He Needs Your Hand – ईश्वर के हाथ

horseगुरु और शिष्य रेगिस्तान से गुज़र रहे थे. गुरु यात्रा में हर क्षण शिष्य में आस्था जागृत करने के लिए ज्ञान देते रहे थे. “अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर दो” – गुरु ने कहा – “हम सभी ईश्वर की संतान हैं और वह अपने बच्चों को कभी नहीं त्यागते”. रात में उन्होंने रेगिस्तान में एक स्थान पर अपना डेरा जमाया. गुरु ने शिष्य से कहा कि वह घोड़े को निकट ही एक चट्टान से बाँध दे.

शिष्य घोड़े को लेकर चट्टान तक गया. उसे दिन में गुरु द्वारा दिया गया कोई उपदेश याद आ गया. उसने सोचा – “गुरु संभवतः मेरी परीक्षा ले रहे हैं. आस्था कहती है कि ईश्वर इस घोड़े का ध्यान रखेंगे”.

और उसने घोड़े को चट्टान से नहीं बाँधा.

सुबह उसने देखा कि घोड़ा दूर-दूर तक कहीं नज़र नहीं आ रहा था.

उसने गुरु से जाकर कहा – “आपको ईश्वर के बारे में कुछ नहीं पता! कल ही आपने बताया था कि हमें सब कुछ ईश्वर के हांथों सौंप देना चाहिए इसीलिए मैंने घोड़े की रक्षा का भर ईश्वर पर डाल दिया लेकिन घोड़ा भाग गया!”

“ईश्वर तो वाकई चाहता था कि घोड़ा हमारे पास सुरक्षित रहे” गुरु ने कहा – “लेकिन जिस समय उसने तुम्हारे हांथों घोड़े को बांधना चाहा तब तुमने अपने हांथों को ईश्वर को नहीं सौंपा और घोड़े को खुला छोड़ दिया”

पाउलो कोएलो के ब्लौग से (From the blog of Paulo Coelho)

A Master and his disciple were walking through the deserts of Arabia. The Master used each moment of the journey to teach his disciple about faith.

“Entrust your things to God,” he said. “Because He never abandons His children.”

When they camped down at night, the Master asked the disciple to tie the horses to a nearby rock.

The disciple went over to the rock, but then remembered what he had learnt that afternoon. “The Master must be testing me. The truth is that I should entrust the horses to God.”

And he left the horses loose.

In the morning he discovered that the animals had run off. Indignant, he sought out the Master.

“You know nothing about God! Yesterday I learnt that I should trust blindly in Providence, so I gave the horses to Him to guard, and the animals have disappeared!”

“God wanted to look after the horses,” answered the Master. “But at that moment he needed your hands to tie them up and you did not lend them to Him.”

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 10 comments

  1. G Vishwanath

    आखरी पैरा ठीक से समझ नहीं सका
    मूल ब्लॉग पर जाकर पढा
    “God wanted to look after the horses,” answered the Master. “But at that moment he needed your hands to tie them up and you did not lend them to Him.”

    सोच रहा हूँ क्या मेरा अनुवाद ठीक है?

    “ईश्वर तो वाकई चाहता था कि घोड़ा हमारे पास सुरक्षित रहे” गुरु ने कहा – “लेकिन ईश्वर को घोडे को बांधने के लिए तुम्हारे हाथों की जरूरत थी पर तुमने ईश्वर को सौंपा नहीं”।

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    1. Nishant

      “ईश्वर तो वाकई चाहता था कि घोड़ा हमारे पास सुरक्षित रहे” गुरु ने कहा – “लेकिन जिस समय उसने तुम्हारे हांथों घोड़े को बांधना चाहा तब तुमने अपने हांथों को ईश्वर को नहीं सौंपा और घोड़े को खुला छोड़ दिया”

      गुरु के शब्द स्पष्टतः कर्म करने की ओर इंगित कर रहे हैं. भाग्यवाद तो तब होता जब वह वाकई ईश्वर के भरोसे घोड़े को छोड़ने का समर्थन करते और यह कहते कि ‘ईश्वर शायद यही चाहता था कि घोड़ा भाग ही जाए’.

      विरोध करने का कोई प्रश्न ही नहीं है जी:)

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  2. Gyandutt Pandey

    इसका सन्ता-बन्ता वाला वर्जन मजेदार है। सन्ता लाटरी निकलने की गुहार लगाता जाता है। जब वह झल्ला जाता है तो आकाशवाणी होती है – ओये खोते, पहले लाटरी का टिकट तो खरीद।
    ईश्वरीय कृपा बरसने को निमित्त तो मानव को प्रदान करना होगा कर्म से!

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