ईश्वर, नैतिकता, और जीवन का उद्देश्य

Life-Of-purpose


ब्लौगजगत, फेसबुक, और रोज़मर्रा मुझे ऐसे बहुत से लोग मिलते हैं जो यह मानते हैं कि ईश्वर या धर्म को नहीं माननेवाले व्यक्ति न तो नैतिक होते हैं और न ही उन्हें जीवन के उद्देश्य का बोध होता है. इसलिए मैंने सोचा कि इन दोनों गलतफहमियों पर कुछ बात की जाए. पहले हम जीवन के उद्देश्य की बात करते हैं, और नैतिकता के प्रश्न से बाद में निबटेंगे.

जहाँ तक मेरा अवलोकन है, मैंने धार्मिक (आस्तिक?) व्यक्तियों को भी जीवन के उद्देश्य के बारे में गोलमोल बातें करते ही देखा है. कोई व्यक्ति सदाचार से संयमित जीवन जीने को जीवन का उद्देश्य बताता है तो कोई ईश्वर का साक्षात्कार करके मुक्ति प्राप्त करने में ही जीवन का सार देखता है. यहाँ बात धार्मिक व्यक्तियों की हो रही है इसलिए उन लोगों की चर्चा नहीं की जा रही है जो यह मानते हैं कि जीवन एक बार ही मिलता है और इसे भरपूर मौज-मजे के साथ बिताना चाहिए. आप इसे शायद एपिक्यूरियन भोगवादी व्याख्या कहेंगे. खैर… मैंने यह देखा है कि लोग इस विषय पर जो कुछ भी कहते हैं वह बहुधा या तो अटकल होती है या किसी प्राचीन धार्मिक पुस्तक का कोई अंश. चाहे जो हो, यह आपकी व्याख्या नहीं होती और आपके ऊपर किसी भी रूप में लागू भी नहीं होती. आप चाहें तो पूरी ज़िंदगी अपनी उस मान्यता पर अटल रह सकते हैं, पर सच तो यह है कि आप नहीं जानते यह कितनी सत्य है.

यदि आपको जीवन का उद्देश्य जानने की उत्कंठा है तो मैं आपको कार्ल सागन की बहुत सुन्दर व्याख्या बताना चाहूँगा जिससे मैं काफी हद तक सहमत हूँ. कार्ल सागन ने कहा था, “जीवन का उद्देश्य है सार्थक कर्म करना”. अंग्रेजी में – “Do something meaningful!” इसके परे जाकर यदि आप कोई और उद्देश्य खोजकर पुष्ट करना चाहें तो आप स्वतन्त्र हैं लेकिन मुझे यह पर्याप्त दिखता है. सार्थक कर्म स्वयं में समस्त शुभ और सत्य को समाहित कर लेते हैं. इसमें प्रेम है, और करुणा, सदाचार, सहायता, और सहनशीलता भी है. आपको क्या लगता है?

कुछ ऐसा ही प्रश्न हमारे अस्तित्व का भी है. “हम कौन हैं?”, “हम यहाँ क्यों आये हैं?” यदि हम इसपर सनातन या बौद्ध दृष्टि से विचार करें तो यह पायेंगे कि हर वस्तु या घटना किसी पूर्ववर्ती घटना या कार्य के फलस्वरूप उत्पन्न होती है. विज्ञान भी इस विचार का विरोध नहीं करता. चूंकि हमें अक्सर ही अतीत में घटी समस्त घटनाओं और परिस्थितियों का ज्ञान नहीं होता इसलिए हम इस प्रकरण में अनभिज्ञता ही व्यक्त कर सकते हैं. यदि हम केवल अपने ही बारे में इन प्रश्नों पर मनन करें तो हमें सोचना चाहिए कि रात भर की नींद में गुम रहने के बाद हमारी आँख अगली सुबह किसलिए खुलतीं हैं? हम आखिर इस अस्तित्व के फेर में पड़े ही क्यों? स्टीफन हॉकिंग के शब्दों में कुछ बदलाव करें तो “Why do we bother to exist? (Original “why does the universe bother to exist?”) इन प्रश्नों के भंवर में डूबने-उतराने के बाद कुछ व्यक्तियों को कुछ उत्तर मिलते भी हैं. ये उत्तर अबूझ रहस्यवादी भी हो सकते हैं या जड़ तार्किक भी. कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के उत्तर को अपने प्रश्न का हल नहीं मान सकता क्योंकि हर व्यक्ति के उत्तर को उसके जीवन और चिंतन के अनुरूप होना चाहिए. और यह भी एक विचार का बिंदु हो सकता है कि कोई व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को लेकर बिलकुल भी चिंतनशील न हो. “मैं कौन हूँ”, ज़रूरी तो नहीं कि यह प्रश्न हर व्यक्ति के मन को मथे ही. दुनिया में और भी बहुत से महत्वपूर्ण मसले हैं जिनपर सोच-विचार ज़रूरी है.

