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धरती पर पैर धरो धीरे

(वसंत ऋतु में) “जरा धीरे चलो मेरे भाई, धरती मैया पेट से है” – उत्तर अमेरिकी आदिवासी उक्ति

अपने लोक जीवन और पारंपरिक ज्ञान से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं. पृथ्वी माता के प्रति सम्मान की अनेक कथाएं भारतीय मानस में जीवित हैं. हजारों सालों तक भारत के आदिवासी सिर्फ इसलिए पिछड़े रह गए क्योंकि धरती माता के शरीर पर लोहे के हल और कुदाल चलाना उन्हें स्वीकार नहीं था. अपने मतलब भर की लकड़ी वे जंगल से लेते थे जिसका उपयोग केवल जलावन के लिए होता था. अभी भी बहुतेरी आदिवासी संस्कृतियाँ अपने झोपड़ों में लकड़ी के दरवाजे-खिड़कियाँ नहीं लगातीं. कोई क्या चुरा के ले जाएगा?

आजकल कार्बन फुटप्रिंट की बहुत चर्चा होती है. इसका सम्बन्ध ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से है. इसके बारे में मैंने अभी विस्तार से नहीं पढ़ा है. बस इतना जानता हूँ कि आधुनिकता और विकास की अंधी दौड़ में धरती को रौंदनेवाले पैर उसे स्थाई क्षति पहुंचा रहे हैं. जितना अधिक विकास, उतना अधिक कार्बन उत्सर्जन. जितना अधिक कार्बन उत्सर्जन, उतना ही बड़ा कार्बन फुटप्रिंट. अमेरिकियों और यूरोपियों के कार्बन फुटप्रिंट भारतीयों और अफ्रीकियों के कार्बन फुटप्रिंट की तुलना में न केवल कई गुने बड़े हैं बल्कि धरती को गहरे तक चोटिल करते हैं.

धरती की रक्षा करने का केवल एक ही उपाय है. उसपर कम भार डालो. उसे मत रौंदो.

पिछले सौ सालों में ज्यादा से ज्यादा प्राप्त करने और संचय करने की होड़ में हम बहुत कुछ भूलते जा रहे हैं. हमारी संस्कृतियों ने हमें हमेशा यह सिखाया कि जितना हम पाते हैं उससे ज्यादा लौटाने की हमारे ऊपर नैतिक जिम्मेदारी स्वतः बनती है. धरती को गहरे तक खोदकर उससे बहुमूल्य रत्न, धातुएं, और अयस्क निकाले जा चुके हैं. नदियाँ नगरों के सीवेज और रसायनों से भरी हुई हैं. जंगलों से पेड़ और प्राणी नदारद हो रहे हैं. प्राकृतिक दृश्यों को मनमाफिक रूप दे दिया गया है. कहते हैं कि आज धरती से जितना लिया जा रहा है उसके लिए भविष्य में एक धरती कम पड़ेगी.

इन मसलों पर इतना कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है कि इससे किसी को अनभिज्ञता नहीं है. हमें समस्याओं की जानकारी है लेकिन प्रत्यक्ष उपायों को हम नज़रंदाज़ कर रहे हैं. कचरे को रिसाइकल करना, इलेक्ट्रिक कार खरीदना या साईकिल चलाना ज़रूरी लेकिन फैशनेबल विकल्प हैं. इनसे ज्यादा भी बहुत कुछ किया जा सकता है.

मितव्ययता और अपरिग्रह कुछ-कुछ एक जैसे सिद्धांत प्रतीत होते हैं. मितव्ययता याने अपने खर्चे कम करना. अपरिग्रह याने अपनी ज़रूरतें कम करना. मुझे अपरिग्रह का विचार भाता है. यह जैन दर्शन का एक रत्न है. देखिये भगवान् महावीर ने इस विषय पर क्या कहा है:-

”चित्तमंतमचित्तं वा परिगिज्झ किसामवि।
अन्नं वा अणुजाणाइ एव्रं दुक्खाण मुच्चइ॥”


अर्थात जो आदमी खुद सजीव या निर्जीव चीजों का संग्रह करता है, दूसरों से ऐसा संग्रह कराता है या दूसरों को ऐसा संग्रह करने की सम्मति देता है, उसका दुःख से कभी भी छुटकारा नहीं हो सकता. और…

”जहा लाहो तहा लोहो लाहा लोहो पवड्ढई।
दोमासकयं कज्जं कोडीए वि न निट्ठियं॥”


ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों-त्यों लोभ भी बढ़ता है। ‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।’ पहले केवल दो मासा सोने की जरूरत थी, बाद में वह बढ़ते-बढ़ते करोड़ों तक पहुँच गई, फिर भी पूरी न पड़ी! (स्रोत)

अपरिग्रह का अर्थ अभाव में जीने से नहीं है. इच्छाओं में कमी होने से उपभोग एवं उपयोग में भी कमी आती है. जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का दोहन और उनपर निर्भरता कम होती जाती है. इसका प्रभाव हमारे पर्यावरण और वातावरण पर भी पड़ता है. गाँव-देहात की हवा यूं ही शुद्ध तो नहीं होती! वहां विकास के चरण नहीं पड़े तो विकास के दुष्परिणामों से भी वे दूर हैं.

