बीसवीं शताब्दी के महान भौतिकविद वर्नर हाइज़ेनबर्ग (1901 – 1976) जर्मन सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री थे. उन्होंने क्वांटम मैकेनिक्स के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया. क्वांटम भौतिकी में प्रयुक्त किया जाने वाला अनिश्चितता का सिद्धांत उन्होंने ही प्रतिपादित किया था. नाभिकीय भौतिकी, क्वांटम फील्ड थ्योरी और पार्टिकल थ्योरी के क्षेत्र में भी उन्होंने अनेक नियमों, संकल्पनाओं, और सिद्धांतों को अन्वेषित किया.
वर्नर हाइज़ेनबर्ग उन्नीस साल की उम्र में एक स्कूल में गेटकीपर की नौकरी करते थे. उन्हें पढने का शौक था और वे स्कूल की लाइब्रेरी से पढने के लिए किताबें ले लिया करते थे. एक बार उन्हें प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो की पुस्तक ‘तिमैयस’ मिल गई जिसमें प्लेटो ने परमाणुओं और पदार्थ से सम्बंधित अपने सिद्धांत प्रस्तुत किये थे. मामूली शिक्षा प्राप्त वर्नर हाइज़ेनबर्ग को इस किताब को पढ़ते-पढ़ते भौतिकी में इतनी रुचि हो गई कि उन्होंने इसका विधिवत अध्ययन करने की ठान ली.
इसके बाद जो हुआ वह शिक्षा और प्रतिभा के क्षेत्र में अनुपम उदहारण के रूप में हमेशा याद रखा जायेगा. वर्नर हाइज़ेनबर्ग ने भौतिकी का इतना विषद अध्ययन किया कि मात्र 23 वर्ष की उम्र में वे गौतिन्ज़ेन में महान भौतिकशास्त्री मैक्स प्लांक के सहायक के रूप में नियुक्त हो गए. 24 वर्ष की उम्र में उन्हें कोपेनहेगन के विश्वविद्यालय में अध्यापक का पद मिल गया. 26 वर्ष की उम्र में वे लीप्जिग में भौतिकी के प्रोफेसर बन गए. 32 वर्ष की उम्र में उन्हें पिछले कुछ सालों में भौतिकी के क्षेत्र में किये गए उल्लेखनीय कार्यों के लिए नोबल पुरस्कार मिल गया.
एक गेटकीपर से नोबल पुरस्कार विजेता बनने तक का 13 साल का छोटा सा सफ़र तय करने की मिसाल दुनिया में और कोई नहीं है. एक किताब से प्रेरणा पाकर एक साधारण नवयुवक कितनी ऊंचाइयों तक पहुँच सकता है, वर्नर हाइज़ेनबर्ग की यह कहानी हमें यही बताती है.
(A motivational / inspirational anecdote of Werner Heisenberg – in Hindi)