और जहाँ तक नैतिकता का प्रश्न है, यह ज़रूरी नहीं है कि अधार्मिक या नास्तिक व्यक्ति में दुराचार और अपकर्म कूट-कूट कर भरे हों. ईश्वर को नहीं माननेवाले व्यक्ति भी सदाचारी और ‘मानवीय’ हो सकते हैं. यह भी देखने में आता है कि अक्सर ही अति धार्मिक माता-पिता की संतानें घोर नास्तिक निकलती हैं. इसका कारण शायद यह है कि मनुष्य का जन्म पूर्ण शुद्ध एवं सात्विक शिशु के रूप में होता है लेकिन बेहतर शिक्षा प्राप्त एवं गहन चिंतन-मनन करने वाले बालक और युवक बहुत सारे प्रश्नों के तर्कसंगत उत्तरों की खोज में रहते हैं. आस्था में आकंठ डूबे व्यक्ति जब उन्हें संतोषजनक उत्तर उपलब्ध नहीं करा पाते हैं तब ऐसे बालक और युवक उनकी आस्था को दरकिनार कर देते हैं. कई बार धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं का दबाव होने के कारण लोगों को बहुत से अप्रिय, अनुचित और अवांछनीय कार्य भी करते हैं. ऐसे में विचारशील व्यक्तियों का मन धर्म से उचाट हो जाता है. यह भी आवश्यक नहीं है कि धर्म ग्रंथों में वर्णित बातें हर व्यक्ति को उचित और सत्य जान पड़ें या सत्य ही हों. इन्हीं कारणों से उच्च नैतिक मानदंड और मूल्यों को धारण करने वाले व्यक्ति देवताओं और ईश्वर के कर्मों, इच्छाओं, और प्रयोजनों पर प्रश्नचिह्न लगाने लगते हैं. लोग अपने चारों ओर गरीबी, अनर्थ, अन्याय, और अत्याचार देखते हैं. उनके मन में यह प्रश्न उठने लगता है कि कोई सर्वशक्तिमान और परमदयालु परमेश्वर अपने ही संतति के साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर सकता है? वे कर्म-सिद्धांत का मखौल उड़ाते हैं. मृत्यु के पश्चात नर्क की अग्नि में मनुष्यों को दंड देनेवाले ईश्वर की नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लग्न स्वाभाविक है. मुझे याद है कि बहुत पहले मैं भी यह कहता था कि, ‘ईश्वर ने मुझे बनाने से पहले मुझसे पूछा थोड़े ही था जो मैं उसके हिसाब से चलूँ!?’ यह तो मजाक की बात हो गयी लेकिन मेरे विचार का सार यही है कि किसी व्यक्ति के नास्तिक या ‘अधार्मिक’ होने से यह सिद्ध नहीं होता कि वह अनैतिकता का पक्षधर है बल्कि हो सकता है कि नीति एवं सदाचार को लेकर उसके विचार इतने परिपक्व हों कि वह संसार में व्याप्त अशुभ के लिए भी या तो ईश्वर को उत्तरदायी मानने लगे या उसकी सत्ता को ही अविश्वास के घेरे में ले आये.

