Three-storied House – तीसरी मंजिल

बुद्ध अपने प्रवचनों में उनके शिष्यों को बहुत सी कथाएं सुनाते थे. यह कथा भी उन्हीं में से एक है.

कभी किसी काल में किसी नगर में दो धनी व्यापारी रहते थे. वे दोनों ही अपने धन और वैभव का बड़ा प्रदर्शन करते थे. सुविधा के लिए हम उनके नाम ‘क’ और ‘ख’ रख लेते हैं.

एक दिन व्यापारी ‘क’ अपने मित्र ‘ख’ के घर उससे भेंट करने के लिए गया. ‘क’ ने देखा कि ‘ख’ का घर बहुत विशाल और तीन मंजिला था. 2,500 साल पहले तीन मंजिला घर होना बड़ी बात थी और उसे बनाने के लिए बहुत धन और कुशल वास्तुकार की आवश्यकता होती थी. ‘क’ ने यह भी देखा कि नगर में सभी निवासी ‘ख’ के घर को बड़े विस्मय से देखते थे और उसकी बहुत बड़ाई करते थे.

अपने घर वापसी पर ‘क’ बहुत उदास था कि ‘ख’ के घर ने सभी का ध्यान खींच लिया था. उसने उसी वास्तुकार को बुलवाया जिसने ‘ख’ का घर बनाया था. उसने वास्तुकार से ‘ख’ के घर जैसा ही तीन मंजिला घर बनाने को कहा. वास्तुकार ने इस काम के लिए हामी भर दी और काम शुरू हो गया.

कुछ दिनों बाद ‘क’ काम का मुआयना करने के लिए निर्माणस्थल पर गया. जब उसने नींव खोदे जाने के लिए मजदूरों को गहरा गड्ढा खोदते देखा तो वास्तुकार को बुलाया और पूछा कि इतना गहरा गड्ढा क्यों खोदा जा रहा है.

“मैं आपके बताये अनुसार तीन मंजिला घर बनाने के लिए काम कर रहा हूँ”, वास्तुकार ने कहा, “सबसे पहले मैं मजबूत नींव बनाऊँगा, फिर क्रमशः पहली मंजिल, दूसरी मंजिल और तीसरी मंजिल बनाऊंगा.”

“मुझे इस सबसे कोई मतलब नहीं है!”, ‘क’ ने कहा, “तुम सीधे ही तीसरी मंजिल बनाओ और उतनी ही ऊंची बनाओ जितनी ऊंची तुमने ‘ख’ के लिए बनाई थी. नींव की और बाकी मंजिलों की परवाह मत करो!”

“ऐसा तो नहीं हो सकता”, वास्तुकार ने कहा.

“ठीक है, यदि तुम यह नहीं करोगे तो मैं किसी और से करवा लूँगा”, ‘क’ ने नाराज़ होकर कहा.

उस नगर में कोई भी वास्तुकार नींव के बिना वह घर नहीं बना सकता था, फलतः वह घर कभी न बन पाया.

* * * * * * * * * *

Once there was an ignorant rich man who, one day, went to another rich man’s three-storied house. Struck with admiration by the imposing, spacious, airy and well – lighted building, he said to himself, “I’m no less rich than he. Why don’t I have the same house built as this one?”

Thereupon, he sent for a carpenter and said, “Can you construct an imposing house exactly like that one?”

That carpenter replied, “It’s I who built that one.”

He went on, “Now you may build a house like that one for me.”

The carpenter began first to level the ground, afterward laid the foundation stones and then drove in piles for walls. The stupid man could not make it out when he saw the worker doing all these. He asked,”What are you doing now?”

The carpenter replied, “I’m building three floors.”

The stupid man went on, “I don’t want the two floors below. You had better start building from the third floor for me.”

The carpenter answered, “It’s impossible. If I don’t begin with the ground floor, how can I build the second? If I don’t build the two below, how can I build the third floor?”

The stupid man persisted saying, “But I don’t need the two floors below, only the top.”

Hearing those words, his contemporaries sardonically laughed at him. They all said how could one have the top floor done without building the lower floors?

Sakyamuni’s four degrees of disciples who are unable to practice earnestly Buddhism and respect the Three Precious Ones, wanted to attain the path of deliverance by leading an idle life. They said, “We don’t need the first three degrees below, but seek only that of Arahant’s.”

There was no difference between the stupid rich man and those disciples who were also laughed at by their contemporaries.

Image credit

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 7 comments

  1. डॉ. रामकुमार सिंह

    अति सुन्‍दर, बु्द्ध की उर्जा को सारनाथ में जाकर महसूस किया, शीघ्र लिखूंगा अपने पेज पर।
    फिलहाल पढिये – ‘फिर दिल्‍ली में बात चली है सारा सिस्‍टम बदलेगा…………
    ‘सर्जना’ पर

    Like

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