अपने आप से नहीं लड़ें

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क्या आपको अपने जख्मी-चोटिल पैर पसंद हैं?

बड़ी तकलीफ होती है जब हम अपने हाथों अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार लेते हैं. और हम ऐसा करते जाते हैं. बार-बार करते हैं!

ऐसा मैंने अक्सर ही बड़े तेजतर्रार, महत्वाकांक्षी, और जुझारू लोगों के साथ होते देखा है. ऐसे लोगों के साथ यह आमतौर पर होता रहता है कि वे खुद ही अपने किए-कराए पर पानी फेर देते हैं और ज्यादातर उनकी लड़ाई खुद से ही होती है. (यदि आप भांप नहीं पाए हों तो बता दूं कि मैं भी ऐसा ही आदमी हूँ).

मैं आपको उदाहरण के साथ बताता हूँ कि ऐसा व्यक्ति कैसे काम करता है:

आप लम्बे अरसे से कोई चीज़ करना चाहते हैं और आपको वह काम करने या सीखने का मौका मिल जाता है. मान लें कि आप बहुत अच्छे चित्र बनाना चाहते है या ड्राइंग करना चाहते हैं. आप मास्टर से या कोचिंग में ड्राइंग सीखने लगते हैं. आप अभ्यास करते हैं और आपकी कला में निखार आने लगता है. आप इतने अच्छे चित्र बनाने लगते हैं कि उन्हें देखकर आप स्वयं आश्चर्यचकित हो जाते हैं. दूसरे भी आपकी कलाकारी देखकर बहुत प्रशंसा करते हैं.

आपका कोर्स ख़त्म हो जाता है पर आप हरदिन कुछ नया सीखते है, नया करते हैं. पर चूंकि आप इस तरह के आदमी हैं कि कला में पूरा परफेक्ट हो जाना चाहते हैं, आप स्वयं को यह यकीन दिला देते हैं कि आपको हद से ज्यादा अभ्यास करना ही है अन्यथा आप अच्छे कलाकार नहीं बन पायेंगे. आप अपनी धुन में लगे हुए तल्लीनता से अपना काम जारी रखते हैं.

फिर किसी दिन कुछ बिगड़ जाता है. आपके सोचे अनुसार कोई काम नहीं हो पाता. किसी दिन आप अभ्यास नहीं कर पाते और आपको बहुत बुरा लगता है. अचानक ही आपके मन में कहीं से यह विचार आ जाता है कि आप इस चीज़ के लिए नहीं बने हैं या आपमें इसके लिए ज़रूरी अनुशासन का अभाव है. आप यह नहीं समझ पाते कि नयी आदतों को ढालने के लिए केवल अनुशासन की ही ज़रुरत नहीं होती.

लेकिन बेमन ही सही पर आप अपना काम जारी रखते करते हैं पर आपको यह भी लगने लगता है कि अब आप पहले की तरह जोश-ओ-खरोश से अपना काम नहीं कर रहे हैं. आपको वह समय याद आता है जब आप अपनी कक्षा के सबसे मेहनती छात्र थे और हर समय कुछ-न-कुछ करते ही रहते थे. अब आप यह पाते हैं कि आपसे लम्बे समय तक अभ्यास करते नहीं बनता और आपमें समर्पण शक्ति की कमी है.

पहले आप जो कुछ भी करते थे उसमें नयापन और आनंद था. अब तो यह रोज़मर्रा का रूटीन बन गया है. अब यह ऐसी चीज़ है जिसे आपको झक मारकर करना ही है.

अब आपके भीतर का क्रांतिकारी व्यक्तित्व हिलोरें लेने लगता है. आपमें खुद के प्रति नाराज़गी पनप रही है. हम लोगों में से वे जन जो बड़े महत्वकांक्षी और जुझारू हैं वे मूलतः उन चीज़ों को करना पसंद नहीं करते जो हमें करनी ही चाहिए. इसलिए हम उखड़ जाते हैं और बगावत कर बैठते हैं. हम इसमें अपनी कोई मदद नहीं कर सकते क्योंकि हम तो शुरू से ही ऐसे ही हैं.

समस्या क्या है?

यथास्थिति के प्रति विद्रोह करना और प्राधिकार को चुनौती देने के कुछ लाभ तो हैं. इससे हमें अपने बारे में सोचने का मौका मिलता है और हमारे मौलिक विचार पनपते हैं. हम अपने भीतर उतरते हैं, आत्म-निरीक्षण करते हैं. इससे हमारी चेतना का विस्तार होता है.

