तलवारबाज़ : A Swordsman

Eric Samurai


माताजुरो याग्यु का पिता बहुत प्रसिद्द तलवारबाज़ था। पिता को यह लगता था कि उसका पुत्र कभी भी अच्छी तलवारबाजी नहीं कर पाएगा इसलिए उसने माताजुरो को घर से निकाल दिया।

बेघर माताजुरो बहुत दूर एक पर्वत के पास बांज़ो नामक एक प्रसिद्द तलवारबाज़ के पास गया। बांज़ो ने उसकी तलवारबाजी देखने के बाद कहा – “तुम्हारे पिता ठीक कहते हैं। तुम तलवार चलाना कभी नहीं सीख पाओगे। मैं तुम्हें अपना शिष्य बनाकर बदनाम नहीं होना चाहता।”

माताजुरो ने कहा – “लेकिन मैं यदि परिश्रम करूँ तो प्रवीण तलवारबाज़ बनने में मुझे कितना समय लगेगा?”

“तुम्हारी पूरी ज़िन्दगी” – बांज़ो ने कहा।

“मेरे पास इतना समय नहीं है” – माताजुरो ने उद्विग्न होकर कहा – “यदि आप मुझे सिखायेंगे तो मैं किसी भी समस्या का सामना करने के लिए तैयार हूँ। मैं आपका दास बनकर रहूँगा, फ़िर मुझे कितना समय लगेगा?”

“हम्म… लगभग दस साल” – बांज़ो ने कहा।

माताजुरो ने कहा – “मेरे पिता वृद्ध हो रहे हैं और मुझे उनकी देखभाल भी करनी होगी। यदि मैं और मेहनत करूँ तो फ़िर कितने साल लगेंगे?”

“तीस साल” – बांज़ो बोला।

“ऐसा कैसे हो सकता है” – माताजुरो चकित होकर बोला – “पहले आपने दस साल कहे और अब तीस साल! मुझे कम से कम समय में इस विद्या में पारंगत होना ही है!”

बांज़ो बोला – “तब तो तुम्हें मेरे पास कम-से-कम सत्तर साल रहना पड़ेगा। तुम्हारी तरह जल्दबाजी करनेवाले व्यक्तियों को अच्छे परिणाम शीघ्र नहीं मिला करते।”

“आप जैसा कहते हैं मैं वैसा करने को तैयार हूँ” – माताजुरो ने कहा। उसे समझ में आ गया था कि बांज़ो से बहस करने का कोई मतलब नहीं है।

बांज़ो ने माताजुरो से कहा कि तलवारबाजी तो दूर, वह ‘तलवार’ शब्द का भी भूल से भी उच्चारण न करे। माताजुरो दिन भर बांज़ो की सेवा में खटने लगा। वह उसका भोजन बनाता, साफ़-सफाई करता, कपड़े धोता, और भी तरह-तरह के काम करता। उसने तलवारबाजी या तलवार का नाम भी नहीं लिया।

तीन साल गुज़र गए। माताजुरो सबह से रात तक बांजों के लिए काम करता रहता। अपने भविष्य के बारे में सोचकर वह उदास हो जाता था। जिस विद्या को सीखने के लिए वह पूरा जीवन झोंक देने को तैयार था, उसका नाम लेने की भी उसे अनुमति नहीं थी।

एक दिन माताजुरो चावल बना रहा था तभी पीछे से बांज़ो दबे पाँव आया और उसने माताजुरो पर लकड़ी की तलवार से ज़ोरदार प्रहार किया।

अगले दिन जब माताजुरो किसी और काम में लगा हुआ था, बांजो ने एक बार और उसपर अत्प्रश्याशित प्रहार किया।

इसके बाद तो दिन हो या रात, माताजुरो को हर कभी स्वयं को बांज़ो के आघातों से ख़ुद को बचा पाना मुश्किल हो गया। पहले तो प्रहार जागते में ही होते थे, बाद में सोते में भी होने लगे। कुछ ही महीनों में बांज़ो असली तलवार से उसपर प्रहार करने लगा। एक पल भी ऐसा नहीं बीतता था जब वह बांज़ो के प्रहारों के बारे में नहीं सोचता था।

माताजुरो तलवारबाजी में जल्द ही निपुण हो गया। वह अपने समय का सर्वश्रेष्ठ तलवारबाज़ कहलाया।

(~_~)

Yagyu Matajuro was a young member of the Yagyu family, famous for the family tradition of swordsmanship. However Matajuro’s father was disappointed in his son’s tendency towards laziness and banished him from the dojo. Matajuro, his pride stung resolved to seek out a master and return as a great swordsman. Matajuro journeyed to the Kumano shrine in the province of Kii, where he had heard of a great teacher called Banzo. The monks at the shrine told him that Banzo lived as a hermit in the nearby mountains, and showed him the trail to follow. Eventually he found Banzo asked to be accepted as a student.

“How long will it take me to learn swordsmanship?” he asked.

“The rest of your life,” was the reply.

“I can’t wait that long. I will accept any hardship, and will devote myself completely to the study of swordsmanship.”

“In that case, ten years.”

“What if I train twice as hard?” tried Matajuro.

“In that case, thirty years.”

“Why is that? First you say ten then thirty years. I will do anything to learn, but I don’t have that much time.”

“In that case, seventy years.”

Sensing the direction of the conversation, Matajuro capitulated and agreed to work as long as it took, and do anything he was told. However, for the first year all Banzo had Matajuro do was to perform simple physical tasks such as chopping wood. After a year of this Matajuro was disappointed and demanded that Banzo teach him some swordsmanship. Banzo merely insisted that he chop wood.

Matajuro went to the woodpile and was chopping, but inwardly he was furious. He resolved to leave Banzo the next day. But while he was chopping Banzo crept up behind him and struck him painfully with a wooden sword. “You want to learn swordsmanship, but you can’t even dodge a stick,” he said.

From that day on Banzo would creep up on Matajuro and attack him with a wooden sword. Eventually Matajuro’s senses became heightened, and Banzo had to change tactics. Now Banzo would attack repeatedly, even when Matajuro was asleep. For the next four years Matajuro had not a moment’s rest from the fear of unexpected attack.

One day, when Matajuro was stirring some food on the fire, Banzo crept up and attacked him by surprise. Without thinking Matajuro fended off the blow with the lid of the pot without taking his mind off stirring the food. That night Banzo wrote out a certificate of mastery for Matajuro.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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