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Posts tagged ‘Thomas Alva Edison’

चित्रपहेली और अलेक्जेंडर ग्राहम बेल


पिछली पोस्ट में मैंने एक व्यक्ति का चित्र दिखाकर पाठकों से उसे पहचानने के लिए कहा था. कई लोगों ने सही-गलत उत्तर दिए और चित्र-पहेली को पसंद किया गया. ब्लौग के एक नियमित पाठक ने एक बेनामी कमेन्ट में मेरे ब्लौग की विषयवस्तु के साथ चित्र-पहेली के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाया. मैं उनसे शत-प्रतिशत सहमत हूँ और अब मैं इस धीर-गंभीर ब्लौग में चित्र-पहेली जैसे पाठकजोडू और कमेन्टप्राप्तू प्रयोग नहीं करूँगा. चित्र-पहेली के पीछे मेरा उद्देश्य हांलाकि यह था कि किसी प्रख्यात व्यक्ति के चित्र के बहाने उनसे जुडी जानकारी और संस्मरण आपको पढाए जाएँ.

हिंदीज़ेन वस्तुतः गंभीर ब्लौग है, तब भी जब इसपर पिछले कुछ दिनों से आप सभी मुल्ला नसरुद्दीन के किस्सों का रसास्वादन कर रहे हैं क्योंकि मैं उन्हें चुटकुलों के रूप में नहीं लेता. इस पोस्ट के बहाने मैं आप सभी से सुझाव आमंत्रित करता हूँ कि आप सब यहाँ क्या पढना पसंद करेंगे. मुझे एक मित्र ने पंचतंत्र और हितोपदेश/जातक कथाओं का समावेश करने का सुझाव दिया है. उनका सुझाव उत्तम है लेकिन यह सब तो इन्टरनेट पर अन्यत्र उपलब्ध है. मैं अनुवादक हूँ, इसलिए मेरा यह प्रयास रहता है कि ज्ञान-विज्ञान की उस सामग्री का समावेश ब्लौग में करूँ जो हिंदी के पाठकों को अप्राप्य है. इन्टरनेट पर हिंदी के ये शुरूआती दिन हैं और अभी तो हिंदी में करोडों वेबपेज बनेंगे. आप सभी कभी कोई ऐसी सामग्री अंग्रेजी में पढें जिसे हिंदीज़ेन पर प्रस्तुत किया जा सकता हो तो उसके बारे में मुझे कृपया अवश्य सूचित करें.

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अब थोडी चर्चा कल की चित्र-पहेली के बारे में. चूँकि मैं आपको उस व्यक्तित्व के बारे में और उनसे जुड़े संस्मरणों के बारे में बताने का वादा कर चूका हूँ तो अपने वचन की लाज तो रखनी ही पड़ेगी.

समीर लाल जी, वैभव दीक्षित, गब्बर सिंह और दिनेशराय द्विवेदी जी ने क्रमशः पहेली में दिए गए व्यक्ति को ठीक पहचाना. वे हैं अलेक्जेंडर ग्राहम बेल. उन्होंने 1876 में टेलीफोन का आविष्कार किया था. उनसे पहले भी इस यंत्र की खोज करने के कई असफल प्रयास अन्य वैज्ञानिक कर चुके थे लेकिन सफलता बेल को मिली. बेल बचपन से ही कुशाग्र थे और छोटी उम्र में ही सरल यंत्रों को अपने-आप बनाने लगे थे. अपने युग के अन्य बहुत सारे वैज्ञानिकों के विपरीत उन्हें बहुत अच्छी शिक्षा और आर्थिक पृष्ठभूमि मिली हुई थी. उन्होंने मूक-बधिरों के लिए बहुत काम किया और विमानों के विकास में भी बहुत योगदान दिया.

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“वॉट्सन, यहाँ आओ, मुझे तुम्हारी ज़रुरत है” – ये शब्द विश्व में किसी ने पहली बार टेलीफोन पर कहे थे. उस दिन 10 मार्च  1876 को बेल अपने कमरे में और उनका सहायक वॉट्सन बिल्डिंग के ऊपरी तल पर अपने कमरे में यंत्रों पर काम कर रहे थे. बहुत दिनों से लगातार यंत्रों को जोड़ने पर भी उन्हें ध्वनि के संचारण में सहायता नहीं मिल रही थी.

