क्या आप अपनी पोस्टें चोरी किये जाने से नाराज़ हैं?

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यह पोस्ट अंग्रेजी के अत्यंत लोकप्रिय ब्लौग ज़ेन-हैबिट्स के रचयिता लियो बबौटा द्वारा कॉपीराइट पर लिखी गई बेहतरीन पोस्ट का संपादित हिंदी अनुवाद है.

ओपन सोर्स सोफ्टवेयर क्रांति के जनक रिचर्ड स्टालमैन ने कहा था – “मेरी दृष्टि में स्वर्णिम नियम यह होगा कि यदि मुझे कोई प्रोग्राम अच्छा लगता है तो मुझे इसे उन लोगों के साथ बांटना चाहिए जो इसे पसंद करते हैं”.

मुझे बहुत सारी ई-मेल मिलती हैं जिनमें मुझसे ज़ेन-हैबिट्स पर प्रकाशित पोस्टों को अन्य ब्लौगों, न्यूज़लैटर, कॉन्फ्रेंस, और कक्षाओं में पुनः प्रकाशित करने की अनुमति मांगी जाती है. इसके अतिरिक्त अनुवादक भी मुझे पोस्टों और मेरी ई-बुक को अनूदित करने और दूसरे माध्यमों में प्रकाशित करने के लिए संपर्क करते हैं.

हाल तक तो मैं उन्हें मुख्यतः अव्यवसायिक उपयोग के लिए सीमित अनुमति दे दिया करता था लेकिन अब मैं उन्हें मेरी लिखी किसी भी ब्लौग पोस्ट या ई-बुक को किसी भी रूप में उपयोग के लिए पूर्ण अनुमति देता हूँ. वे किसी भी फॉर्मेट में उसका उपयोग कर सकते हैं.

अब से मुझे ई-मेल भेजकर कोई अनुमति मांगने की आवश्यकता नहीं है. आप इसका जैसा चाहें वैसे उपयोग करें. ई-मेल करें, कॉपी करके फौरवर्ड करें, मुद्रित करें – मुझे इसका क्रेडिट भी न दें. चाहें तो इसमें फेरबदल करें, कुछ वाहियात बातें इसमें शामिल करके मुझे उसका क्रेडिट दे दें तो भी चलेगा. मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है.

क्रेडिट और भुगतान के बारे में क्या? – हांलाकि आपपर ऐसा करने की बाध्यता नहीं है फिर भी मुझे अच्छा लगेगा यदि आप मेरे लेखों के लिए मुझे क्रेडिट दें और बेहतर हो तो मूल सामग्री का लिंक भी उपलब्ध कर दें. यदि आप मेरी ई-बुक के प्रचार में सहयोग देना चाहते हैं तो कमीशन की बात भी की जा सकती है. मैं चाहता हूँ कि लोग मेरी ई-बुक खरीदें लेकिन यदि वे इसकी कॉपी करके इसे अपने दोस्तों को भेज देते हैं तो उन्हें ऐसा करने का अधिकार है.

मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ? – मुझे कॉपीराइट कानून उचित नहीं लगते. इनका सहारा लेकर बड़े-बड़े कारपोरेशन सामान्य जनता पर अंकुश लगते हैं ताकि वे अपना भारी लाभ कमाना जारी रख सकें.

कॉपीराइट कानूनों के लिए यह दलील दी जाती है कि उनसे रचनाकार (लेखक, ब्लौगर, कलाकार, वैज्ञानिक, आदि) के हितों की रक्षा होती है लेकिन अधिकतर मामलों में रचनाकार को कोई खास मुनाफा नहीं होता बल्कि कारपोरेशन मलाई मार ले जाते हैं. मैं यह प्रयोग इसलिए भी कर रहा हूँ ताकि मुझे यह पता चल सके कि कॉपीराइट से मुक्त हो जाने पर रचनाकार को वाकई कोई हानि होती है या नहीं.

मुझे लगता है कि यह संरक्षणवाद वास्तव में ‘एंटी-पायरेसी’ आन्दोलन और इससे जुड़े कानूनविदों और मठाधीशों द्वारा पाला-पोसा जा रहा है. रचनाकार को वास्तव में इससे कोई लाभ नहीं है. मुनाफा बढ़ाने के लिए किसी रचना को सीमित मात्र में जारी करना बढ़िया विचार नहीं है.

कॉपीराइट कानूनों की अनुपस्थिति और दूसरे कलाकारों और उद्यमियों द्वारा भरपूर कॉपी किये जाने पर भी लेओर्नादो द विन्ची को कोई नुकसान नहीं हुआ. उनकी मोनालिसा, लास्ट सपर, और ऐसी ही अनेक महान पेंटिंग्स इसकी गवाह हैं. शेक्सपीयर को भी कोई घाटा नहीं सहना पड़ा. हो सकता है कि मेरा ज्ञान कुछ कम होने के कारण मैं ज्यादा मजबूत तर्क नहीं जुटा पा रहा हूँ लेकिन मुझे यह लगता है कि किसी भी रचनाकार को कॉपीराइट उल्लंघन से नुकसान नहीं होता.

