ज्ञान का मार्ग

guava


एक शिष्य ने एक दिन सूफी संत फिरोज़ से पूछा:

“किसी गुरु की एक झलक पाकर ही उसके इर्दगिर्द जिज्ञासुओं का तांता लग जाता है जिन्हें गुरु से ज्ञान पाने की आस होती है. क्या यह अपने में कोई अवरोध या गतिरोध नहीं है? क्या ऐसा होने पर गुरु अपने मार्ग से भटक नहीं सकता? क्या यह संभव है कि गुरु को कभी यह खेद होता हो कि वह जिसे सिखाना चाहता है उसे नहीं सिखा पा रहा है?”

फिरोज़ ने कहा :

“पके हुए अमरूदों से लदे पेड़ को देखकर राहगीरों की भूख जाग जाती है. यदि कोई अपनी भूख से ज्यादा अमरुद खायेगा तो उसका पेट दुखने लगेगा. लेकिन उस व्यक्ति का पेट नहीं दुखा करता जिसके आँगन में अमरुद का पेड़ लगा होता है.

ऐसा ही कुछ हमारी ज्ञान की खोज के साथ भी होता है. रास्ता तो सबके लिए खुला है, लेकिन ईश्वर ने प्रत्येक जिज्ञासु के लिए पहले ही हद तय कर दी है.”

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क्या आप इससे इत्तेफाक रखते हैं?

(An Sufi story/anecdote of Master Feroze – in Hindi)

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 12 comments

  1. आलोक

    आपने पूछा है कि क्या हम इससे इत्तेफ़ाक रखते हैं इसलिए लिख रहा हूँ कि नहीं रखता, क्योंकि ये “गुरु” भी इंसान ही हैं, अर्थात् यहाँ दिया अमरूद के फल रूपी गुरु और अमरूद खाने वाले शिष्यों का उदाहरण सही नहीं बैठता है।

    इंसान है तो उसमें दुश्चरित्रता भी आ सकती है, द्वेश, ईर्ष्या, घमंड आदि जैसे लालच आ सकते हैं। शिष्यों को यह मान के चलना चाहिए कि गुरु भी उनकी तरह ही मनुष्य है।

    ऐसा न होगा तो धर्मान्धता और अन्धविश्वास का प्रादुर्भाव होने में देर न लगेगी।

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  2. praveen jakhar

    मैंने आपकी एक नहीं दो लघुकथाएं पढ़ी। ‘इतना महंगा नाश्ता’ और ‘ज्ञान का मार्ग’। दोनों ही लाजवाब। आपके प्रोफाइल से पता चला कि आप अनुवादक हैं, शायद भारत सरकार में। एक निवेदन है। हम पत्रिका में साहित्य का पेज प्रकाशित करते हैं। हर रविवार। इसे आज आप हमारी वेबसाइट पर भी देख सकते हैं (www.patrika.com) रविवारीय में पृष्ठ दो पर। आपने निवेदन करना चाहंूगा कि आप लिखते बहुत अच्छा हैं। ऐसी ही लघुकथाएं जो अप्रकाशित हों आप हमें भेज सकते हैं। हमें खुशी होगी एक अच्छे लेखक को एक बड़े अखबार के साथ जोड़कर।

    बाकी आपने ‘ज्ञान का मार्ग’ में सही कहा कि –

    “पके हुए अमरूदों से लदे पेड़ को देखकर राहगीरों की भूख जाग जाती है. यदि कोई अपनी भूख से ज्यादा अमरुद खायेगा तो उसका पेट दुखने लगेगा. लेकिन उस व्यक्ति का पेट नहीं दुखा करता जिसके आँगन में अमरुद का पेड़ लगा होता है.

    बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति। आप मेरे ब्लॉग पर आए थे, इसलिए इतनी जल्दी परिचय हो गया, वर्ना होता तो सही लेकिन पता नहीं कब। अब जब संपर्क हुआ है, तो जुड़े रहिएगा।

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  3. Gyan Dutt Pandey

    असल में पुनर्जन्म का सिद्धान्त मानें तब इस पर यकीन होता है कि भगवान ने सीमायें तय की हैं। जिज्ञासा का अंत पूर्ण ज्ञान प्राप्ति है। वह जिज्ञासा जन्म जन्मान्तर तक जागृत रहती है।

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