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मृत्यु से माया तक


एक युवा दंपत्ति अपने दो वर्षीय पुत्र के साथ रेगिस्तान में भटक गए और उनका भोजन समाप्त हो गया. उनका शिशु काल कवलित हो गया. अपना जीवन बचाने की चेष्टा में पति-पत्नी ने अपने मृत शिशु का मांस खाना ही ठीक समझा. उन्होंने यह हिसाब लगाया कि वे उसके छोटे-छोटे अंश खायेंगे और बचे हुए हिस्से को कंधे पर टांगकर सुखा लेंगे ताकि आगे की यात्रा में वह उनके काम आये. लेकिन मांस का हर टुकड़ा खाते समय उनके ह्रदय में अपार वेदना उपजती और वे घोर विलाप करते.

यह कथा सुनाने के बाद बुद्ध ने अपने शिष्यों से पूछा, “क्या उस दंपत्ति को अपने ही शिशु का भक्षण करने में सुख प्राप्त हुआ होगा?”

शिष्य ने कहा, “नहीं तथागत, यह संभव ही नहीं है कि उन्हें अपने ही शिशु के मांस के सेवन से कोई सुख मिला हो.”

बुद्ध बोले, “हाँ. फिर भी ऐसे असंख्य जन हैं जो अपने माता-पिता और संतति का भक्षण कर रहे हैं पर उन्हें इसका कोई बोध नहीं है”.

यह कथा भिक्षु तिक न्यात हन्ह ने एक प्रवचन में कही है.

ऐसी ही अप्रिय भावजनक कथा ‘संसार की विडम्बना’ मित्र राहुल सिंह ने कुछ दिन पहले पोस्ट की थी. यदि आपने वह पढ़ ली है तो आप आगे लिखी बात बेहतर समझ पायेंगे.

उपरोक्त बौद्ध कथाओं में तीन बातें उभरती हैं:

पहली यह कि आप किसी भी धार्मिक या दार्शनिक विचारधारा को मानें, यह प्रतीत होता है कि दुनिया में हर चीज़ किसी दूसरी चीज़ से किन्हीं रूप में सम्बद्ध है. जो कभी कुत्ता था वह आज भाई है, और जो आज पिता है वह आगे जाकर कुत्ते के रूप में उत्पन्न हो सकता है. पुनर्जन्म को दृढतापूर्वक माननेवाले पाठक इस स्थापना पर आपत्ति नहीं रखेंगे. जो पाठक पुनर्जन्म की संकल्पना से सहमत नहीं हैं, क्या वे इस सम्बद्धता को किसी अन्य स्तर पर निदर्शित कर सकते हैं? क्या इसे क्वांटम लेवल पर समझा जा सकता है जिसके अनुसार सृष्टि में उपस्थित हर कण पर अनंत बल कार्यशील हैं तथा उसके अनंत प्रयोजन हैं जो उसके भविष्य को निर्धारित करते हैं.

दूसरी बात यह कि पृथ्वी पर मौजूद सारा पदार्थ, जिसमें जीव और निर्जीव सभी वस्तुएं शामिल हैं, वे सभी सौ से भी अधिक ज्ञात रासायनिक तत्वों से मिलकर बने हैं. हाइड्रोजन, कार्बन, ऑक्सीजन, अन्य गैसें, धातुएं, व अधातु तत्व आदि. ये सभी तत्व अरबों वर्षों से रिसायकल होते रहे हैं. जो जल आप पी रहे हैं वह अरबों वर्ष पुराना है. जो फल आप पेड़ से तोड़कर खा रहे हैं वह ताज़ा है पर उन तत्वों से बना है जिनकी उत्पत्ति बिग बैंग के बाद तेरह अरब वर्ष पूर्व हुई थी. समस्त जीवित प्राणी मृत्यु के बाद मिट्टी में या वायुमंडल में मिल जाते हैं. या तो उन्हें कृमि खा लेते हैं या वे वृक्षों द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं. कृमि मेढकों का शिकार बनते हैं, मेढकों को सरीसृप उदरस्थ कर लेते हैं, इसी तरह चक्र चलता रहता है. मिट्टी में उगनेवाले पौधे मृत प्राणियों और जंतुओं से पोषक तत्व खींचकर हमारे लिए खाद्य सामग्री बनाते हैं. इसकी पूर्ण संभावना है कि जो कुछ भी हम खा रहे हैं वह कभी-न-कभी किसी जीवित प्राणी (पशु या पौधे) का ही अंश था. पाठक इसे मांसाहार के लिए उचित तर्क के रूप में नहीं लें.

तीसरी बात यह कि ब्रह्माण्ड की समस्त वस्तुएं पहली और दूसरी बात से भी अधिक अमूर्त स्तर पर एक दूसरे से सम्बद्ध हैं. इसे माया की परिकल्पना से समझा जा सकता है, जिसके अनुसार यह विश्व केवल एक भ्रम है. माया के परदे के हटते ही ‘पुत्र’ और ‘मांस’ जैसे टैग बेमानी हो जाते हैं क्योंकि माया के रहते हम एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ से पृथक नहीं देख पाते यहाँ तक कि किसी स्तर पर उनकी एकरूपता के बारे में सोचते भी नहीं हैं.