अपरिग्रह या मिनिमलिज्म का दर्शन सरल और स्थाई है. रिसाइकलिंग का अपना महत्व है लेकिन अपरिग्रह का पालन करने पर उसकी ज़रुरत भी नहीं पड़ती. पर्यावरण या वातावरण को नुकसान पहुंचाए बिना भी बहुत से पदार्थों का निर्माण और उपयोग किया जा सकता है लेकिन समझदारी इसी में है कि ज़रूरतें ही कम कर दी जाएँ. ऐसा करने के बहुत से तरीके संभव हैं और उनमें से कुछेक पर यहाँ बिंदुवार चर्चा की जाएगी.

* सीमित खरीददारी – अधिक से अधिक उपभोग की लालसा के फलस्वरूप बहुतेरी वस्तुओं का निर्माण किया जाता है जिन्हें हम खरीदते हैं. कम खरीदने की आदत विकसित करना चाहिए. इसपर मैं पहले एक-दो पोस्टें लिख चुका हूँ. आप अंग्रेजी की ये पोस्टें भी पढ़कर देखें. पहली, दूसरी, और तीसरी.

* अन्न का निरादर न करें – अमेरिका जैसे देश में लोगों को कम खाने की नसीहत दी जाती है जो अपने देश में बेमानी है. इसके बावजूद हमारे यहाँ बड़े पैमाने पर अन्न की बर्बादी होती रहती है. सरकारी नीतियों के कारण होनेवाली बर्बादी की बहुत चर्चा होती है पर घरों और पार्टियों में बर्बाद किये जाने वाले अन्न की भी सीमा नहीं है. अन्न के उत्पादन में बहुत बड़ी मात्रा में संसाधनों और मानव श्रम की खपत होती है. मैं अक्सर ही रेस्टौरेंट्स और पार्टियों में लोगों को खाने से भरी हुई प्लेटें कचरे के डिब्बे में डालते देखता हूँ. यह बहुत दुखदाई है.

* शाकाहार अपनाएं – अन्न उपजाने की तुलना में मांस के उत्पादन में ऊर्जा कई गुना अधिक प्रयुक्त होती है. शाकाहार अपनाने के अपने बहुत से आधार और फायदे हैं.

* पैकेजिंग कम करें – आजकल चीज़ों को लपेटने और पैक करने में अंधाधुंध सामग्री का उपयोग किया जाता है. किसी भी सामान को खरीदने से पहले इसपर विचार करना तो संभव नहीं है लेकिन ऐसे प्रयास किये जा सकते हैं कि कंपनियों को हलकी पैकेजिंग के लिए प्रेरित किया जा सके. कंपनियों को पैकेजिंग वापस लेकर कुछ उपहार देने का विकल्प रखना चाहिए.

* गाड़ी कम – पैदल ज्यादा – साईकिल चलाये हुए आपको कितना समय हो गया? शायद आपके पास साइकिल न हो. मेरे पास भी नहीं है लेकिन मैं कभी-कभार यूं ही किसी की साईकिल मांगकर ज़रा दूर तक चला लेता हूँ. पब्लिक ट्रांसपोर्ट की दशा बेहतर हो तो मैं उसे अपनाने में गुरेज़ न करूँ. पैदल खूब चलता हूँ. बाइक पूल या कार पूल भी अच्छी चीज़ है. सबसे बढ़िया तो है घर में बैठना और मज़े से बच्चों के साथ खेलना, पढना, टी वी देखना, ब्लौग चैक करना.

* घर कितना भी बड़ा हो, उसमें बेतहाशा खरीदकर बाहरी हुई चीज़ें देखना नहीं सुहाता. जितनी ज्यादा चीज़ें, उतना ज्यादा कबाड़. व्यवस्थित रखने का खर्चा और भारी-भरकम बिल अलग से. छोटा घर – संसाधनों की कम बर्बादी. बिजली-पानी की कम खपत.

ये सब तो कुछ उदाहरण और उपाय हैं. असली चीज़ तो है मानसिकता और मनोवृत्ति में परिवर्तन लाना. सभी करें तो कितना अच्छा हो. जीवन की गुणवता के पैमाने पर हमारा देश बहुतेरे विकसित देशों से पीछे है. कहा जाता है कि हमारे नागरिकों में सिविक सेन्स भी नहीं है और आदेशों का उल्लंघन करना हमारी फितरत है. कुछ बातें सही हैं पर दोषदर्शन से क्या होगा. पहल तो सभी को करनी ही पड़ेगी. आखिर हमारे भविष्य का सवाल है.

(इस पोस्ट की प्रेरणा इस पोस्ट से मिली है)

पोस्ट अपडेट
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उन्मुक्त जी ने कमेन्ट में अपनी एक पोस्ट की लिंक दी. उनकी पोस्ट में दिए गए कुछ बिन्दुओं को यहाँ पुनःप्रस्तुत कर रहा हूँ क्योंकि वे सामयिक हैं और पोस्ट की प्रकृति के अनुरूप भी हैं. इसके लिए आपको धन्यवाद, उन्मुक्त जी!

छोटे-छोटे कदम ही हमारी पृथ्वी मां को बचा सकेंगे। यह हमारी जिम्मेवारी है कि यह काम सुचारु रूप से हो। क्योंकि किसी ने सच कहा है कि,

‘We have not inherited this planet from our parents. But have merely borrowed it from our children’
यह पृथ्वी हमें अपने पूर्वजों से नहीं मिली है. यह हमारे पास वशंजों की धरोहर है.