मेरे परिचितों और मित्रों में बहुत से नास्तिक हैं. मैं मूलतः अज्ञेयवादी हूँ लेकिन चिंतन और ध्यान आदि के कारण मुझमें आस्था बलवती हो रही है. मेरे सभी नास्तिक मित्र विचारवान और सदाशयी हैं लेकिन ईश्वर की अवधारणा को वे गले नहीं उतार पाते. वे पुराणों और महाकाव्यों में वर्णित प्रसंगों से सहमत नहीं होते और अक्सर उनका मजाक भी उड़ाते हैं, यद्यपि वे यह भी मानते हैं कि इनमें लिखी बहुत सी बातें प्रतीकात्मक हैं. मेरे कुछ आस्तिक मित्र भी ईश्वर की प्रचलित छवि से संतुष्ट नहीं हैं. बहुत से आस्तिक व्यक्ति ईश्वर को प्रकाश के पुंज के रूप में देखते हैं. कोई उसे असीम प्रेम का स्रोत बताता है. मैंने, या मेरे किसी भी आस्थावान परिचित/मित्र ने ईश्वर का साक्षात्कार नहीं किया है लेकिन यह स्पष्ट है कि हम ईश्वर को ‘सच्चिदानंद’ के रूप में ही देखते हैं. हम विश्व को गतिमान और प्रभावशील बनाए रखने के लिए एक सर्वशक्तिमान और दयालु ईश्वर के विचार में विश्वास करते हैं. मुझे लगता है कि बहुत नैतिक/सद्गुणी व्यक्ति जब ईश्वर की प्रचलित छवि से असंतुष्ट हो जाते हैं तब वे ईश्वर की ऐसी ही निराकार छवि का निर्माण कर लेते हैं. इस एक लाभ यह होता है कि वे नास्तिक या ईशनिंदक होने के आरोप से बच जाते हैं. यह बात और है कि कुछ अतिधार्मिक व्यक्ति उन्हें जब-तब कोसते रहते हैं क्योंकि वे उनके आदेश मानकर हर चौखट पर माथा नहीं टेकते.

बहुत से नास्तिक समूह और संस्थाएं जनहित के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं. ऐसे बहुत से नास्तिक बहुसंख्यक देश हैं जहाँ अपराध दर बहुत कम है, फलतः वहां जेल भी नगण्य हैं और वहां के नागरिक बालिकाओं को गर्भ में ही नहीं मार देते. भारत जैसे प्राचीन आध्यात्मिक देश में एक ओर जहाँ देवता भी जन्म लेने को तरसते हैं वहीं दूसरी ओर लाखों लोग कीड़े-मकौडों की तरह जन्म लेते और मर जाते हैं. कर्म-सिद्धांत के आधार पर इन बातों की बड़ी रोचक व्याख्या की जा सकती है पर सत्य तो वही है जो सामने दिखता है. हम मृत्यु के पहले और बाद में घटनेवाली घटनाओं या सुख-दुःख के फेर में आकर अपनी वर्तमान दुर्दशा के लिए कर्मों या ईश्वर को दोषी नहीं ठहरा सकते.

यह हमारे समय की आवश्यकता है कि हम धर्मों और पंथों के परे जाकर स्वयं ही नैतिकता के महत्व को समझें और सद्गुणों को धारण करें. बिना किसी ईश्वरीय प्रेरणा या सद-इच्छा के भी लोग उच्च नैतिक मानदंड धारण कर सकते हैं. ऐसा ही जीवन के उद्देश्य के साथ भी है.