सुधी ब्लौगर श्री हंसराज सुज्ञ इस कथा को पब्लिश होने से पहले पढ़ चुके हैं. उनके अनुसार यह कथा का उद्देश्य हमारे भीतर जगुप्सा उत्पन्न करना है. यह मोह के प्रति जगुप्सा दर्शाती है क्योंकि सभी संबंध अनित्य है.  पुद्गल या पदार्थ या कण ही शाश्वत हैं. वे नष्ट नहीं होते, केवल अपना रूप बदलते रहते हैं. जिस प्रकार उर्जा के बारे में कहा जाता है कि यह कभी नष्ट नहीं होती, मात्र अपना स्वरूप बदलती है. हमारे शरीर के कण कभी किसी पेड़ या पक्षी के शरीर के अंश भी हो सकते है. उपयोगिता यह है कि बोध कथा अपने सटीक सार चिंतन पर पहुँचा भर दे. उपरोक्त बौद्ध कथा में तीन  जो बातें उभरती हैं, जिसका आपने उल्लेख किया है, वे सत्य हैं. मोह, माया, राग वश हम स्वीकार करें या नहीं पर यह सत्य है कि:

1 – रिश्ते नाते अनित्य हैं.

2 – पुद्गल (कण) शाश्वत हैं और पर्याय बदलते हैं.

3 – जगत नश्वर है, आत्मतत्व अमर है. प्रिय-अप्रिय सभी मानसिक सोच का विषय मात्र है.

“यह सत्य है कि सभी प्रकार के आहार पुद्गल, किसी न किसी  जीव के ग्रहण किए या छोड़े हुए ही तो हैं.  इस सत्य को जानते हुए भी मनीषि मांसाहार को भयंकरतम अपराध बताते हैं. वैसे भी मांसाहार दूषण के वास्तविक कारकों से अनभिज्ञ अज्ञानी इसे तर्क बनाकर प्रस्तुत करते ही है, इसमें कोई नई बात नहीं है. किन्तु  क्रूरताजन्य और अशान्ति कारकों से, पंचेन्द्रीय प्राणी के प्राण वियोग की भयंकर पीड़ा से मांसाहार दूषण है. और मृत का आहार अंततः हिंसा को प्रोत्साहित करता है इसीलिए निषेध उचित है. गहनता से चिंतन करेंगे तो यह साफ हो जाएगा कि जगत में सारी अशान्ति का कारण मांसाहार ही है.” ~ श्री हंसराज सुज्ञ.

इस पोस्ट पर पाठकों के विचार आमंत्रित हैं. इस कथा को पोस्ट करने से पहले मैंने मित्र राहुल सिंह से विमर्श किया था जिनके सुझाव को मानकर कथा की व्याख्या में कुछ संशोधन किये गए. पाठकों की प्रतिक्रिया का अनुमान इस प्रकार से लगाया जा रहा है:

पहला पाठक : यह कथा केवल मत विशेष के दृष्टिकोण को ही प्रचारित/व्याख्यायित कर रही है.

दूसरा पाठक: सही कहा. मैं पूर्णतः/आंशिक सहमत हूँ.

तीसरा पाठक: औचित्यहीन अविवेकी कथा, जो केवल रुग्ण/अन्धविश्वासी मष्तिष्क का प्रपंच/प्रलाप है.

चौथा पाठक: बकवास! सुबह-सुबह क्या पढ़वाते हो! I unsubscribe!

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How To Treat Anger – क्रोधोपचार


ब्लौगर बंधु अनुराग शर्मा जी ने हाल ही में बहुत मनोयोग से क्रोध के ऊपर कुछ पोस्ट लिखीं हैं जिन्हें आप उनके ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं. उनकी एक पोस्ट पर मैंने कमेन्ट करके यह इच्छा की थी कि वे क्रोध के उपचार पर भी कुछ लिखें. उन्होंने मुझे इस विषय पर लिखने के लिए प्रेरित किया. हिंदीज़ेन की परंपरा के अनुरूप कुछ विचार क्रोध विषयक सूक्तियों से लिए गए हैं जिनका मैंने केवल विस्तार ही किया है.

हमारे भीतर क्रोध तब उपजता है जब हम स्वयं से तथा क्रोध उपजानेवाले दीर्घकालिक और तात्कालिक कारणों से अनभिज्ञ होते हैं. इस अनभिज्ञता के कारण ही क्रोध जैसे अप्रिय मनोभाव का उदय होता है. लालसा, अभिमान, उत्तेजना, ईर्ष्या और संदेह भी क्रोध का मूल हैं. चूंकि क्रोध हमारे भीतर ही जन्म लेता है इसलिए हम ही इसके प्राथमिक कारक हैं. अन्य व्यक्ति तथा परिवेश आदि सदैव गौण होते हैं. प्रकृति के प्रलयंकारी विप्लव यथा भूकंप अथवा बाढ़ आदि द्वारा घटित विनाश एवं हानि का आकलन करना हमारे लिए कठिन नहीं है और उन्हें हम किंचित सहनशीलता से स्वीकार भी कर लेते हैं, लेकिन जब कोई व्यक्ति हमें क्षति पहुंचाता है तो हमारा धैर्य चुक जाता है. हमें इस पर विचार करना चाहिए कि जिस प्रकार भूकंप अथवा बाढ़ आदि के सुनिश्चित कारण होते हैं, उसी प्रकार हमारे भीतर क्रोध भड़कानेवाले व्यक्ति के भीतर भी हमें क्रुद्ध करने के लिए दीर्घकालिक एवं तात्कालिक कारण मौजूद हैं उपस्थित होते हैं. ठीक वही कारक हमारे भीतर भी अवस्थित हो सकते हैं.

