भलाई की प्रशंसा? : Praise of Goodness

Monastery on Hilltop


सीटा के ईसाई मठ में महंत लूकास ने एक दिन सभी शिष्यों को प्रवचन के समय कहा :-

“ईश्वर करे कि तुम सभी भुला दिए जाओ”.

“यह आप क्या कह रहे हैं?” – उनमें से एक ने कहा – “क्या इसका अर्थ यह है कि कोई भी हमसे जगत के कल्याण करने की सीख नहीं ले पाएगा?”

महंत ने कहा – “तुम सभी यह जानते हो कि पुराने जमाने में सभी सत्य के मार्ग पर चलते थे और ऐसा कोई भी नहीं था जिसके चरित्र और व्यवहार को सभी अनुकरणीय मानते”.

“सभी धर्म के मार्ग पर चलते थे. शुभ कर्म करते समय कोई यह नहीं सोचता था कि उन्हें धर्मसम्मत कार्य करने के निर्देश दिए गए हैं. वे अपने पड़ोसी से इसलिए प्रेम करते थे क्योंकि इसे वह जीवन का अनिवार्य अंग समझते थे. वे प्रकृति के नियमों का पालन ही तो करते थे!”

“वे आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह नहीं करते थे क्योंकि वे जानते थे कि वे इस दुनिया में केवल एक अतिथि के रूप में आये थे और ज्यादा बोझा नहीं ढो सकते थे.”

“वे एक-दूसरे के साथ स्वतंत्रतापूर्वक चीज़ों का आदान-प्रदान करते थे. न तो वे किसी वस्तु पर अधिकार जताते थे, न ही वे किसी से ईर्ष्या रखते थे”.

“यही कारण है कि उनके जीवन के किसी भी पक्ष के बारे में कुछ भी कहा-लिखा नहीं गया. उनका इतिहास भी नहीं है और वे कहानियों में भी नहीं मिलते. जब अच्छाई इतनी ही सर्वसुलभ और साधारण हो जाती है तो उसका पालन करनेवालों की प्रशंसा कौन करता है?”

(A story on goodness – Paolo Coelho – in Hindi)

(~_~)

In the monastery of Sceta, Abbot Lucas gathered the brothers together for a sermon.

‘May you all be forgotten,’ he said.

‘But why?’ one of the brothers asked. ‘Does that mean that our example can never serve to help someone in need?’

‘In the days when everyone was just, no one paid any attention to people who behaved in an exemplary manner,’ replied the abbot.

” ‘Everyone did their best, never thinking that by behaving thus they were doing their duty by their brother. They loved their neighbour because they understood that this was part of life and they were merely obeying a law of nature.

“They shared their possessions in order not to accumulate more than they could carry, for journeys lasted a whole lifetime.

“They lived together in freedom, giving and receiving, making no demands on others and blaming no one.

“That is why their deeds were never spoken of and that is why they left no stories. If only we could achieve the same thing now: to make goodness such an ordinary thing that there would be no need to praise those who practice it.”

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 4 comments

  1. Gyandutt Pandey

    संत लूकास का आशीर्वाद आजकल फल क्यों नहीं रहा? पिछले सौ सालों में जितनी हैगियोग्राफी (hagiography) लिखी गयीं, उतनी शायद पहले न लिखी गयी होंगी!

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