चोर – Theif

compassionज़ेन गुरु बान्केई ने जब जनसाधारण के लिए ध्यान-साधना के शिविर लगाने शुरू किये तो जापान के कई हिस्सों से लोग उनमें भाग लेने के लिए आने लगे. ऐसे ही एक सत्र में एक शिष्य चोरी करते हुए पकड़ा गया. लोगों ने इसकी सूचना बान्केई को दी और उनसे कहा कि चोर को शिविर से निकाल दिया जाए. बान्केई ने उनके अनुरोध को नज़रंदाज़ कर दिया.

वह शिष्य दोबारा चोरी करते हुए पकड़ा गया. दूसरी बार भी बान्केई ने इस प्रकरण पर ध्यान नहीं दिया. शिविर में भाग लेनेवाले अन्य शिष्य इस बात से रुष्ट हो गए. उन्होंने सम्मिलित रूप से एक पत्र लिखा और बान्केई को बताया कि यदि चोर व्यक्ति को शिविर से बाहर नहीं निकला गया तो वे सभी शिविर का त्याग कर देंगे.

पत्र को पढ़कर बान्केई ने सभी को बुलाया और उनसे कहा, “आप सभी बुद्धिमान व्यक्ति हैं. आपको सही और गलत की पहचान है. यदि आप यहाँ नहीं पढ़ेंगे तो आपको कहीं और पढ़ने का अवसर मिल ही जाएगा. लेकिन आपके ही बीच आपका यह बेचारा भाई है जिसे अच्छे और बुरे कर्मों का बोध नहीं है. यदि मैं उसे शिविर से निकाल दूं तो वह कहाँ जाएगा? कौन उसे सन्मार्ग पर लाएगा? इसलिए मैं तो उसे यहाँ से नहीं निकाल सकता. यदि आप सभी चाहें तो शिविर छोड़कर जा सकते हैं.”

चोर शिष्य के चेहरे पर अश्रुओं की धारा बह चली. दूसरों की वस्तुएं चुराने की कामनाएं सब तिरोहित हो गयीं.

Bankei was a famous Zen teacher in Japan long ago. Students from all over came to his monastery for months of study and meditation. To make it through such intensive training is not an easy thing: There is much hard work to be done, many hours of meditation, little sleep, and only small, spare meals.

Once during the time at the monastery, a student found that all he could meditate on was his empty stomach. It was also all that he thought about during work and all he thought of even when eating! Finally, he could not stand it a day longer. In the night, ever so quietly, he sneaked into the kitchen, hoping to make off with something tasty and filling. But the head cook—always alert even when asleep—awoke and caught him.

The next morning, the matter was brought to Bankei in hopes that the student would be forced to leave. However much to the group’s dismay, Bankei thanked them for the information and acted as if nothing had happened.

Just a few days later, the same pupil was caught stealing food from the kitchen again. The students were even angrier. It was in the middle of the night when the thief was apprehended, but they wrote a petition right there and then to their teacher Bankei. They each vowed to leave the monastery the next day if the thief was not expelled.

When Bankei read the petition the next morning, he sighed. He went outside to the monastery gardens and paced thoughtfully. At last he asked that all the monks and students—including the thief—be brought together. They gathered in the temple hall, becoming quiet when Bankei entered.

“Many of you have come from far away to be here,” announced Bankei. “Your hard work and perseverance are to be praised. You are excellent, dedicated students. You have also clearly demonstrated that you know wrong from right. If you wish, you may leave this monastery and find another teacher. But I must tell you that the thief will remain, even as my only student.”

The students were appalled! A murmur of discontent hummed about the room. How could their teacher ask them to leave?

Who had done the wrong thing? Only the thief! Feeling anger of the other students, the thief in their midst hung his head in disgrace.

“My friends,” Bankei gently continued, “this thief does not understand the difference between right and wrong as you do. If he leaves, how will these things be learned? He needs to stay here so he can also understand.”

When the thief heard these words, he felt profoundly moved. Tears sprung to his eyes. But even through his shame in front of the others, he felt Bankei’s deep compassion. He knew he would not steal anymore.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 16 comments

  1. सुज्ञ

    जिसे अच्छे और बुरे कर्मों का बोध नहीं है. यदि मैं उसे शिविर से निकाल दूं तो वह कहाँ जाएगा?
    सम्यक विवेक!!

    निर्मल व सात्विक गुणधारी के लिए यह सामान्य विवेक है। ऐसे गुरू मिलने मुश्किल भी नहीं!!

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  2. संतोष त्रिवेदी

    यह प्रसंग बिलकुल उसी तरह का है जैसा साधु और बिच्छू का ,जिसमें बार-बार पानी में डूबते बिच्छू को वह साधु बचाता रहा ,जबकि वह उसे काट लेता था.लोगों के मना करने पर साधु का जवाब था,”जब यह अपनी दुष्टता का स्वभाव नहीं छोड़ सकता तो मैं अपना दयाभाव क्यों छोड़ दूँ,यह मेरा स्वभाव है.”

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  3. वाणी गीत

    विशिष्ट धर्म गुरु के सम्बन्ध में तो तो ठीक है प्रसंग, मगर आम आदमी के लिए ऐसा करना मुश्किल और रिस्की भी है …मगर शायद यही विशेषताएं ही तो उन्हें गुरु बनाती हैं !

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  4. rajeysha

    हे प्रभु हमें इतना धैर्य दे कि‍ यदि‍ कोई हमारा खून करे तो हम अपने को लहूलुहान होता देख सकें, यह भी देख सकें कि‍ दर्द क्‍या होता है और यह भी देख सकें कि‍ “क्‍या है जो देह के बाद भी बचता है।” हमारा मन इतना पवि‍त्र हो कि‍ वो खूनी को स्‍वाभावि‍क रूप से क्षमा कर दे। शायद बान्‍केई ने ये प्रार्थना कभी की हो।

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  5. amita neerav

    ये जीवन का आदर्श है। शायद आदर्श होते ही इसलिए है कि हम अपने जीवन को इसके करीब ले जाने की कोशिशें करें। हकीकत में सभ्यता ने इंसान को बहुत बदल दिया है, अब शायद ही किसी को ये पता नहीं होता है कि ‘वो’ क्या कर रहा है, यदि इतनी मासूमियत बची रहती तो फिर कोई दुनिया बहुत जटिल नहीं होती।
    बहरहाल, बहुत ही अच्छी कहानी… बधाई निशांत

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