शराबी शिष्य

Izutsu Wine


एक ज़ेनगुरु के सौ शिष्य थे. उनमें से एक हमेशा नशे में रहता था जबकि बाकी शिष्य नियमानुसार प्रार्थना करते रहते थे.

ज़ेनगुरु बूढ़ा हो रहा था. कुछ गुणी शिष्यों के मन में यह प्रश्न उठने लगा कि आश्रम का अगला गुरु कौन बनेगा. गुरु की गद्दी पर बैठनेवाला शिष्य आश्रम की सदियों पुरानी रहस्यमयी गौरवशाली परंपरा का स्तम्भ बन जाता.

शरीर छोड़ने से पहले ज़ेनगुरु ने शराबी शिष्य को बुलाया और उसे गुप्त मन्त्रों से दीक्षित करके अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया.

इस घटना ने आश्रम में विद्रोह की स्थिति निर्मित कर दी.

“कितने शर्म की बात है!” – शिष्य चिल्ला रहे थे – “हमने अपना जीवन ऐसे गुरु को समर्पित कर दिया जो हमारे गुणों को नहीं देख पाया.”

बाहर कोलाहल की आवाज़ सुनकर मरते हुए ज़ेनगुरु ने कहा – “मैं गुप्त रहस्यों और मन्त्रों को उसी के सामने प्रकट कर सकता था जिसे मैं भली भांति जानता हूँ. मेरे सभी शिष्य सद्गुणी और योग्य हैं लेकिन इसके भी कई खतरे हैं क्योंकि सद्गुण बहुधा भीतरी लघुता, अहंकार और अनुदारता को ढँक देते हैं. यही कारण है कि मैंने केवल उसी शिष्य का चयन किया जिसे मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ और उसके एकमात्र दोष ‘शराब पीना’ को देख सकता हूँ.”

(A zen story about a drunkard disciple)

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There are 5 comments

  1. Gourav Agrawal

    वाह क्या बात है सच में बड़ी गहरी सोच है
    ज्ञानी लोग सच में आम इंसान से कितना अलग सोचते हैं
    इसे लिए तो वे ज्ञानी होते

    इस ज्ञानवर्धक पोस्ट के लिए धन्यवाद

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    रक्षा बंधन [ कथाएं, चर्चाएँ, एक कविता भी ] समय निकालो पढ़ डालो

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