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Posts tagged ‘Chuang Tzu’

बुद्धिमान बालक


stop eating animalsकिसी नगर में रहनेवाला एक धनिक लम्बी तीर्थयात्रा पर जा रहा था। उसने नगर के सभी लोगों को यात्रा की पूर्वरात्रि में भोजन पर आमंत्रित किया। सैंकडों लोग खाने पर आए। मेहमानों को मछली और मेमनों का मांस परोसा गया। भोज की समाप्ति पर धनिक सभी लोगों को विदाई भाषण देने के लिए खड़ा हुआ। अन्य बातों के साथ-साथ उसने यह भी कहा – “परमात्मा कितना कृपालु है कि उसने मनुष्यों के खाने के लिए स्वादिष्ट मछलियाँ और पशुओं को जन्म दिया है”। सभी उपस्थितों ने धनिक की बात में हामी भरी।

भोज में एक बारह साल का लड़का भी था। उसने कहा – “आप ग़लत कह रहे हैं।”

लड़के की बात सुनकर धनिक आश्चर्यचकित हुआ। वह बोला – “तुम क्या कहना चाहते हो?”

लड़का बोला – “मछलियाँ और मेमने एवं पृथ्वी पर रहनेवाले सभी जीव-जंतु मनुष्यों की तरह पैदा होते हैं और मनुष्यों की तरह उनकी मृत्यु होती है। कोई भी प्राणी किसी अन्य प्राणी से अधिक श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण नहीं है। सभी प्राणियों में बस यही अन्तर है कि अधिक शक्तिशाली और बुद्धिमान प्राणी अपने से कम शक्तिशाली और बुद्धिमान प्राणियों को खा सकते हैं। यह कहना ग़लत है कि ईश्वर ने मछलियों और मेमनों को हमारे लाभ के लिए बनाया है, बात सिर्फ़ इतनी है कि हम इतने ताक़तवर और चालक हैं कि उन्हें पकड़ कर मार सकें। मच्छर और पिस्सू हमारा खून पीते हैं तथा शेर और भेड़िये हमारा शिकार कर सकते हैं, तो क्या ईश्वर ने हमें उनके लाभ के लिए बनाया है?”

च्वांग-त्ज़ु भी वहां पर मेहमानों के बीच में बैठा हुआ था। वह उठा और उसने लड़के की बात पर ताली बजाई। उसने कहा – “इस एक बालक में हज़ार प्रौढों जितना ज्ञान है।”

राजा और धर्मात्मा का संवाद


च्वांग-त्जु एक बार एक राजा के महल में उसका आतिथ्य स्वीकार करने गया। वे दोनों प्रतिदिन धर्म-चर्चा करते थे। एक दिन राजा ने च्वांग-त्जु से कहा – “सूरज के निकलने पर दिए बुझा दिए जाते हैं। बारिश होने के बाद खेत में पानी नहीं दिया जाता। आप मेरे राज्य में गए हैं तो मुझे शासन करने की आवश्यकता नहीं है। मेरे शासन में हर तरफ़ अव्यवस्था है, पर आप शासन करेंगे तो सब कुछ व्यवस्थित हो जाएगा।

च्वांग-त्जु ने उत्तर दिया – “तुम्हारा शासन सर्वोत्तम नहीं है पर बुरा भी नहीं है। मेरे शासक बन जाने पर लोगों को यह लगेगा कि मैंने शक्ति और संपत्ति के लालच में राज करना स्वीकार कर लिया है। उनके इस प्रकार सोचने पर और अधिक अव्यवस्था फैलेगी। मेरा राजा बनना वैसे ही होगा जैसे कोई अतिथि के भेष में घर का मालिक बन बैठे।

राजा को यह सुनकर निराशा हुई। च्वांग-त्जु ने कहा – “चिड़िया घने जंगल में अपना घोंसला बनाती है पर पेड़ की एक डाल ही चुनती है। पशु नदी से उतना ही जल पीते हैं जितने से उनकी प्यास बुझ जाती है। भले ही कोई रसोइया अपने भोजनालय को साफ़-सुथरा नहीं रखता हो पर कोई पुजारी उसका स्थान नहीं ले सकता।

अमरता का रहस्य


immortalityकिसी गाँव में एक वैद्य रहता था जो यह दावा करता था कि उसे अमरता का रहस्य पता है। बहुत से लोग उसके पास यह रहस्य मालूम करने के लिए आते थे। वैद्य उन सभी से कुछ धन ले लेता और बदले में उनको कुछ भी अगड़म-बगड़म बता देता था। उनमें से कोई यदि बाद में मर जाता था तो वैद्य लोगों को यह कह देता था कि उस व्यक्ति को अमरता का रहस्य ठीक से समझ में नहीं आया।

उस देश के राजा ने वैद्य के बारे में सुना और उसको लिवा लाने के लिए एक दूत भेजा। किसी कारणवश दूत को यात्रा में कुछ विलंब हो गया और जब वह वैद्य के घर पहुँचा तब उसे समाचार मिला कि वैद्य कुछ समय पहले चल बसा था।

दूत डरते-डरते राजा के महल वापस आया और उसने राजा से कहा कि उसे यात्रा में विलंब हो गया था और इस बीच वैद्य की मृत्यु हो गई। राजा यह सुनकर बहुत क्रोधित हो गया और उसने दूत को प्राणदंड देने का आदेश दे दिया।

