मानसिक जंजाल से मुक्ति के उपाय

overwhelmed

हमारी समस्या यह नहीं है कि मौलिक और अभिनव विचार कैसे आयें बल्कि यह है कि लम्बे समय से भीतर जड़ जमा चुके नकारात्मक विचार कैसे निकलें. हमारा मष्तिष्क ऐसा भवन है जिसमें पुराना फर्नीचर भरा हुआ है. इसके कुछ कोनों को साफ़-सुथरा कर दीजिये और रचनात्मकता इसमें तुरत अपना स्थान ढूंढ लेगी.

मैं ऐसे बहुत से ब्लॉग पढता रहता हूँ जिनमें अपने जीवन और परिवेश से अनुपयुक्त और अनावश्यक विचारों एवं वस्तुओं को निकालकर जीवन और कार्य को सहज-सरल बनाया जा सकता है.  इन ब्लौगों में Zenhabits सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे ब्लौगों में जीवन की उपादेयता, रचनात्मकता, उत्पादकता, और सरलता को बढ़ानेवाले विचारों और उपायों पर चर्चा की जाती है. इनमें न केवल हमारे घर, रसोई, कार्यालय, और फेसबुक फ्रेंड्स लिस्ट बल्कि अपने विचारों को भी जंजाल-मुक्त और निर्मल बनाने के तत्व और सूत्र मिलते हैं. ये हमें बताते हैं कि स्वास्थ्यप्रद आहार कैसे लें, अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं के संग्रह से कैसे बचें और अपरिग्रही प्रवृत्ति की ओर कैसे उन्मुख हों. मैं इन ब्लौगों को पढना पसंद करता हूँ क्योंकि मैं उनमें विश्वास करता हूँ. मैं इनमें सुझाए गए उत्पादों को भी खरीदता हूँ.

लेकिन यह भी सच है कि इन ब्लौगों को लम्बे समय तक पढ़ते रहने के बावजूद भी मेरे भीतर वस्तु-संग्रह की इच्छा उत्पन्न होती रहती है या मैं उनकी खोज-परख करता रहता हूँ. अपनी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिए मैं अपनी डेस्क और दराज़ को साफ़ रखता हूँ. अपनी किताबों और सीडी की बेरहमी से छंटनी करता हूँ, अनुपयोगी वस्त्रों को ज़रूरतमंदों को देता हूँ और बेकार कागजों को रद्दी में डालता रहता हूँ. इन कार्यों को करने से रोज़मर्रा के जीवन में बड़ी मदद मिलती है. काम ख़त्म हो जाने पर मन में संतोष बढ़ जाता है. लेकिन कम-से-कम अपने मामले में तो मैंने यह पाया है कि कुछ ही हफ़्तों में कचरा और अनुपयोगी वस्तुएं फिर से बढ़ने लगतीं हैं. और कभी ऐसा भी होता है कि बाहरी तौर पर तो सब कुछ सरल और व्यवस्थित दिखता है पर अपने भीतर मैं खुद को बड़े असमंजस और उलझन में पाता हूँ. इस समय भी मेरे मन में ऊहापोह है और यह मुझे इस निष्कर्ष तक ले आया है:

सच्चे अर्थों में स्वतन्त्र होने, अधिक उत्पादक बनने, तनावरहित बने रहने, स्पष्ट विचार रखने, और सरल व रचनात्मक जीवन जीने के लिए हमें अपनी क्षमताओं से अधिक कर्म करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए. चीज़ों को हमेशा अलग-अलग कोण से देखकर समझने का प्रयास करना चाहिए.यह ज़रूरी है कि हम अपने भीतर झांककर देखें, स्वयं का निरीक्षण करें, और अपने मन-मष्तिष्क को अव्यवस्था और कोलाहल से मुक्त करने के लिए कदम उठायें. यदि हम यह नहीं करेंगे तो बाहर किये जाने वाले सारे प्रयत्न निष्फल जायेंगे और हमें शांति-संतोष नहीं मिलेगा.

