This too shall pass – यह भी गुज़र जाएगा

Muslim Grave Stone - Selcuk, Turkeyएक सूफ़ी कहानी है फरीदुद्दीन अत्तार की लिखी हुई. जब मैने इसे पढ़ा तो लगा कि यह हमें जीवन में अनित्यता का बोध करा सकती है.

अत्तार ने एक दरवेश के बारे में लिखा जो रोज़ रात को बिलानागा बंदगी करता था. जो कुछ उसने अपने मुर्शिदों से सीखा उसका अभ्यास करता था. एक बार उसने हज करने का सोचा. वह हज के लिए महीनों लंबी मुश्किल यात्रा पर निकला और चलते-चलते एक गाँव पहुँचा. वह भूख और थकान से बेदम था. गाँव अनजाना था. उसने एक राहगीर से पूछा, “मुझ दरवेश को ठहरने के लिए कहाँ जगह मिल सकती है?”. उसने जवाब दिया, “यहाँ शाक़िर नाम का शख्स रहता है, आप उसके घर चले जाइए. वह इस इलाके का सबसे अमीर आदमी है और बहुत रहमदिल और बड़े दिल वाला है. वैसे तो इस इलाके का सबसे बड़ा सेठ हमदाद है लेकिन बेहतर यही होगा कि आप शाक़िर के घर जाएँ”.

दरवेश शाक़िर के घर गया. शाक़िर का अर्थ होता है – जो शुक्राना करता रहता है. जब उसके पास पहुँचा तो जैसा उसके बारे में सुना था शाकिर बिल्कुल वैसा ही निकला. शाक़िर ने उसे अपने घर में बड़ी इज्ज़त देकर पनाह दी. भोजन दिया, बिस्तर दिया. शाक़िर की बीवी और बच्चों ने उसकी बहुत ख़ातिर की. दरवेश दो दिन वहां ठहरा. तीसरे दिन जब वह चलने लगा तो उन्होंने उसको रास्ते के लिए खाना, पानी, खजूरें आदि दिया. चलते समय दरवेश ने कहा, “शाक़िर, तू कितना अच्छा है| तू कितना अमीर है, तूने मुझे इतना कुछ दिया पर इस बारे में ज़रा भी सोचा, जबकि तू मुझे जानता भी नहीं है.”

शाक़िर ने अपने मकान की ओर नज़र दौड़ाई और कहा, “गुज़र जाएगा”. दरवेश शाकिर की बात पर पूरे रास्ते सोचता रहा क्योंकि उसके मुर्शदों ने कहा था कि जल्दबाज़ी में कोई फैसला मत लिया करो और जब किसी से बात सुनो तो उसकी गहराई में जाओ. वह अपने दिल की धड़कनों को सुनते हुए सोच-विचार करता रहा कि शाक़िर ने अपनी अमीरी और दौलत की ओर इशारा करते हुए ये क्यों कहा कि ‘गुज़र जाएगा’. वह आने वाली किसी घटना के बारे में कह रहा था या फिर ऐसे ही बोल गया? खैर, दरवेश मक्का पहुँचा. हज करने के बाद वह साल भर तक वहीं रुका रहा. साल भर बाद वहन से लौटते समय उसने शाकिर से मिलने का तय किया. जब वह वहाँ पहुँचा तो उसने देखा कि शाक़िर का मकान ही नहीं है! लोगों ने बताया कि अब वह हमदाद के घर में नौकर है. उन्होंने बताया कि शाकिर का मकान बाढ़ में बह गया. उसके मवेशी भी बह गए और वह बहुत गरीब हो गया इसलिए उसने हमदाद के घर में नौकरी कर ली.

दरवेश बहुत हैरान हुआ कि इतने नेक बन्दे को इतनी आफतें झेलनी पडीं! फिर वह हमदाद के घर गया और वहां शाक़िर फटे-पुराने कपड़े पहने मिला. उसकी बीवी और बेटियाँ भी उसके साथ में थीं और उनकी हालात भी ऐसी ही थी. दरवेश ने शाकिर से कहा, “मुझे यह देखकर बड़ा दुख हुआ कि तेरे जैसे नेक आदमी के साथ इतना बुरा हुआ.” शाक़िर ने गम्भीर स्वर में कहा, “यह भी गुज़र जाएगा”.

