दो साल बाद…

यह पोस्ट इस ब्लौग के दो साल पूरे होने के विषय पर लिखी है. यदि इसे पढ़ने में आपकी रूचि न हो तो अन्य पोस्ट पढ़ने के लिए कृपया आर्काइव पर क्लिक करें.

हिंदीज़ेन ब्लॉग पर मैं पिछले दो सालों से काम कर रहा हूँ. यह पहले ब्लॉगर में था और 1 मई, 2009 से wordpress.com के कस्टम डोमेन पर है. अब तक इसमें 460 से भी अधिक पोस्टें छप चुकी हैं. इसके लिए सामग्री जुटाने के लिए मैं अभी भी जूनून की हद तक एक लिंक से दूसरी लिंक तक घूमता रहता हूँ ताकि कहीं से अनुवाद करने लायक कोई बेहतरीन कहानी, प्रसंग, ब्लॉग पोस्ट या जीवन दर्शन के सूत्र मिल जाएँ.

इन दो सालों में मैंने इक्का-दुक्का पोस्ट में ही व्यक्तिगत अनुभवों और परिस्तिथियों के बारे में लिखा है. कुछ एक बार ऐसा भी किया है कि किसी पोस्ट में विदेशी लेखक के अनुभव से मिलता-जुलता कोई अपना अनुभव मैंने शामिल कर दिया क्योंकि उसका अनुभव उसके देशकाल के अनुरूप था और वह भारतीय पाठकों को पढ़ने में अरुचिकर या अजीब लगता.

इस तरह पिछले दो साल से मैंने आप सभी को मेरी विचारप्रक्रिया और जीवनानुभव से वंचित रखा है. इसका जो कारण मुझे समझ में आता है वह यह है कि मैं अब पहले की तरह मुखर नहीं रहा. मेरे बचपन के दोस्त भी इस बात को मानते हैं कि मुझमें अतिशय गांभीर्य आता जा रहा है और मेरा जीवन अब थिर हो चला है. लेकिन उनके यह सोचने में बहुत ज्यादा सत्य नहीं है. मैं अभी भी गप्पें हांकने, ठहाके लगाने, और गीत गुनगुनाने वाला निशांत हूँ पर यह ज़रूर है कि मेरा लड़कपन तो कभी का विदा हो चला है. और ऐसा होना भी चाहिए. जीवन अवस्था के हर चरण की अपनी गरिमा और मर्यादा होती है. कई वर्ष नौकरी में बिताने और अपने परिवार को प्राथमिकता पर रखनेवाले व्यक्ति के लिए अब बेवजह की हीहीफीफी शोभा नहीं देती. 🙂

तो… अब मन कर रहा है कि ब्लौगिंग में बिताये अपने दो सालों का लेखा-जोखा आपके सामने रखा जाए. मैं यहाँ यह नहीं बता पाऊँगा कि मैं इस बीच किन ब्लौगरों से मिला या मैंने कितनी ब्लॉगर मीट आदि अटेंड किये. अपने प्रिय ब्लौगर प्रवीण पाण्डेय जी से मैं कुछ समय पहले ही मिला था और उन्हें यह बताया था कि अब किस्से-कहानियों को अनूदित करने के साथ ही कुछ अपना, … कुछ अपने बारे में भी लिखना चाहता हूं. अपने इस कामकाज का लेखा-जोखा लेने से बेहतर भला अब क्या होगा? इस प्रकार मेरी यह पोस्ट पिछले दो सालों की चुनौतियों, समस्याओं, और इस दौरान मिले सबक पर केन्द्रित होगी. मुझे लगता है कि यह जानना सभी के लिए रोचक भी होगा और महत्वपूर्ण भी.

मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि यह पोस्ट मुख्यतः ब्लौगरों द्वारा पढ़ी जायेगी और हर ब्लौगर के भीतर उसका प्रिय ब्लॉग ठीक उसी प्रकार उपस्थित है जैसे मेरे भीतर हिंदीज़ेन मौजूद है. हम ब्लौगर लोग अपने ब्लॉग से बहुत प्यार करते हैं. यह हमारे लिए दुनिया की ओर खुलनेवाले नई खिड़की है. सालों तक हम खुद को तलाशने और व्यक्त करने के जतन करते रहे, फिर कहीं जाकर तकनीक की तरक्की से यह मौका हमारे सामने आया है कि हम अपने कम्यूटर पर बैठे रहकर दुनिया भर को अपने विचारों से प्रभावित कर सकते हैं. यह कमाल की चीज़ है. तारीफ करने बैठूं तो पोस्ट शायद ख़तम होने का नाम नहीं लेगी इसलिए अब काम की बात की ओर लौटता हूँ.

पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अपनी गलतियों की ओर ध्यान जाता है. पुरानी पोस्टों में अभी बहुत सुधार की गुंजाइश है लेकिन नई पोस्टें लगाना और दूसरे ब्लॉग पढना इतना समय मांगता है कि उसे अनिश्चितकाल तक के लिए टाल दिया है. अपनी गलतियाँ हम पहचानने लायक हो जाएँ यह भी मेरे लिए बहुत संतोषजनक बात है. जो ब्लौगर बंधु मेरे कार्यालयी उत्तरदायित्वों के बारे में जानते हैं वे समझ सकते हैं कि मैंने अपने काम को अनुवाद पर केन्द्रित करना ही क्यों बेहतर समझा. पढ़ने-लिखने से कुछ सालों तक कटे रहने के कारण अध्ययन और चिंतन में जो ठहराव आता जा रहा था वह अब छंट रहा है. ब्लौगिंग ने भाषा को समृद्ध किया है और विचारों को गहराई दी है. यहाँ सबसे अच्छी बात यह है कि कोई भी ब्लौगर केवल एक ही विषय के इर्द-गिर्द सदैव नहीं घूम सकता. चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने उसे अपनी रुचियों से इतर बहुत कुछ पढ़ने को मिलता रहता है जो उसकी समझ और ज्ञान में वृद्धि करता है. यह तो सभी मानते हैं कि पढ़ा-लिखा कभी व्यर्थ नहीं जाता. रोजाना इतना कुछ पढ़ने को मिलता रहता है कि भूलने की दर भी खतरनाक तरीके से बढ़ चली है. ऐसे में मैंने एवरनोट का सहारा लिया. इसपर मैंने एक पोस्ट लिखी है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं.

ब्लौगिंग से दूर रहना नियमित ब्लौगर के लिए कठिन है लेकिन कभी-कभी यह ज़रूरी भी है. कम्प्यूटर के सामने रोजाना दो-तीन घंटे तो वे ब्लौगर भी बैठते ही होंगे जो कभी-कभार अपनी पोस्ट लिखते हैं. मेरे विचार से ब्लौगिंग को इतना समय देना ही पर्याप्त है. परिवार के प्रति दायित्व पूरे करने भी ज़रूरी हैं. मेरे साथ यह अच्छा हुआ कि घर में सभी ने यह समझा कि मुझे जिस काम में आनंद मिलता हो वह मैं ज़रूर करूं क्योंकि सुबह सात बजे से शाम के सात बजे तक का वक़्त दैनिक कर्मों में, आफिस में काम और आने-जाने में खप जाता था और मैं कोई रचनात्मक कर्म नहीं कर पाता था.

ब्लॉग के माध्यम से मैंने लोगों से जुड़कर संवाद करने के बारे में हमेशा गंभीरता से सोचा है पर इसके लिए समय के साथ-साथ एक जुड़ाव की भावना भी चाहिए जिसकी मुझमें कुछ कमी है. अव्वल तो ब्लॉग की सम्पूर्ण सामग्री सारगर्भित होती है और उसपर बहुधा कोई विमर्श की गुंजाईश नहीं होती. कभी-कभी किसी पोस्ट में विचार-विमर्श के सूत्र दिखते हैं पर आमतौर से ऐसा नहीं होता कि पोस्ट पब्लिश होने के दो या तीन दिन बाद भी कोई हलचल होती रहे. इसीलिए मैं अधिकतर पोस्टों को ‘जस की तस’ ही रहने देता हूँ. यदि हम हर वस्तु में जूनून की हद तक सुधार करते जायेंगे तो उसका स्वाभाविक जायका खो बैठेंगे. एक सीमा के बाद हर चित्रकार को अपना ब्रश रखना ही पड़ता है अन्यथा उसकी पेंटिंग overworked लगने लगती है. सीखने का भारतीय सिद्धांत सर्वश्रेष्ठ है – करत-करत अभ्यास के … मैं स्वतः उद्घाटित होनेवाली छोटी-छोटी चीज़ों से सीख लेता रहता हूँ.