उदाहरण के लिए, यह संभव है कि हमसे दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति के साथ एक दिन पहले किसी ने बुरा बर्ताव किया हो या उसके पिता ने उसपर बचपन में क्रूरता बरती हो. ये घटनाएं उसके भीतर क्रोध उपजाने वाले तात्कालिक या सुषुप्त कारक हो सकतीं हैं. यदि हम इन कारणों या कारकों को अंतर्दृष्टि के साथ और बोधपूर्वक समझने लगेंगे तो क्रोध से मुक्ति सहज हो जायेगी. इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे ऊपर घातक प्रहार करने वाले व्यक्ति को यूं ही जाने दिया जाए, उसे अनुशासित करना अति आवश्यक है. लेकिन इसके पहले यह ज़रूरी है कि हम अपने भीतर से नकारात्मकता को बाहर निकाल फेंकें. किसी व्यक्ति की सहायता करने अथवा उसे सही मार्ग पर लाने के लिए हमारे भीतर करुणा होनी चाहिए. जब तक हम अन्य व्यक्तियों के दुःख की समानुभूति नहीं करेंगे तब तक हम इस योग्य नहीं बन सकते कि उसे दुःख और भ्रान्ति के दलदल से बाहर निकाल सकें. क्रोध के उपचार के लिए इन बिन्दुओं पर भी मनन करना उपयोगी होगा:

किसी कष्टदायक परिस्थिति का सामना करने पर हमारे भीतर प्रतिरोध की भावना जन्म लेती है और हमारा क्रोध बढ़ने लगता है. हमारे क्रोध की अभिव्यक्ति सामनेवाले व्यक्ति के भीतर खलबली मचाती है और वह अपनी पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए फिर कुछ ऐसा कहता या करता है जिससे हमारा क्रोध उग्र हो जाता है. यह एक चक्र की भांति है. इसलिए यह कहा जाता है कि ऐसी दशा में उस परिस्थिति से बाहर निकाल जाना ही सबसे उचित उपाय है, लेकिन ऐसे भी कुछ अवसर हो सकते हैं जब यह उपाय कारगर न हो. यह और कुछ नहीं बल्कि पलायन ही है.

हमारे अंगों की भांति ही क्रोध भी हमारी काया का ही एक भाग है. अंतस में क्रोध उपजने पर हम हम इससे यह नहीं कह सकते “दूर चले जाओ, क्रोध! मैं तुम्हें नहीं चाहता!” जब हमारे पेट में दर्द होता है तब हम यह नहीं कहते कि “दूर हट जाओ, पेट! मत दुखो!” इसके उलट हम उसका उपचार करते हैं. ऐसा ही हमें क्रोध के साथ भी करना होता है. क्रोध और घृणा की उपस्थिति प्रेम और स्वीकरण के अभाव की द्योतक नहीं होती. प्रेम सदैव भीतर रहता है. उसकी खोज करनी पड़ती है.

क्रोध उपजने की दशा में कुछ संभलें और अपने ग्रहणबोध का अवलोकन करें. यह कुछ कठिन है पर साधने पर सध जाता है. हम सभी बहुधा ही अनुभूतियों के संग्रहण में तत्परता दिखाते हैं और अनुचित भावनाओं को प्रश्रय देते हैं जबकि हमारे भीतर करुणा और शांति का इतना विराट संचय होना चाहिए कि हम अपने विरोधियों से भी प्रेम कर सकें.

जब आपको किसी व्यक्ति पर क्रोध आये तो यह नहीं दर्शायें कि आप क्रुद्ध नहीं हैं. यह भी नहीं दिखाएँ कि आपको बिलकुल पीड़ा नहीं हुई है. यदि सामनेवाला व्यक्ति आपका प्रिय है तो आपको उसे यह जताना चाहिए कि आपको उसके वचनों या कर्मों से दुःख पहुंचा है. उसे यह प्रेमपूर्वक बताएं.

प्रारंभ में आप यह समझ नहीं पायेंगे कि आपके भीतर क्रोध कैसे उपजता है और यह भरसक प्रयत्न करने के बाद भी क्यों नहीं गलता. यदि आप अपने मनोभावों के प्रति जागरूक बनें और क्षण-प्रतिक्षण सजग एवं सचेत रहने का अभ्यास करेंगे तो आप क्रोध की प्रकृति को पहचान जायेंगे और इससे छुटकारा पाना सरल हो जाएगा.

किसी भी व्यक्ति में क्रुद्ध होने के संस्कार अल्पवय में पड़ते हैं. इसका संबंध दिन-प्रतिदिन घटनेवाली घटनाओं से है. यदि आप भेदभाव किये बिना स्वयं की देखभाल करेंगे और मन में नकारात्मकता को हावी नहीं होने देंगे तो आपकी सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होगी. गीता में कहा गया है कि “भुने बीजों में कामना का अंकुर नहीं फूट सकता”, इस बात को मैं क्रोध पर भी लागू करता हूँ.

