Tag Archives: गुरु-शिष्य

मन और पत्थर

एक ज़ेन शिष्य ने गुरु से प्रश्न किया, “ज़ेन में ऐसा क्या है जो बहुत बुद्धिमान लोग भी इसे समझ नहीं पाते?” ज़ेन गुरु उठे, उन्होंने एक पत्थर उठाया और पूछा, “यदि झाड़ियों से एक शेर निकलