सुल्तान और शेख़ : A Sultan and A Sheikh

Mausoleums of Sheykh-e Attar& Kamalolmolk


बहुत समय पहले ऑटोमन साम्राज्य का सुल्तान इस्तांबुल के एक महान सूफी शेख के दर्शन के लिए गया. वह शेख के ज्ञान और चरित से बहुत प्रभावित हो गया और शेख के समागम में नियमित रूप से उपस्थित होने लगा.

एक दिन सुलतान ने शेख से कहा – “मुझे आपसे और आपके सत्संग से बहुत प्रीति हो गयी है. एक सुलतान के रूप में मैं आपके लिए कुछ करना चाहता हूँ. कृपा करके मुझे बताएं कि मैं आपके लिए क्या करूँ जिससे आपको प्रसन्नता हो”. – सुलतान की यह पेशकश सामने खुले पड़े खजाने के माफिक थी क्योंकि वह पृथ्वी का सबसे धनी और शक्तिशाली व्यक्ति था.

शेख ने कहा – “जी, एक चीज़ है जो आप मेरे लिए कर सकते हैं. कृपया यहाँ दोबारा नहीं आइये”.

सुलतान यह सुनकर स्तब्ध हो गया. उसने शेख से पूछा – “क्या मुझसे कोई गलती हो गयी है? मुझसे जो कुछ भी जाने-अनजाने हुआ हो मैं उसके लिए आपसे माफी मांगता हूँ.”

शेख ने उत्तर दिया – “नहीं. मुझे आपसे नहीं बल्कि अपने दरवेशों से समस्या है. आपके यहाँ आने से पहले वे केवल ईश्वर की प्रार्थना और उपासना में ही रत रहते थे. अब आपको यहाँ अपने इतने करीब पाकर उनके मन में आपको अनुग्रहीत करके आपसे अनुदान और पारितोषक पाने की इच्छा पनपने लगी है. मैंने आपको यहाँ और आने से इसलिए मना किया है क्योंकि मुझे यह लगता है कि हम अभी आत्मिक स्तर पर इतने परिपक्व नहीं हैं कि आपकी उपस्थिति से प्रभावित न हो सकें.”

(जेम्स फेडीमेन और रॉबर्ट फ्रेजर की कहानी – A story by James Fadiman & Robert Frager)

Many years ago the sultan of the Ottoman Empire visited one of the great sheikhs of Istanbul. He was deeply impressed with the wisdom and sincerity of the sheikh and began coming regularly to the sheikh’s gatherings.

After some time the sultan said, “I have come to love you and your teachings. If there is ever anything you want or need, please ask me and I will provide it for you if it is in my power.” That was, in effect, a blank check from one of the wealthiest and most powerful men on earth.

The sheikh replied, “Yes, there is one thing you can do for me. Please do not come back.”

The astonished sultan asked, “Have I done anything to offend you? If so, please accept my apologies.”

The sheik replied, “No, the problem is not you; it is my dervishes. Before you began visiting us, they would pray and chant to God, seeking only God’s blessings. Now their minds are occupied with thoughts of pleasing you and receiving a reward from you. I have to ask you not to come back because we are not spiritually mature enough to handle your presence here.”

Advertisements

About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 7 comments

टिप्पणी देने के लिए समुचित विकल्प चुनें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s