नीचे दिए वीडियो में श्री राधानाथ स्वामी जीवन का उद्देश्य बता रहे हैं. मुझे तो यह गोलमोल बात लगती है. आप भी इसे देखें और बताएं.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 15 comments

  1. चंदन कुमार मिश्र

    अच्छा लगा। ऐसा लगता है कि ईश्वर लाठी है और प्रतीक है विकलांगता का। मेरा उद्देश्य बहस करना है भी नहीं। लेकिन आपने संतुलन बनाए रखा। धन्यवाद।

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  2. shilpamehta1sh

    धार्मिक व्यक्ति कौन हैं ? जो अपने कर्त्तव्य { धर्म } को सत्यता से निबाहे |
    नैतिक कौन है ? जो प्रचलित नीतियों का पालन करे |

    यह जो Confusion है – यह “धार्मिकता” की गलत परिभाषाओं से होता है | धर्म शब्द के अर्थ यह नहीं हैं कि हम किसी ईश्वर को माने ही , या माने भी तो उसे पूजें ही | यह अर्थ लकीर को पीट पीट पीट कर बना दिया गया अर्थ है |……… वह इसलिए, कि अधिकतर जो कर्मकांड अलग अलग धर्मों के नाम पर किये जाते हैं, वे उन के गुरुओं के बताये सही रास्तों को अंधों की तरह follow करने का नतीजा हैं | गुरु जो रास्ता बता रहा है – वह देख सकता है, सो वह सही राह पर होता है | उसके पीछे चलने वाले या तो अंधे हैं, या उन्होंने आँखों पर पट्टी बाँध रखी है, तो वे भटकेंगे – और जो आँख वाले भी हैं और आँख खोल कर भी चल रहे हैं, वे ही सच्चे मायनों में धार्मिक हैं | धर्म शब्द वस्तु के मूल गुण को इंगित करता है – जैसे – आग का धर्म है गर्मी |

    एक बार बुद्ध से किसी ने पूछा कि यह जो कई भिक्षुक आपके साथ हैं – क्या इन्हें भी वह ज्ञान उपलब्ध हुआ है जो आपको ? तो बुद्ध ने कहा – कईयों को हुआ है – पर सब कहते नहीं – तो तुम जान नहीं पाते | मैं कहता हूँ – पर जानता हूँ कि जो मैंने पाया वह कह कर तुम्हे दे नहीं सकता – फिर भी कहता हूं | ये भी जानते हैं – और नहीं कहते हैं | लेकिन – सूर्योदय को वही जानता है – जिसने सूर्योदय देखा है , उसे जिया है | जिसने नहीं देखा – उसे कितना ही बताया जाए कि आसमान काले से लाल होता है – वह सीख कर चित्र बना लेगा – परन्तु जान नहीं पायेगा |

    धर्म भीतर से अत है – किसी के थोपने से नहीं | तो – प्रचलित परिभाषा यह है कि धार्मिक वह है जो ईश्वर को माने और पूजे | उस परिभाषा के अनुसार हर धार्मिक व्यक्ति नैतिक अवश्य होगा ( होना चाहिए ) किन्तु हर नैतिक व्यक्ति धार्मिक हो ऐसी शर्त नहीं है | जैसे every square is a rectangle but every rectangle need not be a square ..

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  3. राहुल सिंह

    शायद प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपने जीवन का उद्देश्‍य निर्धारित करने को स्‍वतंत्र है और उसे ऐसा करना भी चाहिए, लेकिन जीवन तो ऐसी लीक है जो अनिर्धारित (अघोषित) लक्ष्‍य के साथ भी सार्थक जीयी जाती है.

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  4. Sumitra raliya

    Meri anubhuti me ishvar shkti h.andhkar me ujala,jhuth me satay,or altogether ‘achai’. Ye shkti chahe to nature ko maane ya,moralities ko ya kahu to universe me exist hr ek thing jiski nashvrta me upsatit presence ka gun ,or jivo me ‘pran’.
    Pran ka meaning me apki nazar me jo h vhi ishvar h.n pran kese exist h ye me is ex. Ke thru btana chahungi.ek young person ki death k just baad uski body observe krein,n ye pta ho ya chle ki uski body k saare organs ,systems ekdm thik h phir vha kya h jiski absence me wo ek body h sirf? Science hrt fail hone par ubladh kra skta h,kidney n bahut kuch magar aisa kya h jo uski pahunch se dur h.vo koi murt thng to ho nhe skti? Then what?
    Meri nazar me iska answer ishvar h..ye mera apna darshan h ho skta h me stay se anbhiya hu ,bt me apse iska answer jana chahungi