हमदाद भी नेक आदमी था, उसने भी दरवेश को पनाह दी. कुछ समय वह यहीं रहा. जब दरवेश जाने लगा तो शाक़िर ने उतना तो नहीं पर फिर भी कुछ रूखा-सूखा खाने को साथ में दिया. दो-चार साल गुज़र गए पर दरवेश हमेशा शाक़िर को याद करता. उसका मन फिर से मक्का की यात्रा करने की ख्वाहिश करने लगा. वह उसी रास्ते से गुज़रा और हमदाद के घर गया. उसे पता चला कि इस बीच हमदाद की मौत हो गई है और उसने अपना सब कुछ शाक़िर को दे दिया क्योंकि उसकी अपनी कोई औलाद नहीं थी.

शाक़िर फिर से अमीर हो गया. उसके बदन पर फिर रेशमी वस्त्र आ गए. उसकी बीवी गहने पहनने लगी और बेटियों की शादी अमीर घरानों में हो गयी. दरवेश शाकिर से मिलने पर बार-बार कहता रहा, “वाह शाक़िर! इतना अच्छा! खुदा ने खूब रहमत की तेरे ऊपर!”. और शाक़िर कहता, “यह भी गुज़र जाएगा”.

कुछ दिन दरवेश उसके घर ठहरा, फिर मक्का गया. इस बार वह वहां दो साल रहा. वापसी में जब वह शाकिर के गाँव पहुंचा तो उसे पता चला कि शाक़िर मर चुका है. फकीर ने लोगों से पूछा, “उसकी कब्र कहाँ है? मैं उसकी कब्र पर जाकर नमाज़ पढ़ूंगा और उसके लिए दुआ करूँगा.” लोगों ने शाक़िर की कब्र का पता दिया. जब वह कब्र के पास देखा उसपर एक तख़्ती लगी हुई थी जिस पर लिखा था, “यह भी गुज़र जाएगा”. पढ़कर दरवेश बहुत रोया, कहता, “यह भी गुज़र जाएगा, अब इसमें भी और कौन सी गहराई की बात छुपी है!?”

दरवेश फिर अपने डेरे को निकला. कई साल गुज़र गए. एक रोज़ जब एक काफ़िला मक्का की ओर जा रहा था तो उसे लगा कि जिंदगी का आखिरी हज भी कर लिया जाए. वह चल तो सकता नहीं था लिहाज़ा ऊँट पर सवार होकर निकल पड़ा. रास्ते में शाक़िर का गाँव आना था. उससे रहा न गया और वह शाक़िर की कब्र पर फूल चढ़ाने और दुआ करने के लिए कब्रिस्तान की ओर चल दिया. जब वह वहाँ पहुँचा उसने पाया कि शाक़िर की कब्र का तो नामोनिशान ही नहीं था. लोगों से पूछा तो पता चला कि एक जलजला आया था जिसमें सब तहस-नहस हो गया. वह कब्र कहाँ गई, कुछ पता नहीं. इस बीच इतने साल गुज़र गए और सब बदल गया. जहाँ उसकी कब्र थी, अब वहाँ आबादी हो गई थी.

दरवेश को शाक़िर का यह वचन पूरी तरह समझ आ गया कि “यह भी गुज़र जाएगा”.  उसकी तो कब्र भी गुज़र गई.

यह कहानी मैंने इस ब्लॉग से लेकर संपादित की है.

* * * * * * * * * *

A dervish who had traveled long and hard through the desert finally came to civilization after a long journey. The village was called Sandy Hills, and it was dry and hot… . The dervish politely asked … where he could find food and lodging for the night. “Well,” said the man, scratching his head, “we don’t have such a place in our village, but I am sure Shakir would be happy to provide for you tonight.” Then the man gave directions to the ranch owned by Shakir, whose name means “one who thanks the Lord constantly.” …… As it turned out, Shakir was a very hospitable and kind person. He insisted that the dervish stay a couple of days in his house….At the end of his stay, they even supplied him with plenty of food and water for the journey. On his way back to the desert, the dervish could not help puzzling over the meaning of Shakir’s last words at the time of farewell. The dervish had said, “Thank God that you are well off.”… Shakir had replied, “Don’t be fooled by appear- ances, for this too shall pass.”

