शैतान की दुकान : Satan Opens a Shop

the observer


बदलती हुई दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलने की इच्छा से शैतान ने यह तय किया कि वह अपने प्रलोभनों के पुराने स्टॉक को सस्ते में निकाल देगा. उसने अखबार में इसके लिए एक विज्ञापन भी छपवा दिया और उसकी दुकान में ग्राहकों की भीड़ लगने लगी.

टेबलों पर करीने से सजाया हुआ माल शानदार और अच्छी हालत में था. सत्य के मार्ग पर चलने वालों की राह में अटकाने के लिए छोटे-बड़े रोड़े थे. आत्म-गरुता को बढ़ा-चढ़ाकर देखने के लिए स्वच्छ दर्पण थे. ऐसे चश्में भी थे जिन्हें लगाने पर दूसरे दो कौड़ी के जान पड़ते थे. कुछ चीज़ों को दीवार पर टांगा हुआ था : इनमें पीठ-पीछे वार करने के लिए पैने खंज़र तथा झूठ और प्रलाप को सुनाने वाले टेप-रिकार्डर नई जैसी हालत में थे.

“इनकी कीमत की चिंता नहीं करें!” – शैतान ने घोषणा की – “इन्हें आज अपने घर ले जाएँ और किश्तों में सुविधानुसार दाम चुकाएं”.

एक आगंतुक ने देखा कि दुकान के एक कोने में दो पुराने औज़ार उपेक्षित से पड़े हुए थे और उनकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया था. उनपर बहुत ज्यादा कीमत लिखी हुई थी. उसने शैतान से इस बाबत पूछा.

“ओह, वे तो मेरे पसंदीदा औज़ार हैं. वे घिसे हुए हैं क्योंकि मैंने उन्हें बहुत इस्तेमाल किया है” – शैतान ने हंसते हुए कहा – “यदि लोगों का ध्यान उनकी ओर जाएगा तो वे खुद को उनसे बचाना सीख जाएंगे”.

“जो भी हो, उनपर लिखी हुई कीमत बिल्कुल वाजिब है. इनमें से एक ‘संदेह’ है और दूसरा है ‘हीन भावना’. बाकी सारे प्रलोभन कभी-न-कभी काम करना बंद कर सकते हैं लेकिन ये दोनों अपना काम हमेशा बखूबी और बेखटके करते रहते हैं”.

(पाउलो कोएलो के ब्लॉग से ली गई कहानी)

(A story on devil/Satan – Paolo Coelho – in Hindi)

(~_~)

Needing to adapt to the new times, Satan decided to get rid of a whole lot of his stock of temptations. He placed an ad in the newspaper and attended his customers all day in his workshop.

It was a fantastic stock: stones for the virtuous to stumble over, mirrors for increasing one’s self-importance, and spectacles that reduced the importance of others. Some objects hanging on the wall drew a lot of attention: a dagger with a curved blade to be used on someone’s back, and tape-recorders that registered only gossip and lies.

Don’t worry about the price! – shouted old Satan to the potential customers. – Take it home today and pay for it whenever you can!

One of the visitors noticed three tools lying in a corner that seemed to be quite worn and attracted little attention. But they were very expensive. Curious, he wanted to know the reason for that apparent discrepancy.

They are worn because they are the ones that I use most of all – answered Satan with a laugh. – If they drew a lot of attention, people would know how to protect themselves.

However, they are both worth the price I am asking for them: one is Doubt, the other is the Inferiority Complex, the third is Bitterness. All the other temptations can sometimes fail, but these three always work.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 5 comments

  1. प्रवीण पाण्डेय

    हीन भावना और संदेह, दोनों ही बाधक हैं बढ़ने में । पर यह दोनों तो स्वयं से उत्पन्न हैं, इसमें शैतान का क्या योगदान । मैने शैतान के बारे में नहीं पढ़ा है पश्चिमी ग्रन्थों के आधार पर । प्रकाश डालें ।

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    1. Nishant

      धन्यवाद प्रवीण जी. पाश्चात्य दर्शन और तत्वमीमांसा में शैतान को ईश्वर के समकक्ष और उतना ही शक्तिशाली रखने का विचार हमारी परम्पराओं और मान्यताओं से मेल नहीं खाता. पुराणों में असुरों का वर्णन है पर वे शैतान जैसे ‘परमपद’ के अधिकारी नहीं हैं. रावण और हिरन्यकश्यप भी ईश्वरीय सत्ता के विरोध में खड़े दीखते हैं पर उनके अपने व्यक्तिगत कारण और दुराभाव, और ईश्वर द्वारा किये जाने वाले भेदभाव भी हैं. वे ईश्वर समेत सम्पूर्ण मानव जाति के नाश के प्रति उस प्रकार समर्पित नहीं है जैसे बाइबिल में शैतान दिखता है.

      इस कहानी से इत्तफाक न रखना तो संभव है ही. पर अंतस के तम को, बौद्ध दर्शन में जिसे संस्कार कहते हैं वह, चित्त की प्रेयकारक वृत्तियाँ जो मनुष्य को डिगाती हैं, और वह शैतानी फितरत जो किसी में भी कभी भी जाग सकती है, वही ग्रंथों और कथाओं में शैतान का रूप धर लेती है. इस तरह सदेहीकरण कर देने पर शत्रु को पहचान पाना सरल होता है शायद.

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  2. Vivek Saraswat

    This story belongs to P C from Brazil, one of the great writer of modern era, who is specialize to synchronize, narration on mind with both the stands of human nature, which suggest us to decide core reason for activity either GOOD OR BAD.
    In the Bible, there are lot of reasoning and stories related with Evil. In hindu mythology, there are lots of stories related with this matter, not a work created in few months but continuous thought process of thousands of years, reflects EVIL OR GOD actually inherritated/focused/printed/generated in terms of thoughts, we used to take care of these thoughts like a HUMAN CYCLE, starts as a baby. Stories (Either western OR HINDU) could be soothing us as per maturity of civilization at the time of narration.
    Thanks a lot to Nishantji for refreshing us with this beautiful short story, shows our standing on the shop, where we are purchasing all evil’s goods on daily basis.

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