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  5. सुज्ञ

    @“जीवन का उद्देश्य है सार्थक कर्म करना”.
    –सार्थक कर्म, मार्ग हो सकता है, पर लक्ष्य के अर्थ में उद्देश्य महीं हो सकता। सार्थक कर्म की सार्थकता, काल स्थल और स्थिति अनुसार बदल भी सकती है और वांछित उद्देश्य से विपरित परिणाम भी दे सकती है। हमको तो सार्थकता उद्देश्य का साधन लगती है, साध्य नहीं।

    @ ईश्वर को नहीं माननेवाले व्यक्ति भी सदाचारी और ‘मानवीय’ हो सकते हैं.
    –पहली बात तो मात्र ईश्वर को न मानना ही नास्तिकता नहीं है। अधार्मिकता नहीं है। कईं भेद है –
    1- ईश्वर को किसी भी तरह नहीं मानते।
    2- ईश्वरत्व को मानते है पर सृष्ठि के रचनाकार, पालक की तरह नहीं, मार्गदृष्टा की तरह।
    3- तिसरे वे जो धर्म से ही नफरत करते है,धर्म के ग्रंथों में ईश्वर को महत्व दिया गया है इसलिए वे ग्रंथों की सदाचार आज्ञाओं को भी नहीं मानना चाहते। मतलब धर्म और धर्मग्रंथों से यदि अमृत भी निकले तो उसपर ज़हर उगलेंगे।
    4- ईश्वर पर नहीं मात्र कर्म और पुरूषार्थ पर मानते है।
    5-ईश्वर पर नहीं कर्म सिद्धान्त अनुसार मात्र कर्मानुसार फल पर आस्था रखते है।
    6- भौतिक सुखों खाओ पियो मौज उडाओ में मानते है।

    यह सभी कहलाते तो नास्तिक है, पर इनका वर्गीकरण आवश्यक है। क्योंकि कईं छ्द्म नास्तिक होते अधर्मी और भोगवादी नीति के पर नास्तिक नाम धराकर स्वयं को स्थापित करने के प्रयास करते है। जो छुपे भोगवाद और शोषणवाद मानसिकता के होंगे उन्हे केवल ईश्वर ही नहीं समस्त धर्म ही अपना प्रतिस्पृद्धि ही नजर आएगा, जो उनके अपने शोषण पर लात मारता लगेगा। भला नीति-शिक्षा का ही विरोध करने वाले इस श्रेणी के नास्तिकों में सदाचार कैसे ठहर सकता है।
    इसबात से सहमत हूं कि मात्र नास्तिक होना ही कदाचारी होना नहीं है। पर नास्तिकों के भेद का भेद जाने बिना सभी को एक समान नैतिकता पालन के पक्षधर मानना भी त्रृटिपूर्ण है।

    और यह भी सच है, जरूरी नहीं धार्मिकता का तमगा लगाए लोग सच्चे अर्थों में धर्मानुयायी हो। छ्द्म, भेस लिंगधारी, दुर्बोध और मायावी भी हो सकते है। कहे कुछ और करे कुछ वाले भी हो सकते है। ऐसे भी होते है जो धर्मतत्व तो नहीं जानते और और कर्मकाण्ड, संख्याबल, दिखावा आदि को धर्म मानकर, अहंकार या द्वेषी भाव से दुनिया को दिखाया करते है। ऐसे चाहे आस्तिक हो या नास्तिक, निर्थक उद्देश्यहीन ही जी सकते है। और मजे से जीते भी है।

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  6. सुज्ञ

    @स्वयं ही नैतिकता के महत्व को समझें और सद्गुणों को धारण करें.