यह हमारी जिम्मेवारी है कि हम वशंजों की धरोहर, उन्हें ठीक प्रकार से उन्हें वापस दे सकें।  क्या आप जानना चाहते हैं कि आप इसमें किस तरह से सहयोग कर सकते हैं। बहुत कुछ – देखिये आप क्या कर सकते हैं:

1. आप समान ऐसे पैकेटों में खरीदिये जो फिर से प्रयोग हो सकें और उन्हें बार बार प्रयोग करें।

2. शॉपिंग पर अपना बैग ले जायें।

3. पेपर को बेकार न करें। दोनों तरफ प्रयोग करें।

4. हो सके तो, लिफाफों को फाड़ कर, अन्दर की तरफ सादी जगह को, लिखने के लिये प्रयोग करें।

5. सारे बेकार कागजों को पुनर्चक्रण (recycling) के लिये इकट्ठा करें।

6. प्लास्टिक के पैकेटों का कम प्रयोग करें। सब्जी, फल या मांस को सुरक्षित रखने के लिये प्लास्टिक की जरूरत नहीं।

7. उन उत्पादनों को लें, जो हर बार पुनः फिर से भरने वाले पैकटों में मिलते हों। यदि आपकी प्रिय वस्तु  ऐसे पैकेटों में न आती हो तो कम्पनी को इस तरह के पैकेटों में बेचने के लिये लिखें।

8. खाने की वस्तुओं को हवा-बन्द बर्तनों में रखें। उन्हें चिपकती हुई प्लास्टिक में रखने की जरूरत नहीं।

9. पेट्रोल बचायें, प्रदूषण कम करें।

10. अपने सहयोगियों और पड़ोसियों के साथ कार पूल कर प्रयोग करने का प्रयत्न करें।

11. बिना बात बिजली का प्रयोग न करें – बत्ती की जरूरत न हो तो बन्द कर दें।

12. पेड़ों, जंगलों के कटने को रोके। इनके कटने के खिलाफ लोगों को जागरूक करें।

13. पुनरावर्तित (recycled) वस्तुओं का प्रयोग करें।

14. ऐसे बिजली के उपकरण प्रयोग करें जो कम बिजली खर्च करते हों। इस समय इस तरह के नये तकनीक पर बने बल्ब आ रहें हैं। उनका प्रयोग करें।

15. पर्यावरण-मित्रवत उत्पादकों (environment friendly products) का प्रयोग करें।

आप इन पन्द्रह बिन्दुओं में से, कितने बिन्दुओं का पालन करते हैं। मैं इसमें सब तो नहीं, पर अधिकतर का पालन करता हूं। मेरे साइकिल  चलाने के बारे में तो आप जानते ही हैं और शायद कोपेनहेगन व्हील (Copenhagen Wheel)  बहुत कुछ बदल दे।
(A post on caring about the environment and mother Earth – in Hindi)
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खोखली सुरक्षा का भ्रम

कुछ दिनों पहले मेरी पिताजी से एक मसले पर बहुत कहा-सुनी हो गयी. मैं होली पर घर जानेवाला था. पिताजी ने होली के पहले घर की सफाई-पुताई कराई. घर में बहुत सा कबाड़ का सामान था जिसे निकालकर फेंकना ज़रूरी था. मैंने पिताजी से कह रखा था कि होली में घर आने पर मैं चीज़ों की छंटनी करा दूंगा.

भोपाल में मेरे घर में हमारे पास लगभग तीन हज़ार किताबें हैं. बहुत सी तो पिताजी ने पिछले चालीस साल में खरीदीं. उन्हें यहाँ-वहां से समीक्षा के लिए भी बहुत सारी किताबें मिलती रहतीं हैं. मेरी खुद की किताबें भी बहुत हैं. इनमें से कई मैंने पिछले दस-पंद्रह सालों में खरीदीं. ज्यादातर किताबों को मैंने पढ़ा नहीं था. हमेशा यह सोचता रहता था कि अभी तो खूब लम्बा जीवन पड़ा है किताबें पढ़ने के लिए. फुर्सत मिलने पर इन्हें पढ़ेंगे. इसी चक्कर में पुरानी किताबें पढ़ीं नहीं और नई खरीदता गया.

होली के पहले साफ़-सफाई के जोश में पिताजी ने मेरी बहुत सी किताबों को (लगभग 150-200) ग़ैरज़रूरी समझकर रद्दी में बेच दिया. बेचने के बाद घर में इस बात का अंदेशा हुआ कि यह समाचार मिलने पर मैं तो उबल ही जाऊँगा. ऐसा ही हुआ भी. फोन पर कुछ दिनों बाद मुझे बहन ने यह समाचार सुनाया और…

चंद रोज़ बाद मैं होली पर भोपाल पहुंचा. तब तक मेरा गुस्सा तो ठंडा पड़ चुका था इसलिए भोपाल में समय शांतिपूर्वक बिताया. आज इस बात को एक महीने से भी ज्यादा हो चला है और अब मुझे अपनी बिक चुकी किताबों की याद तो आती है पर मैं इस बात को भी समझता हूँ कि मैं यूं ही ताउम्र उन्हें अलमारी की शोभा बनाये रखता और उनको पढ़ने की नौबत कम ही आती. अफ़सोस सिर्फ दो बातों का है कि यह काम करने के पहले घरवालों ने मुझसे पूछा नहीं, और यह कि हजारों रुपयों की किताबों को कौड़ियों के मोल बेच दिया गया.