च्वांग-त्जु ने दूत पर आए संकट के बारे में सुना। वह राजा के महल गया और उससे बोला – “आपके दूत ने पहुँचने में विलंब करके गलती की पर आपने भी उसे वहां भेजने की गलती की। वैद्य की मृत्यु यह सिद्ध करती है की उसे अमरता के किसी भी रहस्य का पता नहीं था अन्यथा उसकी मृत्यु ही नहीं हुई होती। रहस्य सिर्फ़ यही है कि ऐसा कोई भी रहस्य नहीं है। केवल अज्ञानी ही ऐसी बातों पर भरोसा कर बैठते हैं।

राजा ने दूत को क्षमादान दे दिया और मरने-जीने की चिंता से मुक्त होकर जीवन व्यतीत करने लगा।

अँधा बढ़ई


किसी गाँव में एक आदमी बढ़ई का काम करता था। ईमानदारी से काम करके वह जितनी भी कमाता था उसमें वह और उसका परिवार गुज़ारा कर लेते थे। उसकी पत्नी और बच्चे संतुष्ट रहते थे पर स्वयं बढ़ई के मन में असंतोष व्याप्त रहता था। वह स्वयं से कहता – “मैं बहुत गरीब हूँ और अपने परिवार को खुश नहीं रख पाता। अगर मेरे पास कुछ सोना आ जाए तो मैं और मेरा परिवार बहुत सुख से रहेंगे।”

एक दिन वह बाज़ार से गुज़र रहा था। एक सुनार की दुकान पर उसने बिक्री के लिए रखे गए सोने के जेवर देखे। वह उन्हें बड़ी लालसा से देखता रहा और अचानक ही उसने एक जेवर उठा लिया और उसे ले भागा। दुकानदार यह देखकर चिल्लाया और आसपास खड़े लोग बढ़ई के पीछे भागने लगे। शोर सुनकर कुछ सिपाही भी वहां आ पहुंचे और सभी ने बढ़ई को घेरकर पकड़ लिया। उसे पकड़कर थाने ले गए और जेल में बंद कर दिया।

च्वांग-त्ज़ु उसे देखने के लिए गया और उसने उससे पूछा – “इतने सारे लोगों के आसपास होते हुए भी तुमने जेवर चुराने का प्रयास क्यों किया?”

बढ़ई बोला – “उस समय मुझे सोने के सिवाय कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।”

च्वांग-त्ज़ु सुनार के पास गया और उससे बोला – “जिस व्यक्ति ने तुम्हारा जेवर चुराया वह स्वभाव से बुरा आदमी नहीं है। उसके लोभ ने उसे अँधा बना दियाऔर सभी अंधे व्यक्तियों की तरह हमें उसकी भी सहायता करनी चाहिए। मैं चाहता हूँ की तुम उसे जेल से मुक्त करवा दो।”

सुनार इसके लिए सहमत हो गया। बढ़ई को रिहा कर दिया गया। च्वांग-त्ज़ु एक महीने तक हर दिन उसके पास जाकर उसे ‘जो मिले उसी में संतुष्ट रहने’ का ज्ञान देता था।

अब बढ़ई को सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगा।

The Useless Tree – अनुपयोगी वृक्ष


एक दिन एक व्यक्ति ने च्वांग-त्जु से कहा – “मेरे घर के आँगन में एक बहुत बड़ा वृक्ष है जो बिल्कुल ही बेकार है। इसका तना इतना कठोर और ऐंठा हुआ है कि कोई भी लकड़हारा या बढ़ई उसे काट नहीं सकता। उसकी शाखाएं इतनी मुडी हुई हैं कि उनसे औजारों के लिए हत्थे नहीं बनाये जा सकते। ऐसे वृक्ष के होने से क्या लाभ?”

च्वांग-त्जु ने कहा – “क्या तुमने नदी में उछलने वाली मछलियाँ देखी हैं? वे बहुत छोटी और चंचल होती हैं। जल की सतह पर उड़ते कीडों और टिड्डों को देखते ही वे लपक कर उन्हें अपना शिकार बना लेती हैं। लेकिन ऐसी मछलियाँ ज्यादा समय तक जीवित नहीं रहतीं। या तो वे जाल में फंस जाती हैं या दूसरी मछलियों द्वारा मारी जाती हैं। वहीं दूसरी और याक कितना बड़ा और बेढब जानवर है। वह न तो खेत में काम करता है न ही कोई और काम अच्छे से कर पता है। लेकिन याक बहुत लंबा जीते हैं। तुम्हारा वृक्ष इतना अनुपयोगी होने के कारण ही इतने लंबे समय से खड़ा है। उसकी शाखाओं के नीचे बैठकर उसका ध्यान करो।”

(A story of a useless tree – Chang-tzu – in Hindi)

Hui Tzu said to Chuang, “I have a big tree, the kind they call a “stinktree.” The trunk is so distorted, so full of knots, no one can get a straight plank out of it. The branches are so crooked you cannot cut them up in any way that makes sense.”

“There it stands beside the road. No carpenter will even look at it. Such is your teaching – big and useless.”

Chuang Tzu replied, “Have you ever watched the wildcat crouching, watching his prey. The prey leaps this way, and that way, high and low, and at last lands in the trap. And have you seen the Yak? Great as a thundercloud, he stands in his might. Big? Sure, but he can’t catch mice!”

“So for your big tree, no use? Then plant it in the wasteland, in emptiness. Walk idly around it, rest under its shadow. No axe or bill prepares its end. No one will ever cut it down.”

“Useless? You should worry!”

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