Inner Treasure – आंतरिक निधि

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हमारे घर में… हमारे भीतर ही वह सम्पदा छुपी है जिसे हम देख नहीं पाते. हम स्वयं से पूछते हैं, “यह वहां कैसे हो सकती है?”

एक पुरानी कहानी में यह वर्णित है कि शताब्दियों पहले भारत के नगरों में व्यापारी जन शुद्धता और नीतिपूर्वक अपने कार्य करते थे. यह उस काल की बात है जब भारत विश्व का सबसे संपन्न भूभाग था.

ऐसे में एक नगर में किसी व्यापारी ने कुछ अनीतिपूर्ण काम कर दिया. जब दूसरों को इसका पता चला तो उन्होंने उस काल की प्रथा के अनुसार उसे पत्थर मारकर नगर से बाहर निकाल देने का निर्णय लिया. उन दिनों दोषियों की सारी संपत्ति जब्त करके उन्हें पत्थर मारकर नगर से बाहर निकाल दिया जाता था, हांलांकि उन्हें मारा नहीं जाता था. उन्होंने दोषी की पत्नी और बच्चों को अलग कर दिया और उसे एक पेड़ से बाँध दिया. फिर सबने उसपर पत्थर फेंक कर मारे.

पत्थर फेंकनेवालों में एक कम उम्र का लड़का भी था. वह नगर के सबसे धनी व्यापारी का पुत्र था. किसी बड़े व्यक्ति को पत्थर मारकर घायल करने का आनंद कभी-कभार ही तो मिलता है! उसने भी एक छोटा-सा पत्थर उठाया और पूरी ताकत से व्यक्ति की ओर फेंका. पत्थर दोषी व्यापारी के चेहरे पर आँख के नीचे जा लगा. रक्त की धार बह चली.

जब पत्थर मारनेवालों का मन भर गया तब उन्होंने दोषी की पत्नी और बच्चों को छोड़ दिया और वहां से चले गए. पत्नी और बच्चे दोषी व्यापारी के पास दौड़ चले. उन्होंने उसे मुक्त कराया.

लहुलुहान व्यापारी की आँखों से आंसू बह रहे थे. अब उसके पास कुछ न था. शाम ढल रही थी और ऐसे ही उसकी प्रतिष्ठा भी मिट्टी में मिल चुकी थी. अपमानित, लांछित, निर्धन, बेघर – अब वे किसी अन्य नगर की ओर प्रस्थान करेंगे. कहीं अपना कोई सुदूर संबंधी मिल जाने की आस भी बहुत धूमिल ही थी.

पथराई आँखों से धरती की ओर ताकते हुए व्यापारी को कहीं एक चमक सी दिखी. अस्त होते सूरज की किरणों में धूल में कहीं कुछ झिलमिला रहा था. उसने वह चीज़ झुककर उठा ली. यह एक रत्न था, बड़ा-सा बहुमूल्य रत्न. पत्थर फेंकने के दौरान किसी धनी व्यापारी की अंगूठी से यह रत्न किसी तरह छिटककर जमीन में गिर गया होगा, जिसे पत्थर फेंकनेवाले लड़के ने अनजाने में उठाकर व्यापारी को फेंककर मारा.

एक जापानी कविता में कहा गया है:

मुझपर जो भी पत्थर बरसे
उन्हें उठाकर मैंने देखा
उसमें एक मणि भी थी.

जीवन में ऐसा होता रहता है. बुरी घटनाओं और अनुभवों में भी कहीं कुछ छिपा है, जिसे हम तभी देख पाते हैं जब हमारे भीतर अंतर्दृष्टि जागृत होती है.

ज़ेन शिक्षाओं में यह बात दोहराई जाती है: ‘यदि तुम उठाकर देखो तो पाओगे कि हर पत्थर सोने का है’. जब ह्रदय के नेत्र खुलते हैं और सब कुछ स्पष्ट एवं स्वच्छ दिखता है तब मार्ग में पड़े हुए खपरैल के टुकड़े भी स्वर्णिम आभा से दीप्त प्रतीत होते हैं. जीवन का वास्तविक अर्थ इसमें है कि क्षण-प्रतिक्षण हर छोटी-से-छोटी बात में गरिमा और दिव्यता का दर्शन हो.

Source

There is a treasure in our own house which we often don’t see. We can say, ‘Well, how can there be?’

One of the Indian stories tells how the merchants in some of the towns (when India was the richest country in the world) were very strict about business ethics. One man cut some cor­ners. Well, they used to expel such people from the city and stone them ― not kill them ― but stone them and drive them away. So they took everything this man had, tied him to a stake outside the city, held back his wife and child, and threw stones.

There was a little boy there, the son of one of the big merchants. Not often you get the chance to throw a stone at a grown-up! He picks up a sharp stone, and he throws it. It catches the man on the face and just misses his eye. The blood pours down.

Well, then they release his wife and child, and all the people go away. The two of them rush to him and set him free. Now ― he’s got nothing; he’s penniless; he’s disgraced ― in the sunset, the dying sun. He will have to go to the next city. Perhaps he has some faint hope of an uncle somewhere, but it is total destruction.

As he hangs his head and looks down, he sees a gleam; the ray of the dying sun makes a gleam on one of the stones. He bends down and picks it up ― it is a great jewel. The rich merchant had a ring with a big jewel in it; in the excitement he must have knocked it somehow against a brick or something like that, and it fell down. The little boy, not looking, just grabbed the sharp stone and threw it.

There is a Japanese poem:

The stones which were thrown at me —

When I picked it up,

One of them was a jewel.

This comes again and again. There is some­thing hidden even in the terrible experiences we have, which ― if we have spiritual sight and discrimination ― we can find.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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