    —करना तो स्वयं को ही पडता है, किसी भी दशा में, ईश्वर को मानें या न भी माने। धर्म से संदेश लें या न भी लें। लेकिन कौन करवायेगा नैतिकता और अनैतिकता का विभाजन? कैसे पता चले जिस कर्म को हम नैतिक कहकर व्यवहार में ला रहे है वह नैतिक ही है? और सके परिणाम शुभ ही हो?
    दूरगामी परिणाम विपरित भी आते है, ज्ञान और अनुभव कहाँ से पाएं। सद्गुणो को चिंन्हित कैसे किया जाय बिना किसी प्रेरणा के। पूरी जिन्दगी सद्गुण की पोटली उठा कर घुमते रहे, और अन्त में पता चला यह सद्गुण नहीं था, हमारी इस आदत से लोगों को सुख से ज्यादा दुख ही मिले।
    कहने का तात्पर्य यहीं है कि अनुभवी मार्गदर्शक, विशेषज्ञ की आवश्यकता तो रहेगी ही। वे गुरू या ग्रंथगुरू ही हो सकते है।

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  7. osho shailendra

    प्रिय मित्र निशांत जी, नमस्कार।
    आपके ईमानदार वक्तव्य के लिए साधुवाद और आमंत्रण भी-
    मैंने, या मेरे किसी भी आस्थावान परिचित/मित्र ने ईश्वर का साक्षात्कार नहीं किया है लेकिन यह स्पष्ट है कि हम ईश्वर को ‘सच्चिदानंद’ के रूप में ही देखते हैं.

    परमगुरु ओशो के अमृत वचन हैं- ‘ध्यान इस जगत में सर्वाधिक बहुमूल्य घटना है। क्योंकि ध्यान अर्थात मौन। ध्यान अर्थात निर्विचार। ध्यान अर्थात एक शून्य चैतन्य की अवस्था, जब चैतन्य तो पूरा होता है, लेकिन चैतन्य के समक्ष कोई विषय नहीं होता, कोई विचार नहीं होता। बस चैतन्य मात्र! उस चैतन्य की घड़ी में तुम जानोगे- तुम नहीं हो, परमात्मा है। सत्-चित्-आनंद है।’
    अधिकतम साधकों के लिए परमात्मा के विभिन्न आयामों में से सर्वाधिक सुगम है- ओंकार का ज्ञान। यहां से यात्रा का शुभारंभ अति सरल है। इसीलिए ओशोधारा के प्रथम शिविर ‘ध्यान समाधि’ में अनहद-दीक्षा को ही प्रभु-मंदिर में प्रवेश का द्वार बनाया जाता है।
    अन्य द्वारों से भी उस विराट मंदिर के भीतर जाना संभव है, किंतु थोड़ा कठिन। द्वितीय शिविर ‘सुरति समाधि’ में अनाहत नाद की गहराईयों में डुबकी लगाने के पश्चात्, फिर आसान हो जाता है परमात्मा के प्रकाशमय स्वरूप को जानना, दिव्य स्वाद और सुगंध का रसपान करना। अमृत-चैतन्य, दिव्य-ऊर्जा, आनंद और प्रेम के आकाश में उड़ान भरना। और अंततः अद्वैत समाधि में जानना कि ‘मैं नहीं हूं, परमात्मा है।’
    सभी जिज्ञासुओं को निमंत्रण है प्रभु के इस मंदिर में। आएं, अपने आंतरिक संगीत में मग्न होकर जीवन को कृतार्थ करें। सहस्रार रूपी गुंबज में गूंज रही घंटे की मधुर घ्वनि में स्नान करें। वही है सत्य। हरि ओम् तत्सत्।
    -ओशो शैलेन्द्र