क्रोध और हताशा का प्रवाह बहुधा बहा ले जाता है फिर भी मानव मन के किन्हीं कोटरों में प्रेम और क्षमा बची रह जातीं हैं. क्रोध प्रत्येक प्राणी को आता है पर मनुष्यों में यह योग्यता है कि वे दूसरे व्यक्ति से सार्थक संवाद स्थापित कर सकते हैं. हम मनुष्य क्षमाशील हैं. हम करूणावश अपना सर्वस्व भी न्यौछावर करने की शक्ति व संकल्प रखते हैं. हम केवल क्रोध एवं दुःख का समुच्चय नहीं हैं. अपने क्रोध का अवसान करने शांति प्राप्त कर सकते हैं. केवल क्रोध को दूर करने के प्रयोजन के लिए ही नहीं बल्कि स्वयं के भीतर उतरकर देखने के अभ्यास के फलस्वरूप हम अन्य मनोविकारों से भी छुटकारा पा सकते हैं. हम क्रोध के बीज को अंकुरण की प्रतीक्षा करते भी देख सकते हैं. वास्तविकता का भान होने पर हम यह जान जाते हैं कि क्रोध का मूल कारण हमारे भीतर ही निहित होता है और वह व्यक्ति केवल निमित्त मात्र ही है जिसपर क्रोध किया जा रहा है. वह हमारे क्रोध का पात्र नहीं है. क्रोध हमारे भीतर है अतः हम ही उसका पात्र हैं.

यदि आपके घर में आग लग जाए तो आप सबसे पहले क्या करेंगे? आप आग बुझाने का जतन करेंगे या आग लगानेवाले व्यक्ति-वस्तु की खोज करेंगे? उस घड़ी में यदि आप आग लगने के कारणों का अनुसंधान करने लगेंगे तो आपका घर जलकर ख़ाक हो जाएगा. ऐसे में सर्वप्रथम आग बुझाना ही श्रेयस्कर है. अतः क्रोध की अवस्था में आपका अन्य व्यक्ति से वाद-विवाद जारी रखना उचित नहीं होता.

क्रोध आने की दशा में पानी पी लेना, सौ तक की गिनती गिनना, मुस्कुराना, या उस स्थान से दूर हट जाना समस्या का समाधान नहीं है. यह एक प्रकार का दमन ही है इसलिए मैं ऐसे उपायों का समर्थन नहीं करता. क्रोध एक आतंरिक समस्या है और इसका कोई बाहरी समाधान नहीं है.

तिक न्यात हंह की एक पुस्तक से एक कथा उद्घृत करना चाहूँगा:

एक धर्मावलम्बी महिला अमिताभ बुद्ध की नियमित आराधना करती थी. दिन में तीन बार घंटी बजाकर “नमो अमिताभ बुद्ध” मन्त्र का एक घंटा जप करना उसकी दिनचर्या में शामिल था. मन्त्र का एक हज़ार जप करने पर वह पुनः घंटी बजाती. यह आराधना करते उसे दस वर्ष हो रहे थे पर उसके व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन नहीं आया. उसके भीतर क्रोध और अहंकार भरपूर था और वह लोगों पर चिल्लाती रहती थी.

उस महिला का मित्र उसे सबक सिखाना चाहता था. एक दिन महिला जब अगरबत्तियां जलाकर और तीन बार घंटी बजाकर “नमो अमिताभ बुद्ध” मन्त्र का जप करने के लिए तैयार हुई तब उसके मित्र ने दरवाज़े पर आकर कहा, “श्रीमती नगुयेन, श्रीमती नगुयेन!”. यह सुनकर महिला को बहुत गुस्सा आया क्योंकि वह जप करनेवाली ही थी. वह मित्र दरवाजे पर खड़ा रहा और उसका नाम पुकारता रहा. महिला ने सोचा, “मुझे अपने क्रोध पर विजय पानी है, मैं उसके पुकारने पर ध्यान ही नहीं दूंगी. वह “नमो अमिताभ बुद्ध” का जप करने लगी.

वह व्यक्ति दरवाजे पर खड़ा था और बार-बार उसे पुकार रहा था, दूसरी ओर महिला का क्रोध बढ़ता जा रहा था. वह क्रोध से लड़ रही थी. उसके मन में आया, “क्या मुझे जप रोककर उठ जाना चाहिए?” लेकिन उसने जप करना जारी रखा. भीतर क्रोध की आग धधकती जा रही थी और बाहर जप चल रहा था, “नमो अमिताभ बुद्ध”. उसका मित्र उसकी दशा भांप रहा था इसलिए वह दरवाज़े पर खड़ा पुकारता रहा, “श्रीमती नगुयेन, श्रीमती नगुयेन!”

महिला और अधिक बर्दाश्त नहीं कर सकी. उसने अपने घंटी और आसनी फेंक दी, भड़ाम से दरवाजा खोला और मित्र से चीखती हुई बोली, “तुम ऐसा क्यों कर रहे थे!? बार-बार मेरा नाम लेने की क्या ज़रुरत थी!?

