गर्म कोट

aharbal waterfall


सर्दियों के दिन थे और एक गुरु अपने तीन शिष्यों के साथ पर्वतीय घाटी से गुज़र रहे थे. बहुत तेज़ ठंड पड़ रही थी और गुरु के तीनों शिष्य अपने गुरु को लेकर चिंतित थे. वे अपने गुरु को इतनी सर्दी में मामूली सूती चादर ओढ़े ठिठुरते देखते थे पर उनमें इतना साहस नहीं था कि वे उन्हें अपने लिए ऊनी कोट खरीदने के लिए कह सकें. वे गुरु के स्वभाव से परिचित थे कि गुरु को अपने हित-अहित के विषय में किसी से कुछ भी सुनना स्वीकार नहीं था.

लेकिन उनमें से एक ने साहस जुटाया और गुरु से कहा – “गुरुदेव, हमें लगता है कि इस सर्दी में आपके पास अपने बचाव के लिए पर्याप्त कपड़े नहीं हैं. हम सभी चाहते हैं कि आप अपने लिए फ़र का बढ़िया गर्म कोट ले लें.”

गुरु अपने शिष्यों के मन में चल रहे भावों को समझ गए लेकिन वे उन्हें जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाना चाहते थे – सुख-सुविधापूर्ण जीवन जीने में कोई बुराई नहीं है पर उनकी अनुपस्तिथि में मन को विषादग्रस्त नहीं करना चाहिए. इसके अतिरिक्त वे अपने शिष्यों को यह भी दिखाना चाहते थे कि जीवन में हमें जो कुछ भी मिलता है या हमसे वापस ले लिया जाता है उसके पीछे भी प्रकृति के महती उद्देश्य होते हैं. उन्होंने यह बातें अपने शिष्यों से कही पर वे कुछ भी समझ न सके. शिष्य अपने अनुरोध पर डटे रहे.

“नहीं गुरुदेव, यह ठीक नहीं है. हम जानते हैं कि आप अपने लिए कुछ नहीं करना चाहते. इसमें आपकी नम्रता ही है पर यह भी सत्य है कि आपको वास्तव में एक कोट की ज़रुरत है. यदि आप ठंड से अपना बचाव नहीं करेंगे तो आप बीमार पड़ जायेंगे. यदि आप हमें आज्ञा दें तो हम आपके लिए एक गर्म कोट खरीद लें?”

यही वार्तालाप करते हुए वे एक नदी के किनारे चलते जा रहे थे. तभी उन्होंने देखा कि जलधारा में फ़र का एक काला कोट बहा जा रहा है. एक शिष्य ने ख़ुशी से चिल्लाकर कहा – “देखो, ये तो चमत्कार हो गया! ईश्वर ने हमारी सुन ली! हम बहुत भाग्यशाली हैं!”

तीनों शिष्यों को तैरना नहीं आता था इसलिए उनके कहने पर गुरु ने कोट को लाने के लिए नदी के ठंडे पानी में छलांग लगा दी. कुछ पल बीतने के बाद शिष्य यह देखकर भयभीत थे कि गुरु भी कोट के साथ बहाव की दिशा में बहे जा रहे थे. इतना ही नहीं, गुरु किसी और चीज़ से भी भरसक अपना बचाव करने के लिए छटपटा रहे थे. एक शिष्य ने चिल्लाकर गुरु से पूछा – “गुरुदेव! क्या हो रहा है!? आप कोट को बह जाने दें! यदि आप इसे नहीं छोड़ेंगे तो आप डूब जायेंगे!”

और उन्होंने बड़ी दूर से गुरु को चिल्लाते हुए सुना – “मैं इसे छोड़ना चाहता हूँ पर ये कोट नहीं है! ये काला भालू है और अब यह मुझे नहीं छोड़ रहा…!

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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