खैर, चीज़ गयी सो गयी. अब उसका कितना अफ़सोस मनाया जाये! जब तक वे किताबें मेरे पास थीं तब तक मुझमें उनके स्वामित्व का अहंकार था. जहाँ मेरे हमउम्र लड़के हमेशा गैजेट्स और फैशनेबल आयटम्स में अपनी सेक्योरिटी तलाशते थे वहां मैं अपनी किताबगाह में दुबके दीन-दुनिया से बेख़बर सुरक्षित महसूस करता था.

इस वाकये का ताल्लुक इस पोस्ट से भी है. न केवल किताबें बल्कि और भी बहुत सी वस्तुएं हममें से बहुतों के लिए सुरक्षा की भावना का जरिया होतीं हैं.  वे हमारे पास होतीं हैं तो हम बेहतर अनुभव करते हैं और उनके उपयोग-उपभोग के बहाने तलाशते हैं.

मुझे लगता है कि मनुष्य और पशुओं में समानता आहार-भय-निद्रा-संतानोत्पत्ति के स्तर पर तो है ही लेकिन मनुष्य में पशुओं के विपरीत संग्रह की भावना अति प्रबल है. अपने घर-आँगन में हम नानाविध वस्तुओं को भरके उनमें अपना सुकून खोजते हैं, अपना अकेलापन दूर करते हैं. वस्तुओं से भावनात्मक सम्बन्ध जोड़कर हम उनके साए में यादों को संजो कर रखते हैं.


वस्तुओं से भावनात्मक सम्बन्ध जोड़ लेना सहज है. आज भी मेरे परिवार की महिलाओं ने अपनी शादी की साड़ी और पुराने जेवरों को संभाल कर रखा है. “यह कड़ा तुम्हारी दादी के हाथ का है. अब ऐसा सोना नहीं मिलता” – माँ मुझसे कहती हैं. मैं सर हिलाता हूँ. घर में और भी नए-पुराने जेवर हैं लेकिन माँ जब इस कड़े के बारे में बताती हैं तो उनकी आंखों में सोने की कोई और किरण चमकती है. माँ के पास यह कड़ा हिफाज़त से है और माँ इसमें अपनी हिफाज़त ढूंढ रही है.

यह सुरक्षा की भावना बड़ी विकट है. यह इन रूपों में भी झलकती है:-

* अलमारी भर कपड़ों में इस बात का इत्मीनान है कि किसी भी मौके में पहनने के लिए कपडे़ हैं. आजकल लोग गमी में पहनने वाले कपडे़ भी नील-कलफ लगाकर तैयार रखते हैं.

* बड़ा घर इसलिए चाहिए क्योंकि घर में मांगलिक कार्य के मौके पर जगह कम नहीं पड़ेगी. घर बड़ा हो तो हर मौसम में अनुकूलता रहती है. गर्मी में छत पर भी सो सकते हैं. दोनों बेटों की शादी हो जाएगी तो वे अपनी पसंद के फ्लोर पे रहेंगे.

* कार होनी ज़रूरी है. फिर इमरजेंसी में किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा.

* गैरेज में अच्छी टूल-किट, ऊंचा सामान रखने के लिए सीढ़ी, और बागवानी के औजार रखना चाहिए. क्या पता कब किस चीज़ की ज़रुरत पड़ जाये!

* नया गैजेट (ब्लैकबेरी, आईफोन, आइपैड आदि) पास हों तो हम तकनीक से ताल-से-ताल मिलकर चल सकते हैं. आउट-ऑफ़-डेट कौन कहलाना चाहेगा? और फिर ये हों तो आप कहीं से भी काम करो, मेल, करो, ब्लौग पढ़ो, टच में रहो.

और भी न जाने क्या-क्या. ऐसे ही बहुत से कारण और भी हो सकते हैं जब हम वस्तुओं में सुरक्षा तलाशने लगते हों.

पर क्या वाकई इन चीज़ों का पास में होना कुछ सुरक्षा देता है? कहीं यह सुरक्षा भ्रम तो नहीं!

आज मेरे पिता मुझे समझाते हैं कि ऐसी बहुत सी चीज़ें हम अपने आसपास कबाड़ बनाकर रखे रहते हैं जिनकी हमें वाकई ज़रुरत नहीं होती. यदि वे हमारे पास न भी हों तो हम उतने ‘अभाव’ में नहीं होते जितना हमें लगता है. देखिये:-

* आप साल भर में पहने जाने वाले कपड़ों का लेखा-जोखा करें तो आप जान जायेंगे कि आपको ‘क्या-पता-कब-इसकी-ज़रुरत-पड़-जाये’ जैसे कपड़ों को पहनने के मौके न के बराबर ही मिलते हैं. ज्यादातर अवसरों पर हम सिर्फ-और-सिर्फ वही कपडे़ पहनते हैं जिन्हें पहनना ज़रूरी होता है (या जिन्हें ही पहनना चाहिए). गैरज़रूरी कपड़ों को बिना किसी इमोशनल अत्याचार झेले किसी और को दिया जा सकता है (और उसे भी शायद उनकी ज़रुरत न हो).

* छोटे घरों में रहने के कुछ फायदों को अनदेखा किया जाता है. जैसे – छोटा घर, कम कचरा. छोटा घर, कम कर्जा. छोटा घर, ज़रुरत भर का सामान.