उसका मित्र मुस्कुराता हुआ बोला, “मैंने सिर्फ दस मिनट ही तुम्हारा नाम लिया और तुम इतना क्रोधित हो गयीं! ज़रा सोचो, दस साल से तुम बुद्ध का नाम ले रही हो, वे कितना क्रोधित हो गए होंगे!?”

“Anger is like a howling baby, suffering and crying. Your anger is your baby. The baby needs his mother to embrace him. You are the mother. Embrace your baby.” ~ Thich Nhat Hanh.

A woman called Nuyen used to recite Buddha’s name daily. Although she was reciting Buddha’s name for over 10 years, she was still quite mean, aggressive and used to often shout at people all the time. She usually used to starts her practice by lighting incense and hitting a little bell.

Once her friend wanted to teach her a lesson, so as she began her chanting and prayer, the friend came to her door and called out, “Miss Nuyen, Miss Nuyen!”.

As this was the time for her prayers and chanting the woman got annoyed, but she said to herself, “I have to struggle against my anger, so I will just ignore it.”

She continued reciting Buddha’s name. The man also continued to call her name, as she became more and more oppressive. But the woman kept struggling against her anger and wondered whether she should stop the recitation to give the man a piece of her mind, but she continued reciting.

The man outside also continued shouting her name, “Miss Nuyen, Miss Nuyen, Miss Nuyen….”

The woman could not stand it anymore, so she stopped her chanting of Buddha’s name, jumped to her feet, slammed the door and went to the gate and shouted at the man, “Why do you have to behave like this? I am doing my recitation and you are shouting my name over and over!”

The gentleman smiled at her and said, “I called your name just for five minutes and you are so angry. But you have been calling Buddha’s name for more than ten years now. Can you imagine how angry he must be by now…!”

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तीन प्रश्न


लेव तॉल्स्तॉय

(आज मैं आपको लेव तॉल्स्तॉय की एक लघुकथा सुनाता हूँ. यह कहानी उस राजा की है जो अपने तीन प्रश्नों के उत्तर खोज रहा था.)

तो, एक बार एक राजा के मन में आया कि यदि वह इन तीन प्रश्नों के उत्तर खोज लेगा तो उसे कुछ और जानने की आवश्यकता नहीं रह जायेगी.

पहला प्रश्न: किसी भी कार्य को करने का सबसे उपयुक्त कौन सा है?

दूसरा प्रश्न: किन व्यक्तियों के साथ कार्य करना सर्वोचित है?

तीसरा प्रश्न: वह कौन सा कार्य है जो हर समय किया जाना चाहिए?

राजा ने यह घोषणा करवाई कि जो भी व्यक्ति उपरोक्त प्रश्नों के सही उत्तर देगा उसे बड़ा पुरस्कार दिया जाएगा. यह सुनकर बहुत से लोग राजमहल गए और सभी ने अलग-अलग उत्तर दिए. पहले प्रश्न के उत्तर में एक व्यक्ति ने कहा कि राजा को एक समय तालिका बनाना चाहिए और उसमें हर कार्य के लिए एक निश्चित समय नियत कर देना चाहिए तभी हर काम अपने सही समय पर हो पायेगा. दूसरे व्यक्ति ने राजा से कहा कि सभी कार्यों को करने का अग्रिम निर्णय कर लेना उचित नहीं होगा और राजा को चाहिए कि वह मनविलास के सभी कार्यों को तिलांजलि देकर हर कार्य को व्यवस्थित रूप से करने की ओर अपना पूरा ध्यान लगाये.

किसी और ने कहा कि राजा के लिए यह असंभव है कि वह हर कार्य को दूरदर्शिता पूर्वक कर सके. इसलिए राजा को विज्ञजनों की एक समिति का निर्माण करना चाहिए जो हर विषय को परखने के बाद राजा को यह बताये कि उसे कब क्या करना है. फिर किसी और ने यह कहा कि कुछ मामलों में त्वरित निर्णय लेने पड़ते हैं और परामर्श के लिए समय नहीं होता लेकिन ज्योतिषियों और भविष्यवक्ताओं की सहायता से राजा यदि चाहे तो किसी भी घटना का पूर्वानुमान लगा सकता है.

दूसरे प्रश्न के उत्तर के लिए भी कोई सहमति नहीं बनी. एक व्यक्ति ने कहा कि राजा को प्रशासकों में अपना पूरा विश्वास रखना चाहिए. दूसरे ने राजा से पुरोहितों और संन्यासियों में आस्था रखने के लिए कहा. किसी और ने कहा कि चिकित्सकों पर सदैव ही भरोसा रखना चाहिए तो किसी ने योद्धाओं पर विश्वास करने के लिए कहा.

तीसरे प्रश्न के जवाब में भी विविध उत्तर मिले. किसी ने कहा कि विज्ञान का अध्ययन सबसे महत्वपूर्ण है तो किसी ने धर्मग्रंथों के पारायण को सर्वश्रेष्ठ कहा. किसी और ने कहा कि सैनिक कौशल में निपुणता होना ही सबसे ज़रूरी है.