लेकिन विद्रोही प्रवृत्ति और व्यक्तित्व का होना हमेशा ही सही नहीं होता. कभी-कभी हम स्वयं के विरोध में भी खड़े हो जाते हैं. इससे रचनाशीलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

यह होता कैसे है? हमेशा दूसरों का सामना और प्रतिरोध करते-करते कोई अपने ही खिलाफ क्यों उतर आता है? इसकी जड़ में एक ही शब्द है:

अनिवार्यता

जब कभी आप कोई काम अनिवार्यतः करते हैं तब उसमें से आनंद निकल जाता है. आपकी उमंग सपाट हो जाती है. जब आपको कुछ अनिवार्यतः करने की बाध्यता है तो आपका मन स्वभावतः उसके विरोध में खड़ा हो जाता है. आप प्रतिरोध करते हैं क्योंकि आपको यह लगने लगता है कि आपके सामने और कोई विकल्प नहीं हैं.

विकल्पों की पुनर्स्थापना

मैं इस समस्या से बहुत लम्बे समय से जूझ रहा हूँ. मैं कुछ करने का संकल्प करता हूँ पर मुझे यह लगता है कि यदि मेरे द्वारा किया जाने वाला काम परिपूर्णता के साथ नहीं होगा तो मुझे निराशा होगी. यह बड़ी अजीब बात है पर मेरे मन में हमेशा सर्वोच्च मानक ही आते रहते हैं. कभी तो मैं ऊंचे-से-ऊंचे मानकों के बारे में ही सोचता रह जाता हूँ और कर कुछ नहीं पाता.

और इन सबसे भी ज्यादा, हम सबको अक्सर यह लगता है कि हमारे सामने विकल्पों की कमी है जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं होता. हमारा अहंकार हमारे सर चढ़कर बोलता है कि हमपर कुछ भी करने की बाध्यता नहीं है.

ऐसे में मुझे लगता है कि हमें इस बात का पता होना चाहिए कि हमारे बनाए मानक असंगत हैं और हमारे पास विकल्पों का अभाव नहीं है. जब हमें कुछ भी अनिवार्यतः करना हो तो हमें स्वयं से ये प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए:

यदि मैं इसे करूं तो क्या होगा?
यदि मैं इसे नहीं करूं तो क्या होगा?

कभी-कभी “मैं यह क्यों करना चाहता हूँ” पूछने के बजाय “क्या होगा यदि…” पूछ लेना बेहतर है. जब हम खुद से ‘क्यों’ पूछते हैं तब हम खुद को अमूमन सही ठहराना चाहते हैं. ऐसी स्थिति में हमारी भावनाएं हमारे निर्णय पर भारी पड़ सकतीं हैं. जब हम “क्या होगा यदि…” पूछते हैं तो हम सामने उपस्थित अनेक संभावनाओं की खोज-परख करते हैं. फिर हमारे सामने केवल कोई एक विकल्प नहीं होता जिसे हमें चुनना ही है. हम अनेक विकल्पों में से उस विकल्प को चुन सकते हैं जो सर्वोचित है.

जब कभी आपको यह लगने लगे कि आपपर कुछ करने की बाध्यता-अनिवार्यता है तो स्वयं से ये दो प्रश्न अवश्य पूछिए. इसके साथ ही यह भी तलाशिये कि क्या कुछ और भी ऐसी संभावनाएं हैं जिन्हें आप अनदेखा कर रहे हैं. खुद से पूछिए कि कहीं आपने कुछ जानने-समझने में कोई चूक तो नहीं कर दी है. परफेक्शन की हद के पार जाकर हर रिकॉर्ड तोड़ देने की ख्वाहिश को दरकिनार कीजिये और खुद से पूछिए कि क्या इसके सिवाय भी कुछ है जो अधिक महत्वपूर्ण है.

हो सकता है कि जहाँ आपको पहले कोई पिंजड़ा दिख रहा था वहां अब कोई अदृश्य द्वार या नयी राह दिखाई देने लगे.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 6 comments

  1. ajit gupta

    अच्‍छी पोस्‍ट। हम तो केवल आनन्‍द के लिए काम करते हैं। परफेक्‍शन के लिए किया गया कार्य हमेशा अधूरा सा लगता है जबकि आनन्‍द के लिए किया कार्य हमेशा पूर्ण लगता है।

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