एक बार एक मित्र ने मुझसे ब्लॉग लिखने के बाद व्यक्तित्व में आनेवाले परिवर्तनों के बारे में पूछा था. आप जानते हैं कि यह ब्लॉग प्रेरणा और सरलता पर केन्द्रित है पर मुझसे सम्पूर्ण सकारात्मकता की आशा करना जल्दबाजी होगी. मैं अभी भी नकारात्मकता को अपने ऊपर हावी होने से रोक नहीं पाता. मैं जल्दी क्रोधित हो जाता हूँ और कभी-कभी अपने दफ्तर की दिक्कतों को घर में लेकर आ जाता हूँ. बाहर की चिल्लपों का सामना करके जब घर आता हूँ तो शांति चाहता हूँ पर कभी-कभी बच्चों पर गुस्सा कर बैठता हूँ. मैं जानता हूँ कि बच्चे बहुत छोटे हैं और मुझे देखकर उत्साहित हो जाते हैं. ऐसे में उनपर नाराजगी निकालना बुरी बात है. फिर भी मैं यह जोर देकर कहूँगा कि ये बातें अब धीरे-धीरे ही सही पर छूटती जा रही हैं. अब मैं अपने हौसलों को आसानी से पस्त नहीं होने देता. मैं नयी चीज़ें सीखता हूँ. अपनी बहुत सी बुरी आदतों से मैं निजात पा चुका हूँ. अभी बहुत कुछ सीखना और करना बाकी है.

बहरहाल… यहाँ मैं आपसे अपने ब्लॉग अनुभव से जुड़ी एक रोचक बात बांटना चाहता हूँ जिसे मैंने कभी भी किसी से शेयर नहीं किया है. पिछले एक साल से मुझे इस ब्लॉग पर बेहद बुरी भाषा में कमेन्ट मिल रहे हैं. इन कमेंट्स में बहुत सी गाली-गलौच भी होती है और इन्हीं कारणों से मैं इन्हें मॉडरेट कर देता हूँ. कभी-कभार मुझपर किंचित आक्षेप लगानेवाले कमेंट्स को मैंने पब्लिश भी किया है पर यह बात सचमुच बड़ी अजीब है कि कोई इस ब्लॉग विशेष पर ऐसे कमेंट्स क्यों करता है. शायद कमेंट्स करनेवाले सज्जन निजी जीवन में बहुत व्यथित हैं और अपनी ऊर्जा को इस प्रकार व्यर्थ कर रहे हैं. इन कमेंट्स के स्रोतों के बारे में जांच-पड़ताल करना समय की बर्बादी के सिवाय कुछ नहीं है इसलिए मैंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया. मैं यह भी नहीं बूझ पाता कि मैंने ऐसा क्या किया है जो कोई व्यक्ति मुझसे इतना रुष्ट है. यदि उन कमेंट्स के रचयिता यह पोस्ट पढ़ रहे हों तो मैं उनसे यह कहना चाहता हूँ कि यदि आप मेरा धैर्य जांचने के लिए यह काम कर रहे हैं तो शायद आपको निराशा ही हाथ आयेगी. यदि किन्ही व्यक्तियों को यह लगता है कि मैं कोई गलत काम कर रहा हूँ तो उन्हें या तो मुझसे खुलकर बात करनी चाहिए या इससे बेहतर काम करके दिखाना चाहिए. यकीन मानिए, इससे बेहतर साईट देखकर मुझे ख़ुशी ही मिलेगी.

लेकिन ऐसा हर जगह होता है… बस इसकी मात्रा और पद्धति भिन्न हो सकती है. इन बातों के कारण यदि मैं अपने मन को खट्टा कर लूं और पीछे हट जाऊं तो भी उन लोगों को ख़ुशी नहीं मिलेगी. सच्ची ख़ुशी सृजन और रूपांतरण में है. कुछ नया हो जिसे पढ़कर और देखकर सभी को ख़ुशी मिले, किसी का जीवन संवरे, दुनिया और बेहतर बने – ऐसा काम करना चाहिए. आलोचक और निंदक तो मिलते ही रहेंगे, यदि उनकी ही सुनता रहूँगा तो जल्दी ही ब्लॉग लिखना छोड़कर कुछ और करना पड़ेगा… फिर वहां भी आलोचक और निंदक मिलेंगे.