* कार न भी हो तो बाइक से, ऑटो से, बस से, या पैदल भी काम चल जाता है बशर्ते ज़रूरतें कम हों. वाकई कोई इमरजेंसी हो तो एम्बुलेंस की ही ज़रुरत पड़ती है जिसे शायद कोई भी खरीद के रखना नहीं चाहेगा.

* लेटेस्ट गैजेट लेने में कोई तुक नहीं है. मैं यह सब दस साल पुराने कम्प्यूटर पर लिख रहा हूँ जिसे वक़्त-ज़रुरत के हिसाब से मैं अपग्रेड कर चुका हूँ. बहुत कम ही ऐसे मौके आते हैं जब नया लिए बगैर काम करना नामुमकिन हो जाये. सच में!

* हर जगह हर समय कनेक्ट रहने की ज़रुरत नहीं है. इस बात को ज्यादा अरसा नहीं हुआ जब कोई भी कहीं भी कनेक्टेड नहीं रहता था और फिर भी सब जीते रहे! मैं गाड़ी चलाते वक़्त, खाने के समय, और यूं ही कभी एकांत के लिए फोन बंद रखता हूँ. मेरा फोन केवल बातचीत ही करा सकता है. बाकी इंटरटेनमेंट के लिए टीवी/कम्प्यूटर है.

अब यह सोचकर बड़ी राहत मिलती है कि कभी एक रात को इन्टरनेट बंद पड़ जाये तो मैं झुंझलाते हुए कम्पनी फोन नहीं करने लगूंगा. “कोई बात नहीं. कल देख लेंगे.”

अब आप बताएं कि आप उन हालत में क्या करेंगे:-

1. जब आपके कलेजे के टुकड़े के मानिंद कोई चीज़ या सुविधा आप अपने करीब नहीं पायें.

2. ऐसा होने की संभावना कितनी है, और,

3. तब क्या होगा यदि वह चीज़ या सुविधा आपसे हमेशा के लिए छिन जाये!

कम-से-कम चीज़ों और सुविधाओं के साथ रहकर देखें. यह देखें कि क्या जीवन दुनियावी वस्तुओं से उपजती खोखली सुरक्षा के बिना वाकई कष्टदायक है! अपना बैक-अप प्लान तैयार रखें.

(यह पोस्ट इस पोस्ट का अनुवाद/रूपांतरण है)

(A personal post about the illusion of being safe and secured – inspired by Leo Babauta – in Hindi)

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खाना खा लिया? तो अपने बर्तन भी धो लो!

एक प्रसिद्द ज़ेन कथा में वर्णित है कि:-

एक नए बौद्ध साधक ने अपने गुरु से पूछा – “मैं हाल में ही मठ में शामिल हुआ हूँ. कृपया मुझे कोई शिक्षा दें.”
जोशु ने उससे पूछा – “क्या तुमने अपनी खिचड़ी खा ली है?”
नए साधक ने कहा – “जी”.
जोशु बोले – “तो अपने बर्तन भी धो लो”.
कहते हैं कि इतना सुनते ही साधक को बोधि प्राप्त हो गयी.

*  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *

मुझे क्षमा करें पर मैं इस कथा को नहीं समझा सकता क्योंकि मैं स्वयं इसे नहीं समझ पाया हूँ. यही तो जापानी ज़ेन कथाओं की विशेषता या कमजोरी है. खैर, मैं इस कथा से ही अपनी बात आगे बढाऊँगा.

अब आप बताएं. क्या आपने अपना खाना खा लिया है? यदि हाँ, तो आप भी अपने बर्तन धो लीजिये.

खाना खाते समय मैं अक्सर यह सोचता हूँ, और-तो-और, दूसरे काम करते समय भी मैं इस बात पर विचार करता हूँ – “खाना खा लिया? तो बर्तन भी धो लो!”

इस बात में असीम सरलता और गहराई है. इसका सार यह है कि ‘जीवन के उद्देश्य और इसके रहस्यों को समझने के प्रयास में अपना सर मत खपाओ… बस जिये जाओ’. अपने बर्तन धो लो. धोने की इस प्रक्रिया में ही तुम्हें वह सब मिलेगा जो तुम पाना चाहते हो.

मुझे इसमें सत्य के दर्शन होते हैं. वैसे तो मुझे वास्तव में अपने बर्तन धोने के अवसर कम ही मिलते हैं पर ऐसा करते समय मैं इसे पूरी तल्लीनता और सजगता से करता हूँ. इस काम में कुछ भी खर्च नहीं होता पर असीम संतोष मिलता है.

नहाने से पहले मैं हाथों से अपने कपड़े धोता हूँ. उन्हें निचोड़ने के बाद सुखाने के लिए तार पर टांग देता हूँ. कपड़े बदलते वक़्त मैं मैले कपड़ों को धोये जाने के लिए नियत स्थान पर रख देता हूँ. किचन में जब कभी कुछ बनाता हूँ तो डब्बों को यथास्थान रखने के बाद प्लेटफ़ॉर्म पर साफ़-सफाई कर देता हूँ. मैं इसमें परफेक्ट होने का दावा नहीं करता पर प्रयास तो कर ही सकता हूँ न.

अपना काम हो जाने के बाद इन चीज़ों को करने का सम्बन्ध केवल स्वच्छता और व्यवस्था बनाये रखने से ही नहीं है. इन्हें करने में सचेतनता और सजगता है, कर्म किये जाने की भावना का मनन है, और हड़बड़ी में अगले काम में रत हो जाने की बजाय वर्तमान के क्षणों में बने रहने का बोध है.

