क्षमा

Happy Ramadhan, Eid Mubarak

ईसाई मठ के महंत ने अपने प्रिय शिष्य से पूछा – “पुत्र, साधना के पथ पर तुम्हारी प्रगति संतोषजनक है न?”

शिष्य ने कहा – “जी, मैं यह प्रयास करता हूँ कि दिन में एक पल भी मुझे ईश्वर का विस्मरण न रहे”.

“यह तो बहुत अच्छी बात है. अब तुम्हारे लिए एक यही बात बची रह गयी है कि तुम अपने शत्रुओं को क्षमा कर दो” – गुरु ने कहा.

शिष्य को यह सुनकर बड़ा विस्मय हुआ. उसने कहा – “लेकिन मैं किसी भी शत्रु पर कुपित नहीं हूँ!”

“क्या तुम्हें यह लगता है कि ईश्वर तुमसे रुष्ट है?” – गुरु ने पूछा.

“बिलकुल नहीं!” – शिष्य बोला.

“फिर भी तुम ईश्वर से हर पल तुम्हें क्षमा करने के लिए प्रार्थना करते रहते हो. भले ही तुम्हारे मन में तुम्हारे शत्रुओं के लिए घृणा न हो पर तुम्हें उनसे क्षमायाचना करते रहना चाहिए. जो व्यक्ति क्षमाशील बनते हैं उनका ह्रदय निर्मल और पवित्र हो जाता है”.

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