मैंने इस बीच यह पाया है कि हमें आलोचना ज्यादा व्यथित नहीं करती बल्कि उसे विश्लेषित करते रहना अधिक सताता है. कभी यह भी लगने लगता है कि हम गलत दिशा में जा रहे हैं या हमें रुक जाना चाहिए. कभी इसका मतलब यह होता है कि हमें और सीखने की ज़रुरत है. कभी आलोचना हमसे यह उम्मीद भी करती है कि हमें कुछ सख्त खाल वाले प्राणी जैसा होना चाहिए.

हिंदीज़ेन शुरू करने के पहले मेरे उद्देश्य स्पष्ट नहीं थे. मैं कुछ नया करना चाहता था पर हमेशा ही अपने ‘सुनहरे’ अतीत में भ्रमण करता था. धीरे-धीरे मुझे यह समझ में आ ही गया कि जीवन की एक अवस्था इसकी लंबी यात्रा का एक छोटा पड़ाव ही है. मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि मैंने अपनी ज़िंदगी के कई बेहतरीन साल यहाँ-वहां की चीज़ें करने और चीजों का आधा-अधूरा सीखने में गँवा दिए हैं. मैं कुछ लोगों के बारे में पढ़ता हूँ कि तीस साल का होने तक तो उन्होंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ इस दुनिया को सौंप दिया था तो मुझे अचरज होता है. फिर मुझे लगता है कि मेरे जैसे आदमी के साथ शायद चालीस या पचास का आंकड़ा सही रहेगा. लेकिन ईमानदारी से यह भी कह दूं कि अभी भी मुझे अपने उद्देश्यों का ज्ञान नहीं है… या मैं यह कहूं कि मैं उनकी परवाह नहीं करता, पर यह बड़बोलापन होगा.

मैं बहुत सपने देखता हूँ पर मुझे यह नहीं लगता कि मेरे जीवन में कुछ कमी है. कुछ चीज़ें करना चाहता हूँ जिसके लिए बहुत समय और कुछ धन की ज़रुरत भी होगी पर फिलहाल मेरे वर्तमान की खुशियों और उपलब्धियों का संबंध उनसे नहीं है. भविष्य का बोझ वर्तमान पर नहीं होना चाहिए… अतीत का तो बिलकुल भी नहीं होना चाहिए. अपने काम में उत्साह से जुटे रहना ही बड़ी बात है. ऐसा मैंने जीवन में पहली बार इस ब्लॉग के साथ किया है. इससे जुड़ने के पहले मैंने बहुत सी चीज़ें की लेकिन ज्यादा समय तक उन्हें कायम नहीं रख सका.

मैं अक्सर ही कुछ ब्लॉग लेखकों की घोषणाएं पढ़ता हूँ कि वे ब्लॉग जगत से विदा ले रहे हैं. मेरे मन में ऐसा विचार कभी नहीं आया हांलांकि एक स्वाभाविक ऊब कभी-कभार होती है जो एक-दो दिन में काफूर हो जाती है. मैं इस ऊब से इसलिए उबर जाता हूँ क्योंकि मैं तरह-तरह की चीज़ें पढ़ता- देखता-सुनता हूँ. इंटरनेट पर यदि आप स्वयं को एकांगी कर लेंगे तो जल्दी ही ऊब जायेंगे. यदि आप मेरा ब्लॉग रोल देखें तो पाएंगे कि मैंने विविध विषयों के ब्लॉग उसमें जोड़ रखे हैं और इनसे भी अधिक ब्लौगों को मैं स्थानाभाव के कारण जोड़ नहीं पाता. मैंने स्वयं को इस ब्लॉग पर पोस्ट डालने तक ही सीमित नहीं किया है. यदि मैं तीन दिन में एक पोस्ट पब्लिश करता हूँ तो इससे दस गुनी पढ़ता भी हूँ. यदि मैं यहाँ नहीं आता तो यह कभी नहीं जान पाता कि दुनिया में लाखों-करोड़ों बेहतरीन लोग हैं जो अपने-अपने क्षेत्र में शानदार काम कर रहे हैं और उनसे प्रेरणा ली जा सकती है. मैं अपनी मधुशाला के लिए एक राह नहीं पकड़ सकता. मेरे सामने अनगिनत विकल्प हैं.