तो आप भी अपने बर्तन धो लीजिये. होशपूर्वक और उल्लास के साथ.

(यह पोस्ट इस पोस्ट का स्वतन्त्र अनुवाद है)

(A zen story on merits of being wakeful and attentive – in Hindi)

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जीवन एक कविता है

“मेरा जीवन ही मेरा संदेश है” – महात्मा गाँधी

हमारा जीवन ही हमारी अभिव्यक्ति है. यह बतलाता है कि हम कौन हैं. यह हमें संसार से जोड़ने वाला सेतु है. हमारी समस्त कामनाएं-वासनाएं इसमें प्रतिबिंबित होती हैं. यह हमारी उपस्थिति को मूर्त करनेवाली घटनाओं और हमारी भावनाओं की निर्बाध सरिता है.

प्रसन्न होने पर हम गीतों के बोलों में फूट पड़ते हैं और हमारा रोम-रोम थिरकने लगता है. आवेश और उन्माद के कारण हमारे मन व शरीर में भय और वेदना का संचार होने लगता है.

हम कुछ भी करें, कैसे भी रहें – वह हमारी अभिव्यक्ति है.

महात्मा गाँधी का जीवन ही उनका संदेश था – और आपका जीवन आपका संदेश है. अपने कर्म से, कार्यों से, व्यवहार से, उपलब्धियों से और जीवन के प्रत्येक क्षण से आप इस संसार को क्या संदेश दे रहे हैं?

क्या आपका संदेश एक शोकाकुल एकालाप है? या वह एक गीत है? काव्य है? गाथा है?

क्या आपका संदेश एक छंद है? तुक्तक है? हाइकू है?

क्या आपका संदेश मुक्त पद्य है? या गद्य कविता?

यदि आपका जीवन एक कविता है तो आप उसे कैसे शब्द देंगे? उस कविता में से आप क्या-कुछ छांट देंगे? उस कविता का सार क्या होगा?

जीवन का प्रत्येक क्षण अपने में परिपूर्ण है. वह स्वयं में अप्रतिम स्वाद को संजोए हुए है. यह डाल से तोड़ा गया रसीला फल है जिसका मजा इसे बिना धोए खाने में ज्यादा है.

peach
“बस यही कहना है”

(विलियम कार्लोस विलियम्स की कविता)

फ्रिज के आइसबॉक्स में
करीने से तुम्हारे रखे
आड़ू के मीठे फल
मैंने खा लिए हैं

बचा रखा था जिन्हें
तुमने शायद…
नाश्ते के वक्त
साथ खाने के लिए

मुझे माफ करना
रोकता कैसे खुद को -
जब देखे ताज़ा, ठंडे,
मीठे, रसीले आड़ू

ज़ेन-हैबिट्स ब्लौग की इस पोस्ट का अनुवाद, साभार.

(Your life should be your message to all – Mahatma Gandhi – in Hindi)

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क्या आप अपनी पोस्टें चोरी किये जाने से नाराज़ हैं?

लियो बबौटा
लियो बबौटा

यह पोस्ट अंग्रेजी के अत्यंत लोकप्रिय ब्लौग ज़ेन-हैबिट्स के रचयिता लियो बबौटा द्वारा कॉपीराइट पर लिखी गई बेहतरीन पोस्ट का संपादित हिंदी अनुवाद है.

ओपन सोर्स सोफ्टवेयर क्रांति के जनक रिचर्ड स्टालमैन ने कहा था – “मेरी दृष्टि में स्वर्णिम नियम यह होगा कि यदि मुझे कोई प्रोग्राम अच्छा लगता है तो मुझे इसे उन लोगों के साथ बांटना चाहिए जो इसे पसंद करते हैं”.

मुझे बहुत सारी ई-मेल मिलती हैं जिनमें मुझसे ज़ेन-हैबिट्स पर प्रकाशित पोस्टों को अन्य ब्लौगों, न्यूज़लैटर, कॉन्फ्रेंस, और कक्षाओं में पुनः प्रकाशित करने की अनुमति मांगी जाती है. इसके अतिरिक्त अनुवादक भी मुझे पोस्टों और मेरी ई-बुक को अनूदित करने और दूसरे माध्यमों में प्रकाशित करने के लिए संपर्क करते हैं.

हाल तक तो मैं उन्हें मुख्यतः अव्यवसायिक उपयोग के लिए सीमित अनुमति दे दिया करता था लेकिन अब मैं उन्हें मेरी लिखी किसी भी ब्लौग पोस्ट या ई-बुक को किसी भी रूप में उपयोग के लिए पूर्ण अनुमति देता हूँ. वे किसी भी फॉर्मेट में उसका उपयोग कर सकते हैं.

अब से मुझे ई-मेल भेजकर कोई अनुमति मांगने की आवश्यकता नहीं है. आप इसका जैसा चाहें वैसे उपयोग करें. ई-मेल करें, कॉपी करके फौरवर्ड करें, मुद्रित करें – मुझे इसका क्रेडिट भी न दें. चाहें तो इसमें फेरबदल करें, कुछ वाहियात बातें इसमें शामिल करके मुझे उसका क्रेडिट दे दें तो भी चलेगा. मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है.

