दुःख की रग

sad little monkey


घर में टी वी बहुत कम देखा जाता है. मुझे तो वैसे भी बहुत कम समय मिलता है. पत्नी को भी सीरियलों का चस्का नहीं है. पहले कुछ देख भी लेती थी पर वह भी मैंने उसके देखते समय कुड़-कुड़ करके कम करा दिया. बच्चे कार्टून और गाने देखना पसंद करते हैं लेकिन देखते समय टी वी के बिलकुल करीब आ जाते हैं इसलिए अब टी वी बहुत कम ही चलता है. शाम को जब साथ बैठकर खाना खाते हैं तब थोड़ी सी न्यूज़ या बच्चे की पसंद का चैनल टंगा रहता है.

ऐसे में कल शाम को मैं उससे पूछ बैठा कि अब तुम सीरियल वगैरह क्यों नहीं देखतीं. उसने कई वज़हें गिनाईं जैसे, आप नहीं देखते तो हमें भी देखने का मन नहीं करता (सुनकर ख़ुशी हुई), और यह कि सारे सीरियलों में कुछ एपीसोड बाद कहानी का भठ्ठा बैठ जाता है (वो तो है). फिर उसने यह भी कहा – “इतने सारे सीरियल और प्रोग्राम देखकर तो मैं इसी नतीजे पर पहुँची हूँ कि अच्छे लोगों के साथ हमेशा बुरा ही होता है और बुरे लोगों के साथ न केवल अच्छा होता है बल्कि उनका कोई कुछ बिगाड़ (उखाड़) भी नहीं पाता. अब ऐसे में क्या वही सब देखना जो कहीं से भी मन को सुहाता न हो!”

ह्म्म्म… बहुत बार सुनी है मैंने यह बात. अब तो इसमें कोई नयापन भी नहीं है. एथिक्स के निचोड़, शुभ-अशुभ के द्वंद्व, संकल्प-प्रयोजन के शास्त्रीय अध्ययन में माथाफोड़ी करने के बाद भी इसका हेर-फेर समझ में नहीं आता. मन इसे मानने से इंकार करता है लेकिन अनुभव इसे पक्का करने को विवश भी करने लगता है. बहुत पहले पढ़ी स्टेटिसटिक्स भी कुछ कुछ याद आती है जिसके अनुसार दुनिया में भले व्यक्तियों की संख्या में सतत ह्रास होता रहता है जिसे पलटा नहीं जा सकता. और यह कि यह प्रकृति का नियम है.

मुझे बहुत पहले पढ़ी एक कहानी भी याद आती है जिसका कुछ अंश मैं भूल चुका हूँ. कहानी के अनुसार ईश्वर इस संसार को प्रलय से नष्ट करने के लिए अपना देवदूत बहुत पहले ही भेज चुके हैं लेकिन उसे प्रलय मचाने की आज्ञा के साथ एक कंडीशन अप्लाई भी दिया है ईश्वर ने. शर्त यह है कि प्रलय का शंख तब तक नहीं फूंका जाये जब तक संसार में एक भी भला आदमी जीवित है (ईश्वर भले लोगों से प्रेम करता है). अब देवदूत स्ट्रेटोस्फेयर में चिरकाल से फ्लटरिंग कर रहे हैं उस पल के इंतजार में जब दुनिया से आखिरी भला आदमी या तो उठ जायेगा या उठा दिया जायेगा. उठा दिए जाने के चांस ज्यादा हैं, आदमी भला जो ठहरा.

भले लोगों के साथ ऐसा क्यों होता है? भले लोगों को दुःख क्यों सहने पड़ते हैं? इन प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए किताबों की शरण में जाऊं तो कर्म सिद्धांत का रट्टीफिकेशन सर भन्नाने लगता है – “इस जन्म में बुरा इसलिए है क्योंकि पिछले जन्म में बुरा किया था. सब कुछ सह लो लेकिन भले बने रहो ताकि अगले जन्म में ये दिन न देखने पड़ें.” और फिर मेरे लॉजिक – “बताओ अन्नू भैया की बिटिया ने ऐसे कौन से बुरे कर्म किये थे जो उसे बचपने में ही इतने गंभीर रोग का शिकार होना पड़ा और बेचारी चल बसी!? और इंदौर वाले मौसाजी और मौसीजी ने तो कोई सुख नहीं देखे! अब तो पूरे खानदान में कोई नहीं बचा! कितने भलेमानस थे सभी!”

”शांत वत्स! उन्होंने अपने कर्मों का परिमार्जन कर लिया है और अब वे अपने अगले जन्म में सुख भोग रहे होंगे.” लेकिन सुख तो बुरे लोग उठा रहे हैं न? इसका मतलब वे सभी अगले जन्म में बुरे व्यक्ति बने होंगे. तब वे अपने और आगे वाले जन्म में दुःख उठाएंगे! सही पकड़ा! यही तो कैच है! काल का पहिया घूमे रे भैया… पेरे जाओ, पीसे जाओ… भगवान की चक्की वैसे भी बहुत धीरे-धीरे और बारीक पीसने के लिए मशहूर है.

कुल मिलाकर यही समझ पाया हूं कि दुःख ऐसी छूत की बीमारी है जो जन्म-जन्मांतरों तक भी पीछा नहीं छोड़ती. इससे बचने की छटपटाहट में और ज्यादा दुःख है. इंजेक्शन लगवाते समय अपने हाथ को कठोर कर लेने पर बाद में कई दिनों तक सूजन और दर्द की त्रासदी को झेलना पड़ता है.

मानव देह में प्रोग्रामिंग के बग की तरह हैं दुःख. इब्न-ए-मरियम दो मिलेनियम पहले एक ठो कोटेशन भी ठोंक गए इसकी महत्ता पर – “ब्लेस्ड आर दोज़ हू मॉर्न”. ज़िंदगी का फोटो फ्रेम टांगने के लिए जिस कील की दरकार है उसका नाम है दुःख. दुःख से बचने के लिए शुभ कर्म करने का मार्ग सुझाया गया है. नेकी कर दरिया में डालने की सलाह भी दी जाती है. कर्मफलों के प्रति आसक्ति होने को दुःख का मूल कहते हैं. कुछ पाने या नहीं पा सकने और प्राप्त वस्तु की मात्रा आदि भी दुःख के कारक हैं. कुल मिलाकर यही समझ में आता है कि मानव मन अपने मूल में परिवर्तनों का विरोधी है. यह नवजात काल में ही कष्ट और वेदना के प्रति दुराभावी हो जाता है यह जानते हुए भी कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है.

कहीं की बात कहीं और चली जाती है लिखते समय. अब तो मसले का लब्बोलुआब देने की हसरत भी नहीं हो रही. जब बचने की सूरत-ए-हाल ही न हो और जिंदगी ने आपको कॉर्नर्ड कर दिया हो तो कर ही क्या सकते हैं. पोस्ट को खत्म करने के लिए चिनुआ अचेबे की यह बात याद आ रही है. श्रीमान जी ने फरमाया था –

”जब दुःख तुम्हारा द्वार खटखटाता है और तुम उससे कहते हो कि भीतर बैठने की जगह नहीं है तो दुःख कहता है ‘कोई बात नहीं, मैं हमेशा अपना स्टूल साथ लेकर चलता हूं’.”

(A personal post on the nature of suffering – in Hindi)

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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