1876_Bell_Speaking_into_Telephoneउस दिन पता नहीं तारों का कैसा संयोग बन गया. वे दोनों इससे अनभिज्ञ थे. काम करते-करते बेल की पैंट पर अम्ल गिर गया और उन्होंने वॉट्सन को मदद के लिए पुकारा. वॉट्सन ने उनकी आवाज़ को अपने पास रखे यंत्र से आते हुए सुना और… बाकी तो इतिहास है.

1915 में अंतरमहाद्वीपीय टेलीफोन लाइन बिछ गई और उसके उदघाटन के लिए बेल को बुलाया गया. बेल पूर्वी तट पर थे और उन्हें कहा गया कि वे कुछ कहकर लाइन का औपचारिक उदघाटन करें. दूसरे छोर पर वॉट्सन थे. जानते हैं बेल ने फोन पर क्या कहा!? “वॉट्सन, यहाँ आओ, मुझे तुम्हारी ज़रुरत है”. वॉट्सन का जवाब था – “सर, मैं आपसे 3000 किलोमीटर दूर हूँ और मुझे वहां आने में कई दिन लग जायेंगे!”

और “हैलो” शब्द किसने गढा? थॉमस एडिसन ने. बेल चाहते थे कि फोन उठाने या सुनने वाला व्यक्ति “अहोय” कहे लेकिन थॉमस एडिसन का “हैलो” लोगों की जुबां पर चढ़ गया.

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इतनी महान खोज करने के बाद भी सालों तक बेल अपनी खोज का महत्त्व नहीं समझ पाए. उनके अनुसार टेलीफोन आम आदमी के उपयोग की वस्तु कभी नहीं बन सकता था.

नेशनल जिओग्राफिक सोसायटी के संस्थापक और अपने भावी ससुर गार्डिनर ग्रीन हब्बार्ड को जब बेल ने अपना टेलीफोन यंत्र दिखाया तो हब्बार्ड ने उनसे कोई उपयोगी वस्तु बनाने के लिए कहा क्योंकि हब्बार्ड के अनुसार “ऐसे खिलौने में लोग भला क्यों रुचि लेंगे?”

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1919 में 72 साल की उम्र में बेल ने पानी पर चलने वाला एक यान हाइड्रोफोइल बनाया जिसने उस समय पानी पर रफ़्तार का विश्व रिकॉर्ड बनाया.

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बोस्टन विश्वविद्यालय में बेल बधिर लोगों को पढ़ाने का काम करते थे. सुप्रसिद्ध हेलन केलर और उनकी भावी पत्नी मेबेल हब्बार्ड भी उनकी छात्राएं थीं. मेबेल के साथ उनका 45 साल लम्बा सुखी वैवाहिक जीवन रहा. जीवन के अंतिम पड़ाव पर बीमारी की दशा में एक दिन अपने पति का हाथ थामकर मेबेल ने उनसे कहा – “मुझे छोड़कर मत जाओ”. बेल ने अपनी उँगलियों से ‘no’ बनाकर उन्हें इशारा किया. मेबेल ने उसी क्षण अंतिम सांस ली.

4 अगस्त 1922 को जब बेल की मृत्यु हुई तो उत्तरी अमेरिका के लाखों फोन बेल के सम्मान में एक मिनट के लिए बंद कर दिए गए.

विकलांगों की सेवा को बेल ने अपना ध्येय बना रखा था. वे पूरी ज़िन्दगी अपने रोगी भाई के लिए कृत्रिम फेफड़ा बनाने का प्रयास करते रहे.

