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आदर्श राज्य का निर्माण

laotzuचीन में एक समय चोरों का बड़ा आतंक था. राज्य की राजधानी में ची युंग नामक एक व्यक्ति था जो किसी भी व्यक्ति का चेहरा देखकर यह बता देता था कि वह व्यक्ति चोर है या नहीं. सामनेवाले व्यक्ति के मुखमंडल के कुछ लक्षणों और उसके मन में चल रहे भावों को पढने में उसे महारत हासिल थी. उसका यह कौशल देखकर वहां के राजा ने उसे राज्य के नागरिकों के निरीक्षण में लगा दिया. ची युंग ने हजारों नागरिकों को देखा और उनमें से चोरों की पहचान कर ली. ची युंग ने चोरों को ढूंढ निकाला और राज्य में सर्वत्र खुशहाली छा गई.

राजा ने लाओ-त्ज़ु से ची युंग की बड़ी तारीफ की और कहा – “ची युंग ने अकेले ही राज्य को चोरों-डाकुओं से रिक्त कर दिया है. मेरे राज्य में अब हर तरफ शांति है. ची युंग के कारण मुझे न्याय-व्यवस्था पर कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता.”

लाओ-त्ज़ु ने कहा – “यदि आप जैसे शासक ऐसे व्यक्तियों को न्याय-व्यवस्था की कमान सौंप देंगे तो आपका राज्य चोरों और डाकुओं से कभी भी मुक्त नहीं हो पायेगा. इसके अतिरिक्त, ची युंग के इस तथाकथित गुण के कारण वह एक दिन घोर संकट में पड़ जायेगा. उसके प्राण भी जा सकते हैं.”

उसी समय राज्य में कहीं दूर चोरों और डाकुओं का एक दल ची युंग के विरुद्ध षड़यंत्र कर रहा था. उन्होंने उसे अपने मार्ग से हटाने की योजना बना ली. एक दिन उन्होंने ची युंग का अपहरण कर लिया और उसे मौत के घाट उतार दिया.

राजा ने जब यह सुना तो वह अत्यंत भयभीत हो गया. वह दौड़ा-दौड़ा लाओ-त्ज़ु के पास गया और उससे बोला – “आपकी आशंका सत्य सिद्ध हो गई. ची युंग की हत्या हो गई है. अब मेरे राज्य की सुरक्षा खतरे में है.”

लाओ-त्ज़ु ने कहा – “एक पुरानी कहावत है, ‘अथाह समुद्र के तल में मछली पकड़ने वाले और गुप्त रहस्यों को व्यर्थ ही ढूँढने वाले अपने विनाश को निमंत्रण देते हैं’. यदि आप चोरों और डाकुओं से मुक्ति पाना चाहते हैं तो प्रशासन में सज्जन व्यक्तियों की नियुक्ति करें. उन्हें निर्देश दें कि वे अपने से ऊपर वालों को मार्गदर्शन दें और अपने से नीचे वालों को शिक्षित करें. जब लोग विधि और नियमों का पालन करने लगेंगे तो आपके राज्य में चोरों-डाकुओं के बनने का मार्ग स्वतः बंद हो जायेगा.”

राजा ने लाओ-त्ज़ु के बताये अनुसार प्रशासन में सुधार किये और धीरे-धीरे उसका राज्य आदर्श राज्य बन गया.

चित्र साभार – फ्लिकर
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आनंद के चार कारण


लाओ-त्ज़ु एक मोटा फ़र का कोट पहनकर अपनी कमर पर एक रस्सी से उसे बांधकर अपने बैल पर यहाँ से वहां घूमता रहता था। अक्सर वह छोटे से इकतारे पर आनंद विभोर होकर गीत गाने लगता। एक दिन किसी ने उससे पूछा – “तुम इतने खुश क्यों हो?”

लाओ-त्ज़ु ने उत्तर दिया – “मैं चार कारणों से खुश हूँ। पहला यह है कि मैं एक मनुष्य हूँ और मनुष्य होने के नाते मैं उन सारी वस्तुओं और पदार्थों का उपभोग कर सकता हूँ जो केवल मनुष्यों को ही उपलब्ध हैं। दूसरा कारण यह है कि पुरूष होने के नाते मैं स्त्रियों की सुन्दरता का बखान कर सकता हूँ। तीसरा यह कि अब मैं बूढा हो गया हूँ और इस कारण मैं कम उम्र में मर जाने वालों की तुलना में अधिक जानता हूँ और ज्यादा दुनिया देख चुका हूँ। और चौथा और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि चूँकि अब मैं मरने के लिए तैयार हूँ इसलिए मुझे किसी प्रकार का भय और चिंता नहीं है।”