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  8. Shabbir Khan

    आप लोग अच्छाई की बात कर रहे है ‘ok’ आपने काफी अच्छा प्रयास किया धार्मिकों को अपने से नीचा दिखाकर, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि आपने आस्तिक शब्द कुछ इस तरह लिखा (आस्तिक?) ” जैसे आपने नास्तिकता के बारे में पूर्ण ज्ञान हासिल कर लिया हो? कोई बात नहीं!” पर मुझे यह बात समझ नहीं आती कि नास्तिकता फैलाने में ऐसा क्या मज़ा आता है लोगों को जो आस्तिकता फ़ैलाने में नहीं आता, खैर वैसे इन्सान अपनी सोच से जीने का अधिकार है.., रही बात आस्तिक कि उसे इतना मनबुद्धि क्यों समझा जाता है यह बात भी कई ब्लोगों पर देखि गई है. “मैं कौन हूँ” इसका उत्तर किसी के पास नहीं, फिर भी अगर इसका उत्तर यह समझ लिया जाये कि ईश्वर हमें परख रहा है, जीवन एक बार ही मिलता है और इसे भरपूर मौज-मजे के साथ बिताना चाहिए, सदाचार से संयमित जीवन जीने को जीवन का उद्देश्य ईश्वर का साक्षात्कार करके मुक्ति प्राप्त करने में ही जीवन का सार तो इसमें आप कैसे कह सकते हो कि मेरा निर्णय ठीक है, आपने कहा: और जहाँ तक नैतिकता का प्रश्न है, यह ज़रूरी नहीं है कि अधार्मिक या नास्तिक व्यक्ति में दुराचार और अपकर्म कूट-कूट कर भरे हों. ईश्वर को नहीं माननेवाले व्यक्ति भी सदाचारी और ‘मानवीय’ हो सकते हैं. यह भी देखने में आता है कि अक्सर ही अति धार्मिक माता-पिता की संतानें घोर नास्तिक निकलती हैं. पर बात तो ये भी देखि गई है कि धार्मिक लोग भी अपकर्म नहीं करते क्योकि उनके माँ बाप उनको धार्मिकता बताते है, और रही बात नास्तिकता कि यह कैसे कहा जा सकता है कि यह आस्तिकता से श्रेष्ठ है क्या नास्तिक भी अपनी मनमानी नहीं कर रहे है, मैंने देखा कि facebook पर कई नास्तिक लोग भी बड़ी मस्ती में What the hell? कहते है हुए दिखाई देते है और उनको गहराई से देखो और जानों तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह दुखी है क्योकि रिश्तों में पवित्रता नहीं, रही बात ओशो जैसे लोगों कि बुढ़ापे में यह कहते हुए नज़र: “तुम लोगों को देखते हो — वे दुखी हैं क्योंकि उन्होंने हर मामले में समझौता किया है, और वे खुद को माफ नहीं कर सकते कि उन्होंने समझौता किया है। वे जानते हैं कि वे साहस कर सकते थे लेकिन वे कायर सिद्ध हुए। अपनी नजरों में ही वे गिर गए, उनका आत्म सम्मान खो गया। समझौते से ऐसा ही होता है।” ओशो कि बात ठीक है पर ओशो सच्चाई नहीं बताई क्योकि उनकी भी मझबूरी थी नास्तिकता को गसीटने (श्रेष्ठ) की और फिर आप लोगों का यह तर्क भी ठीक ही है कि स्वयं से ईमानदार बने रहें हम, वही आवश्यक है। ठीक बात पर देखा तो यह भी गया है कि हर इंसान ऐसी सोच नहीं रखता क्योंकि हर इंसान में यह गुण नहीं पाए जाते क्योंकि कोई लालची, अय्यासी, और विभिन्न स्वभाव का होता है, कहते है कुछ लोग कहते है नास्तिकता श्रेष्ठ है?
    सामान्य देखा गया है हममे भी यह सोच वाले होते है कि “स्वयं से ईमानदार बने रहें हम, वही आवश्यक है।” अधिकतर लोग लालची भी होते है तो वो स्वर्ग के लालच में अच्छे काम करते है, और बुराई से बचे रहते है. अब नास्तिक कि भी अपनी सोच है क्योंकि उसकी सोच अलग है.