क्रेडिट और भुगतान के बारे में क्या? – हांलाकि आपपर ऐसा करने की बाध्यता नहीं है फिर भी मुझे अच्छा लगेगा यदि आप मेरे लेखों के लिए मुझे क्रेडिट दें और बेहतर हो तो मूल सामग्री का लिंक भी उपलब्ध कर दें. यदि आप मेरी ई-बुक के प्रचार में सहयोग देना चाहते हैं तो कमीशन की बात भी की जा सकती है. मैं चाहता हूँ कि लोग मेरी ई-बुक खरीदें लेकिन यदि वे इसकी कॉपी करके इसे अपने दोस्तों को भेज देते हैं तो उन्हें ऐसा करने का अधिकार है.

मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ? - मुझे कॉपीराइट कानून उचित नहीं लगते. इनका सहारा लेकर बड़े-बड़े कारपोरेशन सामान्य जनता पर अंकुश लगते हैं ताकि वे अपना भारी लाभ कमाना जारी रख सकें.

कॉपीराइट कानूनों के लिए यह दलील दी जाती है कि उनसे रचनाकार (लेखक, ब्लौगर, कलाकार, वैज्ञानिक, आदि) के हितों की रक्षा होती है लेकिन अधिकतर मामलों में रचनाकार को कोई खास मुनाफा नहीं होता बल्कि कारपोरेशन मलाई मार ले जाते हैं. मैं यह प्रयोग इसलिए भी कर रहा हूँ ताकि मुझे यह पता चल सके कि कॉपीराइट से मुक्त हो जाने पर रचनाकार को वाकई कोई हानि होती है या नहीं.

मुझे लगता है कि यह संरक्षणवाद वास्तव में ‘एंटी-पायरेसी’ आन्दोलन और इससे जुड़े कानूनविदों और मठाधीशों द्वारा पाला-पोसा जा रहा है. रचनाकार को वास्तव में इससे कोई लाभ नहीं है. मुनाफा बढ़ाने के लिए किसी रचना को सीमित मात्र में जारी करना बढ़िया विचार नहीं है.

कॉपीराइट कानूनों की अनुपस्थिति और दूसरे कलाकारों और उद्यमियों द्वारा भरपूर कॉपी किये जाने पर भी लेओर्नादो द विन्ची को कोई नुकसान नहीं हुआ. उनकी मोनालिसा, लास्ट सपर, और ऐसी ही अनेक महान पेंटिंग्स इसकी गवाह हैं. शेक्सपीयर को भी कोई घाटा नहीं सहना पड़ा. हो सकता है कि मेरा ज्ञान कुछ कम होने के कारण मैं ज्यादा मजबूत तर्क नहीं जुटा पा रहा हूँ लेकिन मुझे यह लगता है कि किसी भी रचनाकार को कॉपीराइट उल्लंघन से नुकसान नहीं होता.

और फिर मैं कोई लेओर्नादो द विन्ची या शेक्सपीयर नहीं हूँ फिर भी मुझे यह सोचना मुश्किल लगता है कि अपनी रचनाओं को कॉपीराइट मुक्त कर देने से मुझे कोई लाभ हुआ है या नहीं. यदि कोई मेरे ब्लौग का कोई अंश कॉपी करके अपने ब्लौग या किसी अन्य माध्यम में उसका उपयोग करता है तो मुझे इससे ख़ुशी मिलती है. यदि कोई मेरी ई-बुक अपने 100 दोस्तों के साथ शेयर करता है तो इसमें भी मुझे कोई तकलीफ नहीं होती. मुझे लगता है कि मेरा रचनासंसार व्यापक हो गया है. मैं अकेले के दम पर तो इतने सारे लोगों तक नहीं पहुँच सकता था न? यह तो एक प्लस पॉइंट है.

और यदि कोई मेरे लेख को कॉपी करके उसमें अपेक्षित सुधार कर देता है तो यह मेरे लिए बहुत ख़ुशी की बात है. ऐसा तो कलाकार सदियों से करते आये हैं. यदि वे मेरी फेवरिट पोस्ट को लेकर उसे ज्यादा मजेदार, प्रेरणादायक, विचारोत्तेजक, और यहाँ तक कि अधिक मार्मिक बना देते हैं तो मैं उनके प्रति नाराजगी अपने मन में क्यों रखूं. रचनाशील समुदाय में सभी एक दूसरे के कार्य में सुधार या परिवर्तन करके ही तो सीखते हैं.

कॉपीराइट मुक्त करने के विरुद्ध तर्क - कॉपीराइट मुक्त करने के विचार के विरोध में अक्सर कुछ तर्क दिए जाते हैं. उनमें से अधिकांश या सारे तर्कों का तो मैं  निराकरण नहीं कर सकता लेकिन मेरी समझ में निम्नलिखित बातें सामने आती हैं :-

1. गूगल पेजरैंक कम हो जाएगी - जहां तक पेजरैंक की बात है, मेरी जानकारी यह है कि गूगल उन वैबपेजों के विरुद्ध कार्रवाई करता है जिनकी हूबहू सामग्री किसी अन्य वैबपेज पर उपलब्ध रहती है. उनके विरुद्ध गूगल क्या कार्रवाई करता है इसकी मुझे जानकारी नहीं है. यदि लोग मुझसे अनुमति लिए बिना मेरी सामग्री कॉपी कर रहे हैं तो यह संभव है कि मेरी पेजरैंक कुछ कम हो जाएगी सर्च करने पर मेरा लिंक पीछे आएगा. ऐसा है तो मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं है. मैं अपने ब्लॉग के लिए कोई सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन तकनीक का प्रयोग नहीं करता हूं इसलिए मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