चलते-चलते, कुछ आंकड़ों की बात: पिछले साल इसी दिन तक यह ब्लॉग देखनेवालों/देख चुके लोगों की संख्या एक लाख से कुछ कम थी पर बीते एक साल में यह 2,70,000 को पार कर गयी है. साइड में दिए गए क्लस्टर मैप में इसकी पहुँच दुनिया भर में दिखाई गयी है. इन सब तकनीकी चीज़ों से इतर प्रसंशकों एवं आलोचकों के कमेंट्स और ईमेल इस ब्लॉग की कमाई हैं.

धन्यवाद.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 24 comments

  1. Manoj Sharma

    निशांत जी,दो साल पुरे होने पर बधाई ,ये पोस्ट तो कह सकते है सबसे अच्छी पोस्टो में से एक है क्योकि कितनी गहराई से आपने अपने अन्दर झाकने की कोशिश की है वरना आज का इंसान तो ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,?

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  2. प्रवीण पाण्डेय

    सर्वप्रथम तो दो वर्ष के सतत और अतिशय श्रम पर हार्दिक बधाई। हमारे जीवन व चिन्तन प्रक्रिया की खिड़की है हमारा ब्लॉग और उसका एक एक शब्द हमें अतिप्रिय हो जाता है, औरों की आवृत्ति मिलने के कारण वही औरों को भी अच्छा लगता है और लोग जुड़ते जाते हैं। यह प्रवाह बना रहे, समय कम मिलेगा, विचार थमने से लगेंगे पर चलते रहना पड़ेगा। बहुत कुछ कहना है, बहुत कुछ लिखना है, साहित्य की गुणवत्ता पर प्रयास करते रहना है।
    भविष्य में और भी स्तरीय सृजन पढ़ने को मिलेगा, उसके लिये हार्दिक शुभकामनायें।

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    1. Nishant

      धन्यवाद, प्रवीण जी. अब समय मिलना वाकई कम हो गया है और बढ़िया सामग्री भी आसानी से नहीं मिलती. तय किया है कि इसमें मौलिक पोस्टें अधिकाधिक पब्लिश करूंगा और अपने लेखन में तीव्रता लाऊंगा.

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  3. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    सबसे पहले तो दो साल पूरे होने पर बधाई! और अब इस पोस्ट की बात। मेरे जैसे संतोषहीन के लिये पोस्ट काफी लम्बी थी मगर मैंने एक-एक शब्द पढा इसका मतलब ही है कि पोस्ट रोचक भी है। तुमने जो मार्ग अपनाया, उसके बारे में जानकर खुशी है। तुम्हारी टिप्पणियाँ अपने पसन्दीदा ब्लॉग्स पर पढता रहा हूँ, मगर ब्लॉग को उतना नहीं पढा। मुझे लगता है कि उसके दो कारण हैं। एक तो हिन्दी ब्लॉग्स में मैं मौलिकता ढूंढ रहा था (अनुवाद/संकलन नहीं), दूसरे शायद हमारी रुचियाँ भी समान हैं (मतलब, जो सब तुम पढते और लिखते हो, शायद वही सब मैं भी पढता रहा हूँ)

    अश्लील टिप्पणियों का सम्बन्ध तुम्हारे द्वारा दी गयी कुछ ईमानदार टिप्पणियों से हो सकता है जो मैने विभिन्न (तुमसे असम्बद्ध) फ़ड्डों/पंगों के दिनों में कुछ ब्लॉग्स पर पढी हैं। भले ही तुम्हें ऐसा लगता हो कि ऐसी बातों का असर नहीं होता तो भी किसी व्यक्ति को भी बिला-वजह दूसरों को आहत करने का अधिकार नहीं है। केवल अपने लिये नहीं बल्कि अन्य लोगों के हित में भी ऐसे दुर्व्यवहार को हतोत्साहित किया जाना चाहिये भले ही उसके लिये कानून की सहायता लेनी पडे।

    शुभकामनायें!