और फिर मैं कोई लेओर्नादो द विन्ची या शेक्सपीयर नहीं हूँ फिर भी मुझे यह सोचना मुश्किल लगता है कि अपनी रचनाओं को कॉपीराइट मुक्त कर देने से मुझे कोई लाभ हुआ है या नहीं. यदि कोई मेरे ब्लौग का कोई अंश कॉपी करके अपने ब्लौग या किसी अन्य माध्यम में उसका उपयोग करता है तो मुझे इससे ख़ुशी मिलती है. यदि कोई मेरी ई-बुक अपने 100 दोस्तों के साथ शेयर करता है तो इसमें भी मुझे कोई तकलीफ नहीं होती. मुझे लगता है कि मेरा रचनासंसार व्यापक हो गया है. मैं अकेले के दम पर तो इतने सारे लोगों तक नहीं पहुँच सकता था न? यह तो एक प्लस पॉइंट है.

और यदि कोई मेरे लेख को कॉपी करके उसमें अपेक्षित सुधार कर देता है तो यह मेरे लिए बहुत ख़ुशी की बात है. ऐसा तो कलाकार सदियों से करते आये हैं. यदि वे मेरी फेवरिट पोस्ट को लेकर उसे ज्यादा मजेदार, प्रेरणादायक, विचारोत्तेजक, और यहाँ तक कि अधिक मार्मिक बना देते हैं तो मैं उनके प्रति नाराजगी अपने मन में क्यों रखूं. रचनाशील समुदाय में सभी एक दूसरे के कार्य में सुधार या परिवर्तन करके ही तो सीखते हैं.

कॉपीराइट मुक्त करने के विरुद्ध तर्क – कॉपीराइट मुक्त करने के विचार के विरोध में अक्सर कुछ तर्क दिए जाते हैं. उनमें से अधिकांश या सारे तर्कों का तो मैं  निराकरण नहीं कर सकता लेकिन मेरी समझ में निम्नलिखित बातें सामने आती हैं :-

1. गूगल पेजरैंक कम हो जाएगी – जहां तक पेजरैंक की बात है, मेरी जानकारी यह है कि गूगल उन वैबपेजों के विरुद्ध कार्रवाई करता है जिनकी हूबहू सामग्री किसी अन्य वैबपेज पर उपलब्ध रहती है. उनके विरुद्ध गूगल क्या कार्रवाई करता है इसकी मुझे जानकारी नहीं है. यदि लोग मुझसे अनुमति लिए बिना मेरी सामग्री कॉपी कर रहे हैं तो यह संभव है कि मेरी पेजरैंक कुछ कम हो जाएगी सर्च करने पर मेरा लिंक पीछे आएगा. ऐसा है तो मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं है. मैं अपने ब्लॉग के लिए कोई सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन तकनीक का प्रयोग नहीं करता हूं इसलिए मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

2. मेरी ई-बुक से आय कम हो जाएगी – मेरे अनुमान से मेरी ई-बुक खरीदकर कोई इसे अपने 20 दोस्तों को भेज देता है और उनमें से प्रत्येक अपने 20 दोस्तों को इसे भेज देता है और वे 20 अपने 20 दोस्तों को… तो मुझे अब तक $76,000 का घाटा हो चुका है. ऐसा तब होता यदि उन सबने मेरी ई-बुक खरीदी होती. इस बात में कोई दम नहीं है. दूसरी ओर, यदि मैं अपनी ई-बुक को मुफ्त में ही बांटता तो हजारों लोग उसे पढ़ते और ज़ेन-हैबिट्स के बारे में जानकारी पाते. कोई भी रचनाकार दूसरी स्थिति में अधिक संतोष का अनुभव करेगा.

3. लोग जाने मेरी रचनाओं का क्या करते होंगे! – कोई मेरी रचना को कॉपी करके उसे निहायत ही घटिया रूप में प्रस्तुत कर सकता है. कोई उसका बहुत बेहूदा अनुवाद कर सकता है. कोई उसे… और क्या कहूं. कोई भी उसके साथ कुछ भी कर सकता है. ऐसी सोच उस दिमाग से उठती है जो सब कुछ अपने हांथों में रखना चाहता है. मेरा मानना यह है कि आप कोई नियंत्रण लागू नहीं कर सकते. यदि आप कर सकते हों तो भी यह अच्छी बात नहीं है. क्या हो अगर कोई मेरा काम चुराकर उसे शानदार रचना में बदल दे और जगप्रसिद्ध हो जाए? और क्या हो यदि कोई मेरा लिखा कॉपी करके उसके विचार को नया आयाम दे दे, अधिक उपयोगी बना दे, अधिक लोगों तक उसे पहुंचा दे!