2. मेरी ई-बुक से आय कम हो जाएगी - मेरे अनुमान से मेरी ई-बुक खरीदकर कोई इसे अपने 20 दोस्तों को भेज देता है और उनमें से प्रत्येक अपने 20 दोस्तों को इसे भेज देता है और वे 20 अपने 20 दोस्तों को… तो मुझे अब तक $76,000 का घाटा हो चुका है. ऐसा तब होता यदि उन सबने मेरी ई-बुक खरीदी होती. इस बात में कोई दम नहीं है. दूसरी ओर, यदि मैं अपनी ई-बुक को मुफ्त में ही बांटता तो हजारों लोग उसे पढ़ते और ज़ेन-हैबिट्स के बारे में जानकारी पाते. कोई भी रचनाकार दूसरी स्थिति में अधिक संतोष का अनुभव करेगा.

3. लोग जाने मेरी रचनाओं का क्या करते होंगे! - कोई मेरी रचना को कॉपी करके उसे निहायत ही घटिया रूप में प्रस्तुत कर सकता है. कोई उसका बहुत बेहूदा अनुवाद कर सकता है. कोई उसे… और क्या कहूं. कोई भी उसके साथ कुछ भी कर सकता है. ऐसी सोच उस दिमाग से उठती है जो सब कुछ अपने हांथों में रखना चाहता है. मेरा मानना यह है कि आप कोई नियंत्रण लागू नहीं कर सकते. यदि आप कर सकते हों तो भी यह अच्छी बात नहीं है. क्या हो अगर कोई मेरा काम चुराकर उसे शानदार रचना में बदल दे और जगप्रसिद्ध हो जाए? और क्या हो यदि कोई मेरा लिखा कॉपी करके उसके विचार को नया आयाम दे दे, अधिक उपयोगी बना दे, अधिक लोगों तक उसे पहुंचा दे!

नियंत्रण छोड़िए और देखिए कि क्या होता है. दुनिया में बहुत रचनाशील लोग हैं. देखिये वे आपकी रचना के साथ क्या करते हैं.

4.  इससे दूसरे ब्लौगरों को बुरा समझा जायेगा - यदि आप नकारात्मक दिशा में सोच रहे हैं तो यह संभव है. लेकिन मैं ऐसा उन्हें चैलेन्ज देने के लिए या उनकी नीतियों के विरोध में नहीं कर रहा हूँ. यह तो केवल मेरे जीवन मूल्यों के प्रति मेरी आस्था है. और कौन जानता है दूसरे भी मेरे विचार से किसी-न-किसी रूप में प्रभावित हो जाएँ, या शायद न हों. चाहे जो हो, मैं जो कुछ कर रहा हूँ उसके आधार पर दूसरों का निर्णय नहीं किया जाना चाहिए.

5. कभी मेरी कोई किताब छपी तो क्या होगा? - यदि कभी किसी बड़े प्रकाशक ने मेरी किताब छापी तो संभवतः मैं कॉपीराइट मुक्त नहीं कर पाऊँगा. वह तो प्रिंट माध्यम में मेरी पुस्तक छपने के एवज में होगा न, जो कि हमेशा से मेरा सपना रहा है! यदि आपको यह लग रहा है कि मैं अपनी ही बात से फिर रहा हूँ तो ठीक है, ऐसा भी होता है.

6. यदि किसी ने मेरी सामग्री का उपयोग करके किताब छापकर कमाई कर ली तो? - ऐसे में मुझे उम्मीद है कि वे कम-से-कम मुझे उसका क्रेडिट तो देंगे ही. तब मैं यह भी चाहूँगा कि वे अपनी आय में से कुछ अंश भले कामों में लगाने के लिए दान में दें.

7. लेकिन वे तो पोस्टों को चुरा ही रहे हैं! - जिसे आप मुफ्त में ही दे रहे हों उसे कोई चुरा नहीं सकता. ये चीज़ों को शेयर करना है, पायरेसी नहीं.

प्रेरणा : फ्री कल्चर (लौरेंस लेसिंग) और ग्नू (रिचर्ड स्टालमैन)

पुनश्च : स्पष्ट किया जाता है कि इस पोस्ट के छपने के बाद से मेरी सभी रचनाएँ अब पब्लिक डोमेन में हैं. मैं अपनी रचनाओं से सभी प्रकार की कॉपीराइट शर्तें हटाता हूँ. उन्हें किसी भी रूप में मुझे सूचित किये बिना प्रयुक्त किया जा सकता है. क्रेडिट देने का आभार माना जायेगा. (लियो बबौटा)

निशांत मिश्र : लियो बबौटा के ब्लॉग से कोई भी लेख कॉपी करके कहीं भी/कैसे भी उपयोग करने की छूट है. हिंदीज़ेन ब्लॉग से कोई भी लेख कॉपी करने वालों से निवेदन है कि कृपया लेख के स्त्रोत की लिंक अवश्य उपलब्ध कराएँ. यह ब्लॉग बहुत नया है, कृपया इसके प्रचार-प्रसार में सहायक बनें.

(A post about the principles of uncopyright- Leo Babauta – in Hindi)

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