एडिसन का दृष्टिकोण


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थॉमस अल्वा एडिसन के जन्मस्थान ग्रीनफील्ड गाँव में लगी उनकी मूर्ति

अमेरिका के प्रान्त न्यू जर्सी के कस्बे वेस्ट औरेंज की एक सर्द रात थॉमस एडिसन की फैक्ट्री में रोज़ की तरह कामकाज का शोर हो रहा था. ऐसी अनेक योजनाओं पर काम चल रहा था जो एडिसन ने अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए प्रारंभ की थीं. ऐसा कहा जाता था कि लोहे और कंक्रीट से बनी एडिसन की फैक्ट्री फायरप्रूफ थी, लेकिन आग की ताकत का अनुमान लगाना मुश्किल है.

1914 की उस जमा देने वाली सर्द रात कस्बे का आसमान फैक्ट्री से उठती आग की लपटों से दीप्तिमान हो उठा. एडिसन के 24 वर्षीय पुत्र चार्ल्स ने अपने पिता को बड़ी मुश्किल से ढूँढा. वे जब मिले, एडिसन आग में जलती हुई फैक्ट्री का नज़ारा देख रहे थे. उनके सफ़ेद हो चुके बाल सर्द हवा में हिल रहे थे और आग की भभक उनके अविचल चेहरे को चमका रही थी.

“मेरे ह्रदय में उनके लिए अतीव दर्द उमड़ आया” – बाद में चार्ल्स ने सबको बताया – “चट्टान की तरह मज़बूत वह 67 वर्षीय वृद्ध बड़ी महनत से बनी अपनी फैक्ट्री को ख़ाक होते देख रहा था. उन्होंने जब मुझे देखा तो वो चिल्लाकर मुझसे बोले – ‘चार्ल्स! तुम्हारी माँ कहाँ है?’ “जब मैंने उन्हें बताया – “मैं नहीं जानता”, वे बोले ‘उसे ढूंढो और यहाँ ले आओ! ऐसा दृश्य शायद उसे फिर कभी देखने को नहीं मिलेगा’.

अगले दिन एडिसन ने अपनी फैक्ट्री के अवशेषों को देखा और आग से हुए नुक्सान के बारे में यह कहा – “त्रासदी में भी कोई भलाई निहित होती है. हमारी सारी गलतियाँ आग की भेंट चढ़ गई हैं. भगवान् का शुक्र है, अब हम नए सिरे से सब कुछ शुरू कर सकते हैं”.

उस त्रासदी को देखने का एडिसन का नजरिया अद्भुत है. व्यापार में घाटा, तलाक, सपनों का चूर-चूर हो जाना… ये सारी घटनाएँ किसी आदमी को कितना तोड़ सकती हैं यह जीवन के प्रति उसके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है. जो भी बुरा हुआ उसके कारणों की खोज करो और उनसे सबक लेते हुए नए सिरे से शुरुआत करो. फिर से शुरू करो.

चित्र साभार – फ्लिकर

"मैं यह कर दिखाऊँगा!"


डेविड की यह मूर्ती माइकलेन्जेलो ने ईसवी सन् 1501 से 1504 के बीच बनाई थी

डेविड की यह मूर्ती माइकलेन्जेलो ने ईसवी सन् 1501 से 1504 के बीच बनाई थी

इतिहास ऐसे महान विशेषज्ञों से भी भरा हुआ है जिन्हें इस बात पर पूर्ण विश्वास था कि दूसरे व्यक्तियों के विचार, योजनायें, और उद्देश्य कभी भी साकार रूप नहीं ले सकते, लेकिन सफलता उन्होंने ही पाई जिन्होंने अपने मन में सदैव यह कहा – “मैं यह कर दिखाऊँगा।”
इटालियन शिल्पकार अगोस्टिनो डी’एंटोनियो ने संगमरमर के बड़े से खंड पर काम करना शुरू किया लेकिन वह अपनी रचना को मूर्त रूप न दे सका। उसने यह निष्कर्ष निकाला – संगमरमर के शिल्प नहीं बन सकते। दूसरे शिल्पकारों ने भी ऐसे ही प्रयास किए लेकिन वे भी थक-हार कर बैठ गए। माइकलएंजेलो ने संगमरमर के पत्थर में अपार संभावनाएं तलाश लीं और ऐसे बेजोड़ शिल्प बनाये जो ५०० साल बाद भी विस्मित कर देते हैं। उसकी बनाई गई डेविड की मूर्ती अपनी निपट नग्नता में भी चमत्कृत करती है। माइकलएंजेलो ने जब संगमरमर की कुख्याति के बारे में सुना तो उसने स्वयं से यही कहा – “मैं यह कर सकता हूँ, मैं यह कर दिखाऊँगा।”
स्पेन के जानकारों ने कहा कि कोलंबस का भारत को ढूँढने का नया और छोटा रास्ता सम्भव ही नहीं है। स्पेन के राजा और रानी ने विशेषज्ञों की बातों को अनसुना कर दिया क्योंकि कोलंबस ने अपार आत्मविश्वास से कहा था – “मैं यह कर सकता हूँ”। और उसने कर दिखाया। यह बात और है कि वह अमेरिका खोज बैठा।

