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तीन उत्तर – Three Answers

चेन ज़िकिन ने कन्फ्यूशियस के पुत्र से पूछा, “क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हें ऐसा कुछ भी सिखाया है जो हम नहीं जानते?”

“नहीं”, कन्फ्यूशियस के पुत्र ने कहा, “लेकिन एक बार जब मैं अकेला था तो उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कविता पढ़ता हूँ या नहीं. मेरे ‘ना’ करने पर वे बोले कि मुझे कविता पढ़ना चाहिए क्योंकि यह आत्मा को दिव्य प्रेरणा के पथ पर अग्रसर करती है”.

“और एक बार उन्होंने मुझसे देवताओं को अलंकृत करने की रीतियों के बारे में पूछा. मैं यह नहीं जानता था इसलिए उन्होंने मुझे इसका अभ्यास करने के लिए कहा   ताकि देवताओं को अलंकृत करने से मैं स्वयं का बोध भी कर सकूं. लेकिन उन्होंने यह देखने के लिए मुझपर नज़र नहीं रखी कि मैं उनकी आज्ञाओं का पालन कर रहा हूँ या नहीं.”

वहां से चलते समय चेन ज़िकिन ने मन-ही-मन में कहा:

“मैंने उससे एक प्रश्न पूछा और मुझे तीन उत्तर मिले. मैंने काव्य के बारे में कुछ जाना. मुझे देवताओं को अलंकृत करने के विषय में भी ज्ञान मिला. और मैंने यह भी सीखा कि ईमानदार व्यक्ति दूसरों की ईमानदारी की छानबीन नहीं करते”.

Chen Ziqin asked Confucius’s son: “does your father teach you something that we don’t know?”

The other answered: “No. Once, when I was alone, he asked if I read poetry. I said no, and he told me to read some, because poetry opens the soul to the path of divine inspiration.

“On another occasion he asked whether I practiced the rituals of adoration of God. I said no, and he told me to do so, because the act of adoring would make me understand myself. But he never kept an eye on me to see if I was obeying him.”

When Chen Ziqin left, he said to himself:

“I asked one question and was given three answers. I learned something about poetry. I learned something about the rituals of adoration. And I learned that an honest man never spies on the honesty of others.”

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उपाय

ज़िज्हांग पूरे चीन में कन्फ्यूशियस को खोज रहा था. देश बहुत बड़े उतार-चढ़ाव से गुज़र रहा था और सभी के मन में अराजकता और रक्तपात का भय समाने लगा था.

उसने कन्फ्यूशियस को बरगद के पेड़ के नीचे ध्यानमग्न देखा.

“मास्टर! हम चाहते हैं कि आप सरकार की सहायता करें. आपके मार्गदर्शन के बिना यह देश बिखर जाएगा”

कन्फ्यूशियस बस मुस्कुरा दिया.

“मास्टर, आपने हमें हमेशा कर्म करने की ही शिक्षा दी है”, ज़िज्हांग ने कहा, “आपने ही यह बताया है कि देश और दुनिया के प्रति हमारे क्या कर्तव्य हैं!”

“मैं देश के लिए प्रार्थना कर रहा हूं”, कन्फ्यूशियस ने कहा, “और उसके बाद मैं मोहल्ले के व्यक्तियों की मदद करने के लिए जाऊँगा. अपनी सीमाओं और परिवेश के भीतर रहकर ज़रूरी काम करके हम सभी का हित कर सकते हैं.”

“यदि हम दुनिया को बचाने के उपाय ही खोजते रहेंगे तो हमारे हाथ कुछ नहीं आएगा. हम अपनी सहायता भी नहीं कर पायेंगे.”

“राजनीति से सम्बद्ध होने के सैंकड़ों तरीके हैं, उसके लिए मुझे सरकार का अंग बनने की आवश्यकता नहीं है”.

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