राजा को इन उत्तरों में से कोई भी ठीक नहीं लगा इसलिए किसी को भी पुरस्कार नहीं दिया गया. कुछ दिन तक चिंतन-मनन करने के बाद राजा ने एक महात्मा के दर्शन का निश्चय किया. वह महात्मा एक पर्वत के ऊपर बनी कुटिया में रहते थे और सभी उन्हें परमज्ञानी मानते थे.

राजा को यह पता चला कि महात्मा पर्वत से नीचे कभी नहीं आते और राजसी व्यक्तियों से नहीं मिलते थे. इसलिए राजा ने साधारण किसान का वेश धारण किया और अपने सेवक से कहा कि वह पर्वत की तलहटी पर लौटने का इंतज़ार करे. फिर राजा महात्मा की कुटिया की ओर चल दिया.

महात्मा की कुटिया तक पहुँचने पर राजा ने देखा कि वे अपनी कुटिया के सामने बने छोटे से बगीचे में फावड़े से खुदाई कर रहे थे. महात्मा ने राजा को देखकर सर हिलाया और खुदाई करते रहे. बगीचे में काम करना उनके लिए वाकई कुछ कठिन था, वे वृद्ध हो चले थे. हांफते हुए वे जमीन पर फावड़ा चला रहे थे.

राजा महात्मा तक पहुंचा और बोला, “मैं आपसे तीन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहता हूँ. पहला: किसी भी कार्य को करने का सबसे अच्छा समय क्या है? दूसरा: किन व्यक्तियों के साथ कार्य करना सर्वोचित है? तीसरा: वह कौन सा कार्य है जो हर समय किया जाना चाहिए?

महात्मा ने राजा की बात ध्यान से सुनी और उसके कंधे को थपथपाया और खुदाई करते रहे. राजा ने कहा, “आप थक गए होंगे. लाइए, मैं आपका हाथ बंटा देता हूँ.” महात्मा ने धन्यवाद देकर राजा को फावड़ा दे दिया और एक पेड़ के नीचे सुस्ताने के लिए बैठ गए.

दो क्यारियाँ खोदने के बाद राजा महात्मा की ओर मुड़ा और उसने फिर से वे तीनों प्रश्न दोहराए. महात्मा ने राजा के प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया और उठते हुए कहा, “अब तुम थोड़ी देर आराम करो और मैं बगीचे में काम करूंगा.” लेकिन राजा ने खुदाई करना जारी रखा. एक घंटा बीत गया, फिर दो घंटे. शाम हो गयी. राजा ने फावड़ा रख दिया और महात्मा से कहा, “मैं यहाँ आपसे तीन प्रश्नों के उत्तर पूछने आया था पर आपने मुझे कुछ नहीं बताया. कृपया मेरी सहायता करें ताकि मैं समय से अपने घर जा सकूं.”

महात्मा ने राजा से कहा, “क्या तुम्हें किसी के दौड़ने की आवाज़ सुनाई दे रही है?”. राजा ने आवाज़ की दिशा में सर घुमाया. दोनों ने पेड़ों के झुरमुट से एक आदमी को उनकी ओर भागते आते देखा. वह अपने पेट में लगे घाव को अपने हाथ से दबाये हुए था. घाव से बहुत खून बह रहा था. वह दोनों के पास आकर धरती पर गिर गया और अचेत हो गया. राजा और महात्मा ने देखा कि उसके पेट में किसी शस्त्र से गहरा वार किया गया था.राजा ने फ़ौरन उसके घाव को साफ़ किया और अपने वस्त्र को फाड़कर उसके घाव पर बाँधा ताकि खून बहना बंद हो जाए. कपड़े का वह टुकड़ा जल्द ही खून से पूरी तरह तर हो गया तो राजा ने उसके ऊपर दूसरा कपडा बाँधा और ऐसा तब तक किया जब तक खून बहना रुक नहीं गया.

कुछ समय बाद घायल व्यक्ति को होश आया और उसने पानी माँगा. राजा कुटिया तक दौड़कर गया और उसके लिए पानी लाया. सूरज अस्त हो चुका था और वातावरण में ठंडक आने लगी. राजा और महात्मा ने घायल व्यक्ति को उठाया और कुटिया के अन्दर बिस्तर पर लिटा दिया. वह आँखें बंद करके चुपचाप लेटा रहा. राजा भी पहाड़ चढ़ने और बगीचे में काम करने के बाद थक चला था. वह कुटिया के द्वार पर बैठ गया और उसे नींद आ गयी. सुबह जब उसकी आँख खुली तब सूर्योदय हो चला था और पर्वत पर दिव्य आलोक फैला हुआ था.

एक पल को वह भूल ही गया कि वह कहाँ है और वहां क्यों आया था. उसने कुटिया के भीतर बिस्तर पर दृष्टि डाली. घायल व्यक्ति अपने चारों ओर विस्मय से देख रहा था. जब उसने राजा को देखा तो बहुत महीन स्वर में बुदबुदाते हुए कहा, “मुझे क्षमा कर दीजिये”.

“लेकिन तुमने क्या किया है और मुझसे क्षमा क्यों मांग रहे हो”, राजा ने उससे पूछा.

