पिछली पोस्ट में मैंने एक व्यक्ति का चित्र दिखाकर पाठकों से उसे पहचानने के लिए कहा था. कई लोगों ने सही-गलत उत्तर दिए और चित्र-पहेली को पसंद किया गया. ब्लौग के एक नियमित पाठक ने एक बेनामी कमेन्ट में मेरे ब्लौग की विषयवस्तु के साथ चित्र-पहेली के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाया. मैं उनसे शत-प्रतिशत सहमत हूँ और अब मैं इस धीर-गंभीर ब्लौग में चित्र-पहेली जैसे पाठकजोडू और कमेन्टप्राप्तू प्रयोग नहीं करूँगा. चित्र-पहेली के पीछे मेरा उद्देश्य हांलाकि यह था कि किसी प्रख्यात व्यक्ति के चित्र के बहाने उनसे जुडी जानकारी और संस्मरण आपको पढाए जाएँ.
हिंदीज़ेन वस्तुतः गंभीर ब्लौग है, तब भी जब इसपर पिछले कुछ दिनों से आप सभी मुल्ला नसरुद्दीन के किस्सों का रसास्वादन कर रहे हैं क्योंकि मैं उन्हें चुटकुलों के रूप में नहीं लेता. इस पोस्ट के बहाने मैं आप सभी से सुझाव आमंत्रित करता हूँ कि आप सब यहाँ क्या पढना पसंद करेंगे. मुझे एक मित्र ने पंचतंत्र और हितोपदेश/जातक कथाओं का समावेश करने का सुझाव दिया है. उनका सुझाव उत्तम है लेकिन यह सब तो इन्टरनेट पर अन्यत्र उपलब्ध है. मैं अनुवादक हूँ, इसलिए मेरा यह प्रयास रहता है कि ज्ञान-विज्ञान की उस सामग्री का समावेश ब्लौग में करूँ जो हिंदी के पाठकों को अप्राप्य है. इन्टरनेट पर हिंदी के ये शुरूआती दिन हैं और अभी तो हिंदी में करोडों वेबपेज बनेंगे. आप सभी कभी कोई ऐसी सामग्री अंग्रेजी में पढें जिसे हिंदीज़ेन पर प्रस्तुत किया जा सकता हो तो उसके बारे में मुझे कृपया अवश्य सूचित करें.
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अब थोडी चर्चा कल की चित्र-पहेली के बारे में. चूँकि मैं आपको उस व्यक्तित्व के बारे में और उनसे जुड़े संस्मरणों के बारे में बताने का वादा कर चूका हूँ तो अपने वचन की लाज तो रखनी ही पड़ेगी.
समीर लाल जी, वैभव दीक्षित, गब्बर सिंह और दिनेशराय द्विवेदी जी ने क्रमशः पहेली में दिए गए व्यक्ति को ठीक पहचाना. वे हैं अलेक्जेंडर ग्राहम बेल. उन्होंने 1876 में टेलीफोन का आविष्कार किया था. उनसे पहले भी इस यंत्र की खोज करने के कई असफल प्रयास अन्य वैज्ञानिक कर चुके थे लेकिन सफलता बेल को मिली. बेल बचपन से ही कुशाग्र थे और छोटी उम्र में ही सरल यंत्रों को अपने-आप बनाने लगे थे. अपने युग के अन्य बहुत सारे वैज्ञानिकों के विपरीत उन्हें बहुत अच्छी शिक्षा और आर्थिक पृष्ठभूमि मिली हुई थी. उन्होंने मूक-बधिरों के लिए बहुत काम किया और विमानों के विकास में भी बहुत योगदान दिया.
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“वॉट्सन, यहाँ आओ, मुझे तुम्हारी ज़रुरत है” – ये शब्द विश्व में किसी ने पहली बार टेलीफोन पर कहे थे. उस दिन 10 मार्च 1876 को बेल अपने कमरे में और उनका सहायक वॉट्सन बिल्डिंग के ऊपरी तल पर अपने कमरे में यंत्रों पर काम कर रहे थे. बहुत दिनों से लगातार यंत्रों को जोड़ने पर भी उन्हें ध्वनि के संचारण में सहायता नहीं मिल रही थी.
उस दिन पता नहीं तारों का कैसा संयोग बन गया. वे दोनों इससे अनभिज्ञ थे. काम करते-करते बेल की पैंट पर अम्ल गिर गया और उन्होंने वॉट्सन को मदद के लिए पुकारा. वॉट्सन ने उनकी आवाज़ को अपने पास रखे यंत्र से आते हुए सुना और… बाकी तो इतिहास है.
1915 में अंतरमहाद्वीपीय टेलीफोन लाइन बिछ गई और उसके उदघाटन के लिए बेल को बुलाया गया. बेल पूर्वी तट पर थे और उन्हें कहा गया कि वे कुछ कहकर लाइन का औपचारिक उदघाटन करें. दूसरे छोर पर वॉट्सन थे. जानते हैं बेल ने फोन पर क्या कहा!? “वॉट्सन, यहाँ आओ, मुझे तुम्हारी ज़रुरत है”. वॉट्सन का जवाब था – “सर, मैं आपसे 3000 किलोमीटर दूर हूँ और मुझे वहां आने में कई दिन लग जायेंगे!”
और “हैलो” शब्द किसने गढा? थॉमस एडिसन ने. बेल चाहते थे कि फोन उठाने या सुनने वाला व्यक्ति “अहोय” कहे लेकिन थॉमस एडिसन का “हैलो” लोगों की जुबां पर चढ़ गया.
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इतनी महान खोज करने के बाद भी सालों तक बेल अपनी खोज का महत्त्व नहीं समझ पाए. उनके अनुसार टेलीफोन आम आदमी के उपयोग की वस्तु कभी नहीं बन सकता था.
नेशनल जिओग्राफिक सोसायटी के संस्थापक और अपने भावी ससुर गार्डिनर ग्रीन हब्बार्ड को जब बेल ने अपना टेलीफोन यंत्र दिखाया तो हब्बार्ड ने उनसे कोई उपयोगी वस्तु बनाने के लिए कहा क्योंकि हब्बार्ड के अनुसार “ऐसे खिलौने में लोग भला क्यों रुचि लेंगे?”
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1919 में 72 साल की उम्र में बेल ने पानी पर चलने वाला एक यान हाइड्रोफोइल बनाया जिसने उस समय पानी पर रफ़्तार का विश्व रिकॉर्ड बनाया.
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बोस्टन विश्वविद्यालय में बेल बधिर लोगों को पढ़ाने का काम करते थे. सुप्रसिद्ध हेलन केलर और उनकी भावी पत्नी मेबेल हब्बार्ड भी उनकी छात्राएं थीं. मेबेल के साथ उनका 45 साल लम्बा सुखी वैवाहिक जीवन रहा. जीवन के अंतिम पड़ाव पर बीमारी की दशा में एक दिन अपने पति का हाथ थामकर मेबेल ने उनसे कहा – “मुझे छोड़कर मत जाओ”. बेल ने अपनी उँगलियों से ‘no’ बनाकर उन्हें इशारा किया. मेबेल ने उसी क्षण अंतिम सांस ली.
4 अगस्त 1922 को जब बेल की मृत्यु हुई तो उत्तरी अमेरिका के लाखों फोन बेल के सम्मान में एक मिनट के लिए बंद कर दिए गए.
विकलांगों की सेवा को बेल ने अपना ध्येय बना रखा था. वे पूरी ज़िन्दगी अपने रोगी भाई के लिए कृत्रिम फेफड़ा बनाने का प्रयास करते रहे.




