The Stingy Artist – लालची चित्रकार

monk painter


गेस्सेन नामक ज़ेन सन्यासी बहुत अच्छा चित्रकार भी था. कोई भी चित्र बनाने से पहले वह चित्र बनवानेवाले से पूरी रकम एकमुश्त ले लेता था. वह बहुत महंगे चित्र बनाता था इसीलिए सब उसे “लालची चित्रकार” कहते थे.

एक गीशा* ने गेस्सेन को चित्र बनाने के लिए बुलाया. गेस्सेन ने उससे पूछा, “आप मुझे कितना मेहनताना दे सकती हैं?”

“जितना तुम चाहो”, गीशा ने कहा, “लेकिन तुम्हें पूरा चित्र मेरे सामने ही बनाना होगा”.

गेस्सेन मान गया और गीशा के बताये दिन और समय पर चित्र बनाने का समान लेकर वहां पहुँच गया. उस दिन गीशा ने अपने संरक्षक के लिए दावत का आयोजन किया हुआ था.

गेस्सेन ने गीशा द्वारा बताये विषय पर शानदार चित्र बनाया. चित्र के पूरा हो जाने के बाद उसने गीशा से बड़ी ऊंची रकम अपने मेहनताने के तौर पर माँगी.

गीशा ने वह रकम गेस्सेन को दे दी. फिर वह अपने संरक्षक की ओर मुड़ी और उससे बोली, “यह कलाकार पैसे का भूखा है. इसके बनाए चित्र लाजवाब हैं लेकिन इसके दिमाग में गंदगी भरी है. पैसों के लिए तो ये अपनी आत्मा भी बेच दे. इतने लालची आदमी के बनाये चित्र किसी प्रदर्शनी में रखने लायक नहीं हैं. इन्हें तो मैं अपने पेटीकोट की जगह इस्तेमाल करूंगी.”

फिर उसने अपना एक पेटीकोट गेस्सेन को दिया और उसपर भी एक चित्र बनाने को कहा.

इस बार भी गेस्सेन ने पूछा, “इसके लिए मुझे कितने पैसे मिलेंगे?”

“जितना तुम मांगो”, गीशा ने कहा.

गेस्सेन ने इस बार भी एक ऊंची रकम कही. गीशा के मनमाफिक चित्र बनाने के बाद वह अपने पैसे लेकर चला गया.

बाद में कभी सबको यह पता चला कि गेस्सेन इन कार्यों को पूरा करने के लिए पैसे जमा कर रहा था:

गेस्सेन के प्रांत में अक्सर अकाल की स्थिति बन जाती थी. ऐसे समय भी अमीर लोग गरीबों की मदद नहीं करते थे इसलिए गेस्सेन ने एक गुप्त अन्नकोश बनवाया और उसमें विपत्तिकाल के लिए भरपूर अनाज भरकर रखा ताकि अकाल में कोई भूखा न मरे.

गेस्सेन के गाँव से राजमार्ग को जोड़नेवाली सड़क की दशा अत्यंत खराब थी. मार्ग दुर्गम होने के कारण रोगी, वृद्ध, और असहाय बीच रास्ते ही दम तोड़ देते थे. गेस्सेन ने अच्छी सड़क बनवाने की व्यवस्था की.

गेस्सेन के गुरु की अंतिम इच्छा थी कि उनकी भूमि पर भगवान् बुद्ध का एक मंदिर बने. गुरु की मृत्यु के कुछ समय बाद गेस्सेन ने उनकी अंतिम इच्छा को पूर्ण कर दिया.

इन तीन कार्यों के पूरा हो जाने के बाद गेस्सेन ने चित्रकारी को तिलांजलि दे दी और पहाड़ों पर चला गया. उसके बारे में फिर कभी कुछ पता नहीं चला.

* गीशा जापान में रईसों का मनबहलाव करती हैं.

* * * * * * * * * *

Gessen was an artist monk. Before he would start a drawing or painting he always insisted upon being paid in advance, and his fees were high. He was known as the “Stingy Artist.”

A geisha once gave him a commission for a painting. “How much can you pay?” inquired Gessen.

“Whatever you charge,” replied the girl, “but I want you to do the work in front of me.”

So on a certain day Gessen was called by the geisha. She was holding a feast for her patron.

Gessen with fine brush work did the painting. When it was completed he asked the highest sum of his time.

He received his pay. Then the geisha turned to her patron, saying: “All this artist wants is money. His paintings are fine but his mind is dirty; money has caused it to become muddy. Drawn by such a filthy mind, his work is not fit to exhibit. It is just about good enough for one of my petticoats.”

Removing her skirt, she then asked Gessen to do another picture on the back of her petticoat.

“How much will you pay?” asked Gessen.

“Oh, any amount,” answered the girl.

Gessen named a fancy price, painted the picture in the manner requested, and went away.

It was learned later that Gessen had these reasons for desiring money:

A ravaging famine often visited his province. The rich would not help the poor, so Gessen had a secret warehouse, unknown to anyone, which he kept filled with grain, prepared for those emergencies.

From his village to the National Shrine the road was in very poor condition and many travellers suffered while traversing it. He desired to build a better road.

His teacher had passed away without realizing his wish to build a temple, and Gessen wished to complete this temple for him.

After Gessen had accomplished his three wishes he threw away his brushes and artist’s materials and, retiring to the mountains, never painted again.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 19 comments

  1. G Vishwanath

    कहानी अच्छी लगी
     अभी कुछ दिन पहले एक नया Ipad2 खरीदा हूँ और यह टिप्पणी उसी ipad2 पर Hindiwriter App की सहायता से टाईप कर रहा हूँ

    देखते हैं यह टिप्पणी  ठीक से छपती है कि नहीं
    शुभकामनएं
    जी विश्वनाथ

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    1. Nishant

      Ipad 2 के लिए बधाई स्वीकारें.
      अब थोड़ा प्रयास करके इनस्क्रिप्ट टाइपिंग भी सीख लें ताकि इस तरह के apps पर निर्भर न रहना पड़े. तब आप सीधे ही कमेंट बॉक्स में टाइप कर सकेंगे.

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  2. Gyandutt Pandey

    सुन्दर। फण्ड रेजिंग पुनीत कार्य है अगर अंत पुनीत है।
    गेस्सेन बनना हो या महामना मदन मोहन मालवीय – महामना बनना चाहूंगा। शायद इस लिये भी कि चित्रकारी नहीं आती।

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  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

    आजकल के प्रबंधन पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाता है कि अच्छा होना अच्छी बात है लेकिन अच्छा होने से ज्यादा जरूरी ‘अच्छा दिखना’ है। चित्रकार गेस्सेन नेकनीयत होते हुए भी लोगों को लालची लगता रहा। उसे किसी प्रबंधन गुरू से भेंट नहीं हुई थी शायद। 🙂

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