“आप मुझे नहीं जानते पर मैं आपको जानता हूँ. मैंने आपका वध करने की प्रतिज्ञा ली थी क्योंकि पिछले युद्ध में आपने मेरे राज्य पर हमला करके मेरे बंधु-बांधवों को मार डाला और मेरी संपत्ति हथिया ली. जब मुझे पता चला कि आप इस पर्वत पर महात्मा से मिलने के लिए अकेले आ रहे हैं तो मैंने आपकी हत्या करने की योजना बनाई. मैं छुपकर आपके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था पर आपके सेवक ने मुझे देख लिया. वह मुझे पहचान गया और उसने मुझपर प्रहार किया. मैं अपने बचाव के लिए भागता हुआ यहाँ आ गया और आपके सामने गिर पड़ा. मैं आपकी हत्या को उद्यत था पर आपने मेरे जीवन की रक्षा की. मैं बहुत शर्मिंदा हूँ. मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपके उपकार का मोल कैसे चुकाऊँगा. मैं जीवनपर्यंत आपकी सेवा करूंगा और मेरी संतानें भी सदैव आपके कुल की सेवा करेंगीं. कृपया मुझे क्षमा कर दें”.

राजा यह जानकर बहुत हर्षित हुआ कि प्रकार उसके शत्रु का रूपांतरण हो गया. उसने न केवल उसे क्षमा कर दिया बल्कि उसकी संपत्ति लौटाने का वचन भी दिया और उसकी चिकित्सा के लिए अपने सेवक के मार्फ़त अपने निजी चिकित्सक को बुलावा भेजा. सेवक को निर्देश देने के बाद राजा महात्मा के पास अपने प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए पुनः आया. उसने देखा, महात्मा पिछले दिन खोदी गयी क्यारियों में बीज बो रहे थे.

महात्मा ने उठकर राजा से कहा, “आपके प्रश्नों के उत्तर तो पहले ही दिए जा चुके हैं.”

“वह कैसे?”, राजा ने चकित होकर कहा.

“कल यदि आप मेरी वृद्धावस्था का ध्यान करके बगीचे में कार्य करने में मेरी सहायता नहीं करते तो आप वापसी में घात लगाकर बैठे हुए शत्रु का शिकार बन जाते. तब आपको यह खेद होता कि आपको मेरे समीप अधिक समय व्यतीत करना चाहिए था. अतः आपका कल बगीचे में कार्य करने का समय ही सबसे उपयुक्त था. आप जिस सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति से मिले वह मैं ही था. और आपका सबसे आवश्यक कार्य था मेरी सहायता करना. बाद में जब घायल व्यक्ति यहाँ चला आया तब सबसे महत्वपूर्ण समय वह था जब आपने उसके घाव को भलीप्रकार बांधा. यदि आप ऐसा नहीं करते तो रक्तस्त्राव के कारण उसकी मृत्यु हो जाती. तब आपके और उसके मध्य मेल-मिलाप नहीं हो पाता. अतः उस क्षण वह व्यक्ति सर्वाधिक महत्वपूर्ण था और उसकी सेवा-सुश्रुषा करना सबसे आवश्यक कार्य था.”

“स्मरण रहे, केवल एक ही समय सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और वह समय यही है, इस क्षण में है. इसी क्षण की सत्ता है, इसी का प्रभुत्व है. सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वही है जो आपके समीप है, आपके समक्ष है, क्योंकि हम नहीं जानते कि अगले क्षण हम किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार करने के लिए जीवित रहेंगे भी या नहीं. और सबसे आवश्यक कार्य यह है कि आपके समीप आपके समक्ष उपस्थित व्यक्ति के जीवन को सुख-शांतिपूर्ण करने के प्रयास किये जाएँ क्योंकि यही मानवजीवन का उद्देश्य है.”

कितना अच्छा होता यदि तॉल्स्तॉय की यह कथा हमारे सभी धर्मग्रंथों में होती. इसमें अपार पवित्रता है. इसमें जनसेवा और पुरुषार्थ का सन्देश है. यह बताती है कि सभी प्राणियों का हितचिंतन ही मानव जीवन का उद्देश्य है. यह किसी देवता की उपासना या पद्धति के अनुपालन की बात नहीं करती. हम सर्वत्र शांति की बातें करते नहीं थकते पर यह भूल जाते हैं कि हम इस ध्येय की प्राप्ति तभी कर सकते हैं जब हमारे सबसे निकट उपस्थित मनुष्यों के जीवन में प्रसन्नता का समावेश हो. यदि हम अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों, और परिजनों का जीवन ही नहीं संवारेंगे तो समाज का हित कैसे साध सकते हैं? यदि हमारी संतान ही बिलख रहीं हो तो दूसरों के आंसू पोंछने में कैसा गौरव? – तिक न्यात हन्ह

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Stopping, Calming, Resting, Healing – जागरूकता


एक ज़ेन कहानी में यह वर्णित है कि एक व्यक्ति अनियंत्रित घोड़े पर बैठा कहीं भगा जा रहा है. सड़क पर उसे देखने वाला एक आदमी उससे चिल्लाकर पूछता है, “तुम कहाँ जा रहे हो?!” और घुड़सवार उससे चिल्लाकर कहता है, “मुझे नहीं मालूम! तुम घोड़े से पूछो!”

