अज्ञान का कारागार

solitude

नेशनल जियोग्राफिक चैनल पर एक दिन विश्व के सबसे कुख्यात और कठोर कारागारों पर एक कार्यक्रम दिखाया जा रहा था. इनमें से कुछ कारागार ऐसे हैं जिनसे किसी भी अपराधी का बच निकलना लगभग असंभव-सा है. इसी कार्यक्रम में लॉस एंजेल्स के सैंकड़ों दुर्दांत और बदनाम गैंग में से एक के दो पूर्व मैक्सिकन-अमेरिकन सदस्यों के बारे में बताया गया जिनपर कई हत्याएं और अन्य गंभीर अपराध दर्ज हैं. अमेरिका में मृत्युदंड से बचने के लिए इन दोनों अपराधियों ने अपने मुक़दमे मैक्सिको में चलवाए. मैक्सिको की अदालत ने उन्हें लगभग बीस साल की कैद की सजा सुनाई. ये दोनों मैक्सिको की मैक्सिमम सिक्योरिटी प्रिज़न सैंटा मार्था में अपनी सजा काटेंगे.

मैक्सिको के मूल कैदी इन अपराधियों को अमेरिका से आया हुआ अर्थात बाहरी तत्व मानकर नीची निगाह से देखते हैं. लैटिन देशों के कारागारों में आयेदिन बहुत खूनखराबा होता रहता है. इन कैदियों का शायद ही कोई दिन ऐसा गुज़रे जब इन्हें साथी कैदियों से अपनी जान का खतरा न हो. सैंटा मार्था में कैद होने के बाद इनपर कई बार आक्रमण हुए और इनके शरीर के लगभग हर हिस्से पर हर संभव हथियार से वार किये गए. उनकी छाती, पीठ, गले, गाल, हर जगह कामचलाऊ चाकू या चम्मच भोंकने के निशान हैं.

लेकिन हैरत की बात यह है कि पग-पग पर बिछी मौत से गुज़रते रहने के बाद भी वे आख़री सांस तक अपने जीवन को बचाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. इसकी तुलना में अमेरिका में जहरीला इंजेक्शन लेकर मौत को गले लगाना तो मेरी नज़र में बहुत फायदे का सौदा होता. ये कैदी कहते हैं कि जेल में साथी कैदियों से जोर-आजमाइश के छोटे खेलों में शर्त लगाकर कभी-कभार एक कोला ड्रिंक या आइसक्रीम पाने में जो मजा है वही उनकी नज़र में उनके जीवन को कीमती बना देता है.

व्यक्तियों में इस सीमा तक अपने अस्तित्व को बनाए रखने या उससे जकड़े रहने की लालसा है. आने वाले किसी भी पल में अपनी गर्दन के आर-पार होनेवाले चाकू से बेफिक्र रहकर इनकी ज़िंदगी का यह मकसद है कि वे अगले दिन की सुबह देखने के लायक बने रहें. आदमी में जीने की ललक बहुत गहरी है.

वीडियो में ये अपराधी अपने शरीर पर लगे चाकुओं के गहरे निशान दिखाते हुए यह बताते हैं कि ऐसे घिनौने और हिंसक वातावरण में वे खुद को कैसे बचाते हैं या हमला होने की सूरत में कैसी प्रतिक्रिया देते हैं.

इन अपराधियों के इस व्यवहार का एक पक्ष हमारे जीवन को भी कहीं-न-कहीं छूता है. हम लोग भी कुछ अलहदा वक़्त में दुनिया से खुद को बचाते हैं या उसपर पलटवार करते हैं. इन अपराधियों और हम लोगों में हम यह अंतर कह सकते हैं कि हम अपने विश्व को सांसारिक शब्दावली से युक्त दार्शनिक उलटबांसियों में व्यक्त करके मानसिक खुराक पा लेते हैं जबकि इन अपराधियों की दुनिया के लिए हमें पागल जंगली जानवरों के पिजड़े जैसी उपमाएं आसानी से मिल जाती हैं.

बौद्ध दर्शन के कर्म सिद्धांत के अनुसार हमें अज्ञान के कारण अपने आत्मस्वरूप वास्तविकता का बोध नहीं होता. अपने बाह्य आवरण को ही सर्वस्व मान लेने के कारण मनुष्य अदम्य कामनाओं, वासनाओं और क्लेशों में रत हो जाता है और अपने द्वारा ही रचे गए निज-कारागार में अपने दंड की अवधि को बढ़ाता जाता है. अपने घनीभूत आत्म पर दूसरों द्वारा की गयी चोट के निशानों को सहेजते हुए हम अपने जीवन को चिरस्थाई रखने का प्रयत्न करते रहते हैं. समय-समय पर हमें भी दांव लगाने पर ‘कोला या आइसक्रीम’ मिलती रहती है जो हमें यह यकीन दिलाती रहती है कि ‘ज़िंदगी अपने तमाम दुखों और जंजाल के बाद भी बहुत खूबसूरत है’.

यह जीवन जीने का बड़ा ही कष्टप्रद, बोझिल और उन्मादी तरीका है. सच कहूं तो मुझे ये अपराधी मूढ़ नहीं जान पड़ते – अपने स्वत्व का अज्ञान वास्तव में अहंकार द्वारा बहुत चतुराई से रचा गया प्रपंच है. यह सब जानते हुए भी इस मायाजाल से बाहर नहीं निकलने की टालमटोल हमें उनसे भी अधिक मूढ़ सिद्ध करती है.

हम सभी अज्ञान के कारागार से मुक्त हों, मैं यह प्रार्थना करता हूँ.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 5 comments

    1. Nishant

      विश्वनाथ जी, मैंने चेक कर लिया है, वीडियो दिखता है और किसी प्रकार की समस्या नहीं है. वैसे वीडियो सिर्फ दो मिनट का है. पोस्ट में लिखी बातें ज्यादा महत्वपुर्ण हैं.

      Like

  1. G Vishwanath

    आपका ई मेल प्राप्त हुआ।
    मैंने फ़िर कोशिश की।
    आपका बताया हुआ विडियो अब भी लोड नहीं हो रहा है।
    कोई और विडियो दिख रहा है।
    UPS logistics का कोई commercial advertisement दिखता है।
    पता नहीं कि मैं कुछ गलत कर रहा हूँ या नहीं।
    मानता हूँ की विडियो उतना महत्वपूर्ण नहीं है, फ़िर भी देखना चाहता था और मुझे आश्चर्य हो रहा है कि केवल मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है।

    हाँ विषय के बारे में सिर्फ़ इतना कहूंगा कि life is dear after all!
    कितने लोग आत्महत्या के बारे में केवल सोचते हैं पर जब वाकई करने निकलते हैं, आखरी क्षण रुक जाते हैं।
    जीवन कितना भी कठिन क्यों न हो, इंसान मृत्यु से हमेशा डरता ही रहा है और आगे भी डरता रहेगा

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