नियंत्रण छोड़िए और देखिए कि क्या होता है. दुनिया में बहुत रचनाशील लोग हैं. देखिये वे आपकी रचना के साथ क्या करते हैं.

4.  इससे दूसरे ब्लौगरों को बुरा समझा जायेगा – यदि आप नकारात्मक दिशा में सोच रहे हैं तो यह संभव है. लेकिन मैं ऐसा उन्हें चैलेन्ज देने के लिए या उनकी नीतियों के विरोध में नहीं कर रहा हूँ. यह तो केवल मेरे जीवन मूल्यों के प्रति मेरी आस्था है. और कौन जानता है दूसरे भी मेरे विचार से किसी-न-किसी रूप में प्रभावित हो जाएँ, या शायद न हों. चाहे जो हो, मैं जो कुछ कर रहा हूँ उसके आधार पर दूसरों का निर्णय नहीं किया जाना चाहिए.

5. कभी मेरी कोई किताब छपी तो क्या होगा? – यदि कभी किसी बड़े प्रकाशक ने मेरी किताब छापी तो संभवतः मैं कॉपीराइट मुक्त नहीं कर पाऊँगा. वह तो प्रिंट माध्यम में मेरी पुस्तक छपने के एवज में होगा न, जो कि हमेशा से मेरा सपना रहा है! यदि आपको यह लग रहा है कि मैं अपनी ही बात से फिर रहा हूँ तो ठीक है, ऐसा भी होता है.

6. यदि किसी ने मेरी सामग्री का उपयोग करके किताब छापकर कमाई कर ली तो? – ऐसे में मुझे उम्मीद है कि वे कम-से-कम मुझे उसका क्रेडिट तो देंगे ही. तब मैं यह भी चाहूँगा कि वे अपनी आय में से कुछ अंश भले कामों में लगाने के लिए दान में दें.

7. लेकिन वे तो पोस्टों को चुरा ही रहे हैं! – जिसे आप मुफ्त में ही दे रहे हों उसे कोई चुरा नहीं सकता. ये चीज़ों को शेयर करना है, पायरेसी नहीं.

प्रेरणा : फ्री कल्चर (लौरेंस लेसिंग) और ग्नू (रिचर्ड स्टालमैन)

पुनश्च : स्पष्ट किया जाता है कि इस पोस्ट के छपने के बाद से मेरी सभी रचनाएँ अब पब्लिक डोमेन में हैं. मैं अपनी रचनाओं से सभी प्रकार की कॉपीराइट शर्तें हटाता हूँ. उन्हें किसी भी रूप में मुझे सूचित किये बिना प्रयुक्त किया जा सकता है. क्रेडिट देने का आभार माना जायेगा. (लियो बबौटा)

निशांत मिश्र : लियो बबौटा के ब्लॉग से कोई भी लेख कॉपी करके उपयोग करने की छूट है. हिंदीज़ेन ब्लॉग से कोई भी लेख कॉपी करने वालों से निवेदन है कि कृपया लेख के स्त्रोत की लिंक अवश्य उपलब्ध कराएँ. यह ब्लॉग बहुत सुंदर और उपयोगी है, कृपया इसके प्रचार-प्रसार में सहायक बनें.

(A post about the principles of uncopyright- Leo Babauta – in Hindi)

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 12 comments

  1. cmpershad

    बहुत बढिया लेख। आभार। सच है कि अंतरजाल का मक्सद अधिक से अधिक लोगों तक ज्ञान पहुंचाना है तो रोक क्यों? हां, यदि कोइ ब्लागर/व्यक्ति किसी अन्य लेखक की सामग्री का उपयोग करता है तो लेखक का आभार जताना उस व्यक्ति का कर्तव्य हो जाता है- नहीं जताता है तो उसकी ग़लती ही कही जाएगी। अच्छा सार्थक लेख:)

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  2. सिद्धार्थ जोशी

    आप कुछ घण्‍टे पहले यह अनुवाद दे चुके होते तो मैं इतनी ही आसानी से इसे समझ लेता। लेकिन मुझे लगता है अब तक भी मैंने सही ही समझा है। मैं अपना ज्‍योतिष ब्‍लॉग मुक्‍त कर चुका हूं।

    बस डिस्‍क्‍लेमर में थोड़ा बदलाव करना पड़ा। और हो गया। 🙂

    इस कीमती पोस्‍ट के लिए आभार।

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