अच्छे विचार : बुरे विचार

atropa belladonna


“मुझे कोई मार्ग नहीं सूझ रहा है. मैं हर समय उन चीज़ों के बारे में सोचता रहता हूँ जिनका निषेध किया गया है. मेरे मन में उन वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा होती रहती है जो वर्जित हैं. मैं उन कार्यों को करने की योजनायें बनाते रहता हूँ जिन्हें करना मेरे हित में नहीं होगा. मैं क्या करूं?” – शिष्य ने गुरु से उद्विग्नतापूर्वक पूछा.

गुरु ने शिष्य को पास ही गमले में लगे एक पौधे को देखने के लिए कहा और पूछा कि वह क्या है. शिष्य के पास उत्तर नहीं था.

“यह बैलाडोना का विषैला पौधा है. यदि तुम इसकी पत्तियों को खा लो तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी. लेकिन इसे देखने मात्र से यह तुम्हारा कुछ अहित नहीं कर सकता. उसी प्रकार, अधोगति को ले जाने वाले विचार तुम्हें तब तक हानि नहीं पहुंचा सकते जब तक तुम उनमें वास्तविक रूप से प्रवृत्त न हो जाओ”.

There are 72 comments

  1. Gourav Agrawal

    “अधोगति को ले जाने वाले विचार तुम्हें तब तक हानि नहीं पहुंचा सकते जब तक तुम उनमें वास्तविक रूप से प्रवृत्त न हो जाओ”

    बिलकुल सही है … आपकी हर पोस्ट का अपना अलग ही महत्त्व होता है

    मुझसे रहा नहीं गया इसलिए अपनी तरफ से कुछ लिख रहा हूँ…..
    मेरे मन में भी ये ही तर्क उठा था की विचार से ही तो कर्म बनते हैं पर तब मैंने इसी पोस्ट को दोबारा तिबारा पढ़ा और निष्कर्ष निकाला की अगर उस वर्ग विशेष के मानवों की बात की जाए जो इस अपराध बोध में रहते हों की सिर्फ बुरे विचार आने भर को पाप मान लिया जाता है तो उनके मन में आये अपराध बोध को मिटाने के लिए ये शिक्षाप्रद प्रसंग है . एक प्रसंग से मिली शिक्षा सभी स्थानों पर फिट नहीं आ सकती … जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ये प्रसंग है उस उद्देश्य की पूर्ति ये सहजता से कर रहा है .

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    1. Gourav Agrawal

      कुछ सार तर्क पेश कर रहा हूँ इस प्रसंग के पक्ष में

      १. एक छोटी सी स्वतंत्रता किसी सुहृदय प्रतिभावान के हाथ में हो तो एक सकारात्मक क्रांति में सहयोगी बन सकती है और वही स्वतंत्रता किसी दुष्ट व्यक्ति के हाथ में विनाश भी ला सकती है . हथियारों पर ये बात बिलकुल फिट होती है.
      २. कुछ मानसिक परेशानियों में ऐसा होता है की मानव किसी तरह के नकारात्मक विचार आने मात्र से अपने आप को अपराधी महसूस करने लगता है
      ३. अगर किसी शिक्षा प्रद कहानी को पढने के बाद भी को विरोधी तर्क मन में उठता है तो सिर्फ दो ही बातें हो सकती हैं या तो हम अर्जुन की तरह प्रश्न पूछ रहें हैं ……तब तो ठीक है पर अगर ऐसा नहीं है तो हमारे मन की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह उठाना चाहिए
      —————————————————————————-
      निशांत जी , मैं इतने बड़े कमेंट्स के लिए क्षमा चाहता हूँ …अगर आप इन्हें गैर जरूरी समझे तो डिलीट कर दें , या मेरी बात से सहमत न भी हो अवश्य बता दें

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  2. jugal

    achchhe vichar hai tatha ise patha kar karya kshamata me vridhdhi hoti hai man me shanti aur ek samanit jiwan jine ka rah ki aur insan ke kadam badhate hai. pani ko niche ki taraf bahana aasan hai parantu uper ki or le jana bahut mehanat v sayam ki jarurat hoti hai so ham sab ko es taraf prayas karane chahiye. yadhyapi jhyan dena aasan hai par usako nibhane ke bahut prayas karane parate hai. ishwar ham ko shakti deve esi vichar ke sath

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  3. rafat alam

    सोच जीवन का हिस्सा है .श्वास सामान विचार भी लगातार चलते हैं .सोच वर्जित कभी नहीं होती. सामाजिक परिस्थितयां तै करती है क्या अच्छा है और क्या बुरा .यहाँ तक की एक के लिए जो वस्तु आनंद का साधन है दूसरे के लिए निषेध है .किसी विचार से तो कभी हानि नहीं होती, हाँ अपराधबोध ज़रूर जानलेवा होसकता है

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  4. J.K.Chettri

    inshan ke under do baty hoti hai. who hai man or atama. Man bahut hi chanchal hota hai. Her chij pany ki khanny ki or karny ki lalsa/chahat ki
    yojana man hi man main banata hai. Dusari taraf atama hai jo achhe bury ki
    jankari (karo or matkaro) aapke chanchal Man ko samay rahtay hi batata hai.
    Aab yeh dono chij aap ke sharir main hai. Jo ke aapke control main hai.Aab
    ushmay vash pana ya napana woh aap ke upper nerbhar karta hai.

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  5. braham swarup

    is duniya me jo bhi hain wo sab sankalp matra se hai. is liye hamare sankalp jitne drad honge utni hi unke pure hone ki sambhavna hoti hai. is liye apne sankalp se hone vale durvicharo ko bhi nakara nahi ja sakta kyo ki wo hamare antah karan ko dusit karte hain jiski vajah se suvichar ke aane ki sambhavna kam ho jati hai. ……………”jai sachchidanand” From Braham swarup

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