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मनहूस पेड़

एक आदमी के बगीचे में एक पेड़ था। बगीचा छोटा था और पेड़ ने उसे पूरी तरह से ढंक रखा था। एक दिन आदमी के पड़ोसी ने उससे कहा – “ऐसे पेड़ मनहूस होते हैं। तुम्हें इसे काट देना चाहिए।” आदमी ने पेड़ को काट दिया और उसके जलावन के लठ्ठे बना दिए। लठ्ठे इतने ज्यादा थे कि पूरा बगीचा उनसे भर गया। बगीचे के पौधे और फूल लठ्ठों के नीचे दबकर ख़राब होने लगे। आदमी के पड़ोसी ने उससे कहा – “इन लठ्ठों को मैं ले लेता हूँ ताकि तुम्हारे पौधे और फूल सही-सलामत रहें।”

कुछ दिनों के बाद आदमी के मन में विचार आया – “शायद मेरा पेड़ मनहूस नहीं था। जलावन की लकड़ी के लालच में आकर पड़ोसी ने मेरा अच्छा-भला पेड़ कटवा दिया।” – वह लाओ-त्ज़ु के पास इस बारे में राय लेने के लिए गया। लाओ-त्ज़ु ने मुस्कुराते हुए कहा – “जैसा कि तुम्हारे पड़ोसी ने कहा था, वह पेड़ वास्तव में मनहूस था क्योंकि उसे अब काटकर जलाया जा चुका है। यह उस पेड़ का दुर्भाग्य ही था कि वह तुम जैसे मूर्ख के बगीचे में लगा था।”

यह सुनकर आदमी बहुत दुखी हो गया। लाओ-त्ज़ु ने उसे सांत्वना देते हुए कहा – “अच्छी बात यह है कि तुम अब उतने मूर्ख नहीं हो; तुमने पेड़ को तो खो दिया लेकिन एक कीमती सबक सीख लिया है। इस बात को हमेशा ध्यान में रखना कि जब तक तुम स्वयं अपनी समझ पर भरोसा न कर लो तब तक किसी दूसरे की सलाह नहीं मानना।”

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मछली पकड़ने की कला

लाओ-त्ज़ु ने एक बार मछली पकड़ना सीखने का निश्चय किया। उसने मछली पकड़ने की एक छड़ी बनाई, उसमें डोरी और हुक लगाया। फ़िर वह उसमें चारा बांधकर नदी किनारे मछली पकड़ने के लिए बैठ गया। कुछ समय बाद एक बड़ी मछली हुक में फंस गई। लाओ-त्ज़ु इतने उत्साह में था की उसने छड़ी को पूरी ताक़त लगाकर खींचा। मछली ने भी भागने के लिए पूरी ताक़त लगाई। फलतः छड़ी टूट गई और मछली भाग गई।

लाओ-त्ज़ु ने दूसरी छड़ी बनाई और दोबारा मछली पकड़ने के लिए नदी किनारे गया। कुछ समय बाद एक दूसरी बड़ी मछली हुक में फंस गई। लाओ-त्ज़ु ने इस बार इतनी धीरे-धीरे छड़ी खींची कि वह मछली लाओ-त्ज़ु के हाथ से छड़ी छुडाकर भाग गई।

लाओ-त्ज़ु ने तीसरी बार छड़ी बनाई और नदी किनारे आ गया। तीसरी मछली ने चारे में मुंह मारा। इस बार लाओ-त्ज़ु ने उतनी ही ताक़त से छड़ी को ऊपर खींचा जितनी ताक़त से मछली छड़ी को नीचे खींच रही थी। इस बार न छड़ी टूटी न मछली हाथ से गई। मछली जब छड़ी को खींचते-खींचते थक गई तब लाओ-त्ज़ु ने आसानी से उसे पानी के बाहर खींच लिया।

उस दिन शाम को लाओ-त्ज़ु ने अपने शिष्यों से कहा – “आज मैंने संसार के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत का पता लगा लिया है। यह समान बलप्रयोग करने का सिद्धांत है। जब यह संसार तुम्हें किसी ओर खींच रहा हो तब तुम समान बलप्रयोग करते हुए दूसरी ओर जाओ। यदि तुम प्रचंड बल का प्रयोग करोगे तो तुम नष्ट हो जाओगे, और यदि तुम क्षीण बल का प्रयोग करोगे तो यह संसार तुमको नष्ट कर देगा।”

(A Tao story of Lao-tzu – Fishing and Life – in Hindi)

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