    आप ने कहा बहुत से नास्तिक समूह और संस्थाएं जनहित के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं. ऐसे बहुत से नास्तिक बहुसंख्यक देश हैं जहाँ अपराध दर बहुत कम है, फलतः वहां जेल भी नगण्य हैं और वहां के नागरिक बालिकाओं को गर्भ में ही नहीं मार देते. पर अधिकतर ही नहीं बहुत ही ज्यादा नास्तिक ऐसे है जो इस काम को बेझिज़क अंजाम देते है.
    वैसे देखा गया है कि कोई नास्तिक फ्लोपर खुद को लालची नहीं कहलवाना चाहता क्योकि जो आस्तिक हुए कि लालच का धब्बा लगा.
    क्योकि नास्तिक ही अधिकतर आस्तिकों को लालची कहते है लोग सोचते है क्यों न मैं भी नास्तिकों में सामिल हो जाऊं!
    आप ने एक जगह यह कहा: कई बार धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं का दबाव होने के कारण लोगों को बहुत से अप्रिय, अनुचित और अवांछनीय कार्य भी करते हैं. ऐसे में विचारशील व्यक्तियों का मन धर्म से उचाट हो जाता है.
    पर देखा तो यह गया है कि बहुत से अप्रिय, अनुचित और अवांछनीय कार्य नास्तिक ही अंजाम देते है.
    मैंने अक्सर देखा है कि बहुत से आस्तिक खुद को नास्तिक कहते है मैंने नास्तिकों के ब्लॉग भी पड़े है मुझे नहीं लगता कि वे नास्तिक हैं, बल्कि उनकी विचारधारा ही कुछ और है, बल्कि वे अच्छे लोग है लेकिन उनकी मानसिकता है कि जो लालची है तो आस्तिक है लालची नहीं तो नास्तिक है.
    ईश्वर या धर्म को नहीं माननेवाले व्यक्ति न तो नैतिक होते हैं यह आस्तिकों कि सोच है और न ही उन्हें जीवन के उद्देश्य का बोध होता है.
    आपने कहा: जहाँ तक मेरा अवलोकन है, मैंने धार्मिक व्यक्तियों को भी जीवन के उद्देश्य के बारे में गोलमोल बातें करते ही देखा है. कोई व्यक्ति सदाचार से संयमित जीवन जीने को जीवन का उद्देश्य बताता है तो कोई ईश्वर का साक्षात्कार करके मुक्ति प्राप्त करने में ही जीवन का सार देखता है.
    मैं जानता हूँ आपने आस्तिक कि और अधिक विशेषताएं जान-भूझकर नहीं लिखी.
    आस्तिकों को आपने जो कुछ कहा मुझे बुरा नहीं लगा. पर आपने सिर्फ इमानदार (सज्जन) नास्तिक कि ही महफ़िल देखि है ‘काश आप अधिक नास्तिकता में घुस कर देखते तो सायद आपको पता चलता कि धार्मिकता को नीचा दिखाने कि ऐसी जरूरत ही क्या थी. नास्तिकता कि विशेषता वैसे किसी और तरीके से भी बताई जा सकती थी. धार्मिक बुराई का अंत किसी और तरीके से भी किया जा सकता था.

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  9. amita neerav

    बहुत खूबसूरत… लेकिन संशयात्मक… जैसा कि सुज्ञजी कहते हैं – सार्थक कर्म महज मार्ग है, लक्ष्य नहीं… फिर लक्ष्य का प्रश्न तो जस-का-तस खड़ा है। दर्शन, आध्यात्म हमारे सवालों के जवाब तो देता है, लेकिन वो हमें संतुष्ट नहीं कर पाता। उसके लिए तो हमें ही डूबना पडे़गा।
    हाँ ये सही है कि नास्तिकता और आस्तिकता से मानवीय और नैतिक होने का रत्ती भर संबंध नहीं है। और धार्मिकता… सारे धार्मिक मुझे माफ करेंगे – ये तो ज्यादातर पाखंड ही नजर आता है।

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