During his years on the Sufi path the dervish had come to understand that anything he heard or saw during his journey offered a lesson to be learned and thus was worthy of contemplation. In fact, that was the reason he had undertaken the journey in the first place—to learn more… .And so he passed five more years of traveling to different lands, meeting new people, and learning from his experiences along the way. Every adventure offered a new lesson to be learned… .

One day, the dervish found himself returning to Sandy Hills, the same village at which he had stopped a few years before. He remembered his friend Shakir and asked after him. “He lives in the neighboring village, ten miles from here. He now works for Haddad,” a villager answered… . Happy at the prospect of seeing Shakir again, [the dervish] rushed toward the neighboring village. At Haddad’s marvelous home, the dervish was greeted by Shakir, who looked much older now and was dressed in rags. “What happened to you?” the dervish wanted to know. Shakir replied that a flood … had left him with no cattle and no house. So he and his family had become servants of Haddad… . This turn of fortune, however, had not changed the kind and friendly manner of Shakir and his family. They graciously took care of the dervish … and gave him food and water before he left. As he was leaving, the dervish said, “I am so sorry for what has happened to you and your fam- ily. I know that God has a reason for what He does.” “Oh, but remember, this too shall pass.”

Shakir’s voice kept echoing in the dervish’s ears. The man’s smiling face and calm spirit never left his mind… .…

The dervish traveled to India. Upon returning to his homeland, Persia, he decided to visit Shakir one more time… . But instead of finding his friend Shakir there, he was shown a modest grave with the inscription, “This too shall pass.” … “Riches come and go,” thought the dervish to himself, “but how can a tomb change?”

From that time on, the dervish made it a point to visit the tomb of his friend every year… . However, on one of his visits, he found the cemetery and the grave gone, washed away by the flood… . He lifted his head to the sky and, as if discovering a greater meaning, … said, “This too shall pass.”

When the dervish had finally become too old to travel, he decided to settle down… . People came from all over to have the benefit of his wisdom. Eventually his fame spread to the king’s great advi- sor, who happened to be looking for someone with great wisdom.

The fact was, the king desired a ring be made for him. The ring was to be a special one: it was to carry an inscription such that if the king was sad, he could look at the ring and it would make him happy,and if he was happy, … it would make him sad… . Many men and women came forward with suggestions for the ring, but the king liked none of them. So the advisor wrote to the dervish … ask-ing for help… . A few days later, an emerald ring was made and presented to the king. The king, who had been depressed for days, reluctantly put the ring on his finger… . Then he started to smile, and a few mo- ments later, he was laughing loudly. On the ring were inscribed the words, “This too shall pass.”

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 17 comments

  1. ashok saluja

    निशांत जी ,नमस्कार !
    पिछले दिनों मेरी बेटी ने एक ‘एस एम् एस’ मुझे पढवाया था :-
    बादशाह अकबर ने बीरबल से कहा”आज कुछ ऐसा लिखो कि सुख में पढ़ो तो
    दुःख हो और दुःख में पढ़ो तो सुख हो ” बीरबल ने लिखा :-
    ” ये वक्‍त भी गुज़र जायेगा ”

    खुश रहें !
    शुभकामनायें !

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  2. SANTOSH KUMAR

    Ashok Saluja ji no jo akbar birbal ke baare me comment post kiya hai. Is kahani ko usi pariprekshy me dekha jana chahiye.
    Ye vakya Dukh aur Sukh don hi Paristhitiyo me hame jeevan ke nirnay lene mdad karega.
    Sukh Samridhi ke Samay me ghamand nahi hona chahiye, Kyoki wo gujarne waali hai use sahi jagah lagaya jaye.
    Dukh me ati shokakul nahi kyoki wo bhi gjar jaayega.
    So Nice Story with a message.

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