यहां तक कि थॉमस अल्वा एडिसन ने अपने मित्र हेनरी फोर्ड को मोटरकार बनाने का विचार त्यागने के लिए कहा था क्योंकि उनके अनुसार कार का कोई भविष्य नहीं था। एडिसन ने तो फोर्ड को अपने साथ काम करने के लिए भी कहा। लेकिन फोर्ड अपनी धुन के पक्के थे और अपने कार के सपने को पूरा करने में लगे रहे। उनकी बनाई पहली कार में रिवर्स गियर नहीं था क्योंकि उन्हें इसका ख्याल ही नहीं था लेकिन यह गलती पता चलते ही उन्होंने कारों में ताबड़तोड़ बेहतर परिवर्तन कर डाले। उन्होंने आधुनिक परिवहन का नक्शा ही बदल डाला। कारों की सफलता ने अन्य वाहनों के अविष्कार का मार्ग प्रशस्त किया।

“भूल जाओ” – मैडम क्यूरी को बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने सलाह दी। उनके अनुसार रेडियम जैसा तत्व हो ही नहीं सकता था। लेकिन मैडम क्यूरी ने उनसे कहा – “मुझे खुद पर भरोसा है”।

और ऑरविल तथा विल्बर राइट बंधुओं को कौन भूल सकता है! उनके दोस्तों, पत्रकारों, रक्षा विशेषज्ञों, यहाँ तक कि उनके पिता ने भी उड़ने वाले विमान बनाने के विचार का मजाक उड़ाया। “ये विमान नहीं बल्कि पैसा उड़ाने का मूर्खतापूर्ण विचार है! उड़ना सिर्फ़ पक्षियों के लिए छोड़ दो!” – “माफ़ करें” – राइट बंधुओं ने कहा। ‘’ये हमारा सपना है और हम इसे हकीकत में बदल देंगे”। परिणामस्वरूप, उत्तरी कैलिफोर्निया में किट्टी हॉक नामक एक छोटे से समुद्रतट पर कुछ सेकेंडों के लिए उनका विमान सिर्फ़ बारह मीटर ऊपर उड़ा और मानव की उड़ान ने फिर थमने का नाम न लिया।

अंत में, यदि ऊपर दिये गये प्रसंगों ने आपके मन में उत्साह की विद्युत प्रवाहित की हो तो ज़रा बेंजामिन फ्रेंकलिन के कष्टों के बारे में सोचें। उन्हें आसमान की बिजली के साथ अपने दुस्साहसी प्रयोग को न करने के लिए चेतावनी दी गई थी। लोगों ने कहा – “कितने समय और साधनों की बरबादी है!” लेकिन फ्रेंकलिन का प्रयोग सफल रहा। वाकई, आसमानी बिजली को अपनी उंगलियों पर महसूस करने के प्रयोग में जान भी जा सकती थी लेकिन फ्रेंकलिन की बात तो सच साबित हो गई।

अब आप क्या करेंगे? थक-हार कर बैठ जायेंगे या खुद से कहेंगे – “मैं कर सकता हूँ, मैं कर दिखाऊँगा”।