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    1. Nishant

      धन्यवाद, अनुराग जी. आपके कमेन्ट के मार्फ़त ‘खस्ता शेर’ तक हो आया और मुझे बहुत अच्छा लगा. मैं तो अभी तक ‘सस्ता शेर’ के बारे में ही जानता था. 🙂
      आपका ब्लौग सदैव से मेरी रीडिंग लिस्ट में रहा है. हमारी रुचियाँ और पठन की आदतें बहुत मिलतीं हैं.
      आप सही कहते हैं कि किसी विवाद में अपनी राय देने अथवा किसी का पक्ष लेने से कुछ लोग नाराज़गीवश ओछेपन पर उतरकर घटिया कमेन्टबाज़ी करने लगते हैं. लेकिन उनसे घबराकर अपने दिल की बात कहने से तो हम नहीं रुक सकते! सामने कुछ गलत हो रहा हो तो तटस्थ बने रहना बड़ी मुश्किल चीज़ है.

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  4. rajeshwari

    nishantji में आपका रब्लॉग नियमित रुप से padti हूँ. यह बहुत ही प्रेरणादायक और इस दौड़ती भागती तपती ज़िंदगी में एक ठंडे हवा के झोंके कि तरह है. आपका बहुत बहुत शुक्रिया हमें इतने सुंदर विचारों से रुब्ररू कराने के लिए.

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  5. अनूप शुक्ल

    आज दो साल पूरे हुये हिन्दीजेन को। बहुत अच्छा लगा यह जानकर और यह पोस्ट पढ़कर। हिन्दीजेन की तमाम पोस्टों के प्रिंट आउट लेकर मैंने अपने कुछ दोस्तों को दिये हैं। एक पोस्ट का प्रिंटआउट श्रीमती जी अपने स्कूल में बच्चों के साथ बांटने केलिये ले गयी हैं।

    ब्लागिंग से अलग तुम्हारी सकारात्मक और संवेदनशील सोच काबिले तारीफ़ और अनुकरणीय है।

    इस मौके पर खूब सारी शुभकामनायें और बधाईयां!

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  6. उन्मुक्त

    दो साल पूरे करने पर बधाई।

    लेकिन यह कुछ अजीब लगा,
    ‘यह ज़रूर है कि मेरा लड़कपन तो कभी का विदा हो चला है. और ऐसा होना भी चाहिए. जीवन अवस्था के हर चरण की अपनी गरिमा और मर्यादा होती है. कई वर्ष नौकरी में बिताने और अपने परिवार को प्राथमिकता पर रखनेवाले व्यक्ति के लिए अब बेवजह की हीहीफीफी शोभा नहीं देती.’

    मुझे तो लगता है बचपन का अर्थ है – जिज्ञासू रहना, नयी नयी बातों को सीखने की रुचि और माद्दा रखना, जीवन को मस्ती से जीना, जीवन को चिन्तायुक्त रखना – शायद इसकी हमेशा जरूररत है।

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  7. bhagat

    मैं अभी भी नकारात्मकता को अपने ऊपर हावी होने से रोक नहीं पाता. मैं जल्दी क्रोधित हो जाता हूँ और कभी-कभी अपने दफ्तर की दिक्कतों को घर में लेकर आ जाता हूँ. बाहर की चिल्लपों का सामना करके जब घर आता हूँ तो शांति चाहता हूँ पर कभी-कभी बच्चों पर गुस्सा कर बैठता हूँ. मैं जानता हूँ कि बच्चे बहुत छोटे हैं और मुझे देखकर उत्साहित हो जाते हैं. ऐसे में उनपर नाराजगी निकालना बुरी बात है. फिर भी मैं यह जोर देकर कहूँगा कि ये बातें अब धीरे-धीरे ही सही पर छूटती जा रही हैं. अब मैं अपने हौसलों को आसानी से पस्त नहीं होने देता. मैं नयी चीज़ें सीखता हूँ. अपनी बहुत सी बुरी आदतों से मैं निजात पा चुका हूँ. अभी बहुत कुछ सीखना और करना बाकी है. my situation is same. i reading your blog in top spare time. u doing excellent work on this blog for us

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