नीचे दिए गए छः तरीकों से आप अपने भीतर उन्मुख हो सकते हैं, अपने बारे में मनन कर सकते हैं, और उन चीज़ों से छुटकारा पा सकते हैं जो जंजाल की भांति आपको घेरे रहतीं है और अच्छी चीज़ों के होने में रुकावट डालतीं हैं:

1. सोचिये नहीं, फोकस कीजिये –
अपने उद्देश्यों, सपनों, और इच्छाओं पर फोकस कीजिये. आपके चाहने और होने के बीच हमेशा कुछ फासला रहेगा ही पर इससे अपने हौसले को पस्त नहीं करें. अपना ध्यान बीच की रुकावटों पर नहीं वरन मंजिल पर केन्द्रित करें और आप पायेंगे कि पॉज़िटिव रवैया रखने से सोचने और होने के बीच की दूरियां बड़ी नहीं लगतीं.


2. बीती ताहि बिसार दें –
भूल नहीं सकें तो बेशक न भूलें पर उसे अपने ऊपर हावी नहीं होनें दें.

3. विचार प्रक्रिया का सरलीकरण करें –
बहुत सीधा सा फॉर्मूला है. अच्छे और सकारात्मक विचारों को आने दें. बुरे और नकारात्मक विचारों को दरकिनार कर दें.


4. जो कुछ हमारे वश में न हो उसके लिए व्यथित न हों –
इसे साध पाना सरल नहीं है. यहाँ कही गयी सारी बातों में यह सबसे कठिन है लेकिन शांतिपूर्ण जीवन के लिए इस नीति का पालन करना बहुत ज़रूरी है. यदि आप ऐसी चीज़ों से घिरें हो जो आपके वश में नहीं हैं तो उनके बारे में सोचविचार करके चिंतित होने में कोई सार नहीं है. उस समय तक प्रतीक्षा करें जब तक चीज़ें बदल नहीं जातीं. ध्यान दें कि
सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है.

5. अपने अंतर्मन को जागृत करें – कभी-कभी खुद पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए और अपने भीतर झांककर देखना चाहिए. यह सोचिये कि कौन सी चीज़ें आपको प्रेरित करतीं हैं, आपको गतिमान रखतीं हैं. किन परिस्थितियों में आप सर्वाधिक सक्रिय, रचनाशील, और चिंतामुक्त रहते हैं? इन बातों पर फोकस कीजिये. कभी-कभार यूं ही ध्यान में बैठ जाइए और दिन भर में सिर्फ दस मिनट ही सही पर अपने आप को भीतर ही टटोलिये और खोजिये कि आप असल में क्या हैं.

6. अकेलेपन से घबराइये नहीं –
एकांत के भी अनेक फायदे हैं. क्या आप कभी अकेले ही फिल्म देखने गए हैं? रेस्तरां में अकेले खाना खाया है? अकेले ही लम्बी चहलकदमी की है? कभी करके देखिये. जब आप निपट अकेले होते हैं तो आपकी विचार प्रक्रिया बदल जाती है. आप अधिक गहराई से सोचने लगते हैं क्योंकि आपके चारों ओर अक्सर ही मौजूद रहनेवाला कोलाहल कम हो जाता है और शांति से कुछ भी करने के लिए समय मिल जाता है.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 8 comments

  1. हंसराज सुज्ञ

    संयमित रहना सर्वश्रेष्ठ गुण है। कितने ही उपदेश हमारे आस पास बिखरे पडे है। पर वे जब सहज नवीनतम विचार बनकर प्रस्तुत होते है तो प्रभावित कर जाते है।
    उत्तम ध्येय प्रेरक प्रस्तुति!! आभार

    Liked by 1 व्यक्ति

  2. sanjay jha

    हम तो मुग्ध हो गये कि हमारी जैसी सोच वाले कितने पुरोधा नेट में पहले से विद्मान हैं। सबको मिलवाने का आभार।

    apne kamtari par kshob hota hai………..apne hi man ke vichar ko samne lane ke liye ………paros se tippani bhi udhar leni parti hai……….

    sadar.

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