some day. Now there’s a problem, and there’s nothing you, or I, or anyone else can do about it.”

The man became furious. “I thought you were a great teacher!” he shouted. “I thought you could help me! What good is your teaching, then?”

The Buddha said, “Well, maybe it will help you with the eighty-fourth problem.”

“The eighty-fourth problem?” said the man. “What’s the eighty-fourth problem?”

Said the Buddha, “You want to not have any problems.”

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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