मुझे लगता है कि यह हमारी ही दशा है. हम ऐसे बहुसंख्य घोड़ों पर सवार है और उनपर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है. विश्व में हथियारों की बढ़त और सभी तक उनकी पहुँच होना भी कुछ ऐसा ही है. इन घोड़ों को बस में करने के लिए हमने बहुत प्रयास किये पर उनका कुछ परिणाम नहीं निकला. ऐसे ही बहुत से जंजाल में हम उलझे हुए हैं और हमारे पास उनसे बाहर निकलने के लिए समय भी नहीं है.

बौद्ध मत में जागरूकता के विचार को बहुत महत्व दिया गया है. इसका अर्थ है यह बोध सतत बने रहना कि हमारे चारों ओर क्या घट रहा है. जागरूकता का यह बोध, न केवल हमारी दृष्टि की सीमा के भीतर, बल्कि उसके परे भी. उदाहरण के लिए, भोजन करते समय हमारा मन इस ओर भी जाए कि पूरी दुनिया में कृषक बंधु अन्न को उपजाने के लिए अंधाधुंध विषैले कीटनाशकों का उपयोग कर रहे हैं जो धरती, जल, वायु, और पैदावार को दूषित कर रहा है. ऐसे भोज्य पदार्थों का सेवन हमें अनजाने में ही पर्यावरण का शत्रु बना रहा है यद्यपि इसका कोई विकल्प भी नहीं है. माँस और शराब का सेवन करते समय हमारा ध्यान इस ओर भी जाना चाहिए कि गरीब देशों में प्रतिदिन अनगिनत शिशु भूख से मर रहे हैं क्योंकि इनके (माँस और शराब) उत्पादन के लिए बहुत सारा अनाज व्यर्थ कर दिया जाता है. ऐसे में एक टुकड़ा माँस खाने के स्थान पर एक कटोरा चावल खाने में मुझे भूख की त्रासदी नगण्य ही सही पर घटती दिखती है. फ्रांस में रहनेवाले एक विद्वान ने मुझे एक बार यह बताया कि पश्चिमी देश यदि माँस और शराब के उपभोग में पचास प्रतिशत कमी ले आयें तो विश्व में भुखमरी की समस्या से बहुत हद तक छुटकारा पाया जा सकता है. सोचिये, सिर्फ पचास प्रतिशत कटौती करने से ही हालात कितने बदल सकते हैं!

तिक न्यात हन्ह

प्रतिदिन हम बहुत कुछ करते हैं और हम ही वह माध्यम हैं जो शांति की स्थापना कर सकता है. यदि हम अपनी जीवनशैली, उपभोगवादी मानसिकता, और दृष्टिकोण के प्रति जागरुकता लायेंगे तो आज और इसी क्षण से ही परिवर्तन सहज हो जायेंगे. हर रविवार को अखबार उठाते समय हम यह जानने लगेंगे कि विज्ञापनों से पटे हुए इस भारी-भरकम साप्ताहिक एडीशन को छापने के लिए सैंकड़ों वृक्षों की बलि देनी पड़ी होगी. अखबार को उठाते समय हमारे मन में यह बात ज़रूर आनी चाहिए. अपनी सोच और दृष्टिकोण में जागरूकता का समावेश करने पर हम पायेंगे कि हमारे हाथ में बहुत कुछ है. हम चाहें तो बहुत कुछ बदल सकते हैं. – तिक न्यात हन्ह (Thich Nhat Hanh)

This is a Zen story, about a man and a horse. The horse is galloping quickly, and it appears that the man on the horse is going somewhere important. Another man standing alongside the road, shouts ” Where are you going?” and the first man replies, “I don’t know! Ask the horse!” This is also our story. We are riding a horse, we don’t know where we are going, and we can’t stop. The horse is our habit energy pulling us along, and we are powerless. We are always running and it has become a habit. We struggle all the time, even during our sleep. We are at war with ourselves and we can easily start a war with others.

We have to learn the art of stopping – stopping our thinking, our habit energies, our forgetfulness, the strong emotions that rule us. When an emotion rushes through us like a storm, we have no peace. How can we stop this state of agitation? How can we stop our fear, despair, anger, and craving? We can stop by practicing mindful breathing, mindful walking, mindful smiling, and deep looking in order to understand. When we are mindful, touching deeply the present moment, the fruits are always understanding, acceptance, love and the desire to relieve suffering and bring joy.

Calming allows us to rest, and resting is a precondition for healing. When animals in the forest get wounded, they find a place to lie down, and they rest completely for many days. They don’t think about food or anything else. They just rest, and they get the healing they need. When we human get sick, we just worry! We look for doctors and medicine, but we don’t stop. Even when we go to the beach or the mountains for a vacation, we don’t rest, and we come back more tired than before. We have to learn to rest. Lying down is not the only position for resting. During sitting or walking meditation, we can rest very well. Meditation does not have to be hard labor. Just allow your body and mind to rest like an animal in the forest. Don’t struggle. There is no need to attain anything. Just as when you are reading this, read in a joyful, yet restful way.

Practice in a way that does not tire you out, but gives your body, emotions, and consciousness a chance to rest. Our body and mind have the capacity to heal themselves if we allow them to rest.

Stopping, calming, and resting are preconditions for healing. If we cannot stop, the course of destruction will just continue. The world needs healing. Individuals, communities, and nations need healing.

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