यह है जीनियस


थॉमस अल्वा एडिसन (1847-1931) महानतम अमेरिकी आविष्कारक हैं। किशोरावस्था में एक दुर्घटना का शिकार होने के कारण वे अपनी श्रवण शक्ति लगभग खो चुके थे – लेकिन उन्होंने फोनोग्राम का आविष्कार किया – जिसे हम रिकार्ड प्लेयर के नाम से बेहतर जानते हैं। ऑडियो कैसेट कुछ सालों तक चले, सीडी और डीवीडी भी ज्यादा समय नहीं चलेंगे, उनसे भी बेहतर चीज़ें आएँगी, लेकिन रिकार्ड प्लेयर सौ सालों से भी ज्यादा समय तक हमें संगीत सुनाता रहा। भोपाल में मेरे घर में हमारे पास छोटे-बड़े मिलाकर लगभग ३०० रिकार्ड्स हैं, लेकिन प्लेयर ठीक नहीं चलता

और बिजली का बल्ब? क्या आप सोच सकते हैं कि मामूली सा प्रतीत होने वाले बल्ब की खोज ने एडिसन को कितना तपाया!? उसके जलनेवाले फिलामेंट के लिए उपयुक्त पदार्थ की खोज में एडिसन ने हज़ार से भी ज्यादा वस्तुओं पर प्रयोग कर डाले – घास के तिनके से लेकर सूअर के बाल तक पर। किसी ने एडिसन से कहा – “हज़ार चीज़ों का प्रयोग करने के बाद भी आप अच्छा फिलामेंट नहीं बना पाये।” एडिसन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया – “ऐसा नहीं है, मुझे ऐसी हज़ार चीज़ों के बारे में पता है जो फिलामेंट बनाने के लिए उपयुक्त नहीं हैं”।

मेरे दादा का जन्म सन १८९९ में हुआ थावे मुझे बताते थे कि जब बिजली के बल्ब नए-नए आए थे तब बड़े-बड़े पहलवान यह दावा किया करते थे कि वे उन्हें फूंक मारकर बुझा सकते हैं

और याद आया, सिनेमा कैमरे का आविष्कार भी एडिसन ने ही किया था। जब लोगों ने पहली बार सिनेमाघर में रेलगाड़ी को परदे पर आते देखा तो वे जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए।

एडिसन ने अपने अविष्कारों के लिए एक हज़ार से भी ज्यादा पेटेंट प्राप्त किए। उनकी मृत्यु से कुछ समय पहले एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि कौन सी बात किसी व्यक्ति को जीनियस बनाती है। एडिसन ने कहा – “Genius is one percent inspiration – and ninety-nine percent perspiration.” (कोई भी व्यक्ति १% प्रेरणा और ९९% परिश्रम से जीनियस बनता है)। यह विश्व में सबसे प्रसिद्द उक्तियों में से एक है।

एडिसन ने अपनी प्रयोगशाला में प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के एक स्नातक को काम पर रखा। उसका नाम उप्टन था। उप्टन ने जर्मनी में महान वैज्ञानिक हेल्म्होल्त्ज़ के साथ भी काम किया था। एक दिन एडिसन ने उप्टन से कहा कि वह पता लगाये कि कांच के एक बल्ब के भीतर कितनी जगह है। उप्टन अपने औजार ले आया और उनकी मदद से नाप लेकर वह एक ग्राफ पेपर पर चार्ट बनाकर बड़ी कुशलतापूर्वक बल्ब के भीतर की जगह की गणना करने लगा। कुछ देर यह सब देखने पर एडिसन ने उप्टन से कुछ पूछना चाहा लेकिन उप्टन ज़ोर से बोला – “मुझे थोड़ा समय और लगेगा” – और उसने एडिसन को अपना चार्ट दिखाया। एडिसन उसके पास आए और बोले – “मैं तुम्हें दिखाता हूँ कि मैं यह कैसे करता हूँ” – यह कहकर उन्होंने बल्ब में पानी भरकर उप्टन से कहा – “इस पानी को नाप लेने पर तुम्हें उत्तर मिल जाएगा”।

(एडिसन का चित्र विकिपीडिया से लिया गया है)

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