‘नये साल में यह नया करें’ – प्रीतीश नंदी

समय बड़ी जल्दी बीत जाता है. कुछ ही दिनों पहले नए साल की धूमधाम हो रही थी और देखते-देखते जनवरी ख़त्म होने को आ गया. यदि आपने नए साल में कुछ बेहतर करने या बेहतर बनने का सोचा हो तो आपको श्री प्रीतिश नंदी जी के लेख से प्रेरणा मिलेगी जिसे मैंने ‘रविवार’ वेब पत्रिका से साभार लिया है. पढ़ें और मनन करें:

आमतौर पर वर्षगांठ या सालगिरह के मौके पर कोई न कोई प्रण लिया जाता है या कोई कसम खाई जाती है. अक्सर तो कोई लत या बुरी आदत छोडऩे का ही प्रण लिया जाता है. मैंने अपने कई दोस्तों को यह कसम खाते हुए देखा है कि आज के बाद वे सिगरेट छोड़ देंगे, शराब से तौबा कर लेंगे, चॉकलेट को हाथ न लगाएंगे, गाड़ी तेज न चलाएंगे, वक्त पर दफ्तर पहुंचेंगे वगैरह-वगैरह. यह फेहरिस्त बहुत लंबी हो सकती है, लेकिन अमूमन ये कसमें लंबे समय तक निभाई नहीं जातीं. शायद ये कसमें लंबे समय तक निभाए जाने के लिए होती भी नहीं हैं.

पिछले शनिवार को मेरा जन्मदिन था. मैंने हर बार की ही तरह अपना जन्मदिन मनाया. मैंने अपने रोजमर्रा के कामकाज से छुट्टी ली और उन बातों पर विचार किया, जो मेरे लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं. इनमें से कोई भी बात ऐसी न थी, जिससे किसी को बहुत फर्क पड़ता या जिससे दुनिया इधर-उधर हो जाती. मैं अपना जन्मदिन मनाने के लिए एक ऐसी जगह पर चला गया, जिसे मैं अपनी ‘शरणस्थली’ कहता हूं. मैं कभी-कभी वहां कुछ दिनों के लिए चला जाता हूं. यह एक दिन है, जिसे मैं अपने लिए बचाकर रखता हूं. अपने जन्मदिन पर मैं किन्हीं नकारात्मक बातों पर विचार नहीं करता, इसलिए कोई प्रण भी नहीं लेता. इसके उलट मैं तो कुछ नई आदतें डाल लेने की कोशिश करता हूं. मैं अपने जीवन को अधिक समृद्ध और संपूर्ण बनाना चाहता हूं. मैं कुछ नया सीखना चाहता हूं.

हमें ‘हां’ को अपने जन्मदिन का प्रण बनाना चाहिए, ‘ना’ को नहीं. मैं स्वीकारता हूं कि दुनिया बदल गई है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि लोगों ने जो कुछ किया, वह सब गलत था. फिर चाहे वे ऑड्रे हापबर्न हों, जिन्होंने ब्रेकफास्ट एट टिफनी में सिगरेट पीकर स्मोकिंग को एक चलन बना दिया था या फिर चाहे डिलन टॉमस हों, जो दिन-रात शराबनोशी करते थे, लेकिन उन्होंने अपने समय की सबसे अच्छी कविता लिखी. यदि आपको मेरी बात पर यकीन नहीं होता तो रिचर्ड बर्टन, जो सर्वकालिक महान अभिनेताओं में से एक हैं, को डिलन टॉमस की कविताओं का पाठ करते सुनिए. इसे ही मैं सही मायनों में एक बदलाव कहता हूं.

हमें न्यायाधीश बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. हम ड्रग्स लेने वाले जिम मॉरिसन के लिए कोई फैसला क्यों लें क्या हम जिम मॉरिसन के गीतों और उनके संगीत को सुनकर उसके बारे में विचार नहीं कर सकते? अल्डुअस हक्सले ने कहा था कि मेस्कलिन के बिना दिमाग की खिड़कियां और विचारों के दरवाजे कभी नहीं खुल सकते. उन्होंने नोबेल पुरस्कार जीता. एलेन गिंसबर्ग ने अपनी श्रेष्ठ कविताएं गंगा नदी के किनारे श्मशान पर सिगरेट फूंकते हुए लिखीं. कैनेडी ने इतनी अच्छी तरह से अपने प्रशासनिक दायित्वों का निर्वाह किया था. तब क्या हमें उनके निजी जीवन के अविवेकपूर्ण कार्यों के आधार पर उनके बारे में कोई निर्णय लेना चाहिए?

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Photo by Brooke Lark on Unsplash

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There are 10 comments

  1. प्रवीण पाण्डेय

    हाँ को हाँ कहें। जिम मॉरिसन के लगभग सारे गीत सुन चुका हूँ कई बार, अजीब नशा है उनमें भी। वह जितना भी जिया और जैसे भी जिया, धधक कर जिया जीवन भर।

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  2. rafat alam

    निशांत जी ,नकारात्मक आदतें ये कुछ महान बंदे जो नंदी साहिब ने गिनाये उन्ही में नहीं अधिकतर सर्जकों के जीवन में देखि जासकती हैं और क्या पता उनके सकारात्मक सर्जन की जनक भी रही हों.नंदी जी ने बहुत गहराई लिए नववर्ष पर्ण सम्भंदित लेख लिखा है जो एकदम सटीक है पर मदिरा ,नशीली दावा या अन्य नशे से परहेज़ ही अच्छा सभी जानते है जिम मोरिसन या बहुतसे प्रतिभावान कलाकार कितनी कम उम्र में इन्ही के कारण अकाल दुनिया से चले गए .

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