सर्बिया की लोक-कथा : वृद्धजनों की प्राणरक्षा

middle of nowhere


प्राचीन काल में प्रथा थी की जब कोई व्यक्ति साठ वर्ष का हो जाता था तो उसे राज्य से बाहर जंगल में भूखों मरने के लिए भेज दिया जाता था ताकि समाज में केवल स्वस्थ और युवा लोग ही जीवित रहें. एक व्यक्ति शीघ्र ही साठ वर्ष का होने वाला था. उसका एक जवान बेटा था जो अपने पिता से बहुत प्रेम करता था. बेटा नहीं चाहता था कि उसके पिता को भी अन्य वृद्धों की भांति जंगल में भेज दिया जाये इसलिए उसने अपने पिता को घर के तहखाने में छुपा दिया और उनकी हर सुविधा का ध्यान रखा.

लड़के ने एक बार अपने पड़ोसी से इस बात की शर्त लगाईं की सुबह होने पर सूरज की पहली किरण कौन देखेगा. उसने अपने पिता को शर्त लगाने के बारे में बताया. उसके पिता ने उसे सलाह दी – “ध्यान से सुनो. जिस जगह पर तुम सूरज की किरण दिखने के लिए इंतज़ार करो वहां सभी लोग पूरब की तरफ ही देखेंगे लेकिन तुम उसके विपरीत पश्चिम की ओर देखना. पश्चिम दिशा में तुम सुदूर पहाड़ों की चोटियों पर नज़र रखोगे तो तुम शर्त जीत जाओगे.”

लड़के ने वैसा ही किया जैसा उसके पिता ने उसे कहा था और उसने ही सबसे पहले सूरज की किरण देख ली. जब लोगों ने उससे पूछा कि उसे ऐसा करने की सलाह किसने दी तो उसने सबको बता दिया कि उसने अपने पिता को सुरक्षित तहखाने में रखा हुआ था और पिता ने उसे हमेशा उपयोगी सलाह दीं.

यह सुनकर सब लोग इस बात को समझ गए कि बुजुर्ग लोग अधिक परिपक्व और अनुभवी होते हैं और उनका सम्मान करना चाहिए. इसके बाद से राज्य से वृद्ध व्यक्तियों को जंगल में निष्कासित करना बंद कर दिया गया.

(A folktale of Serbia about saving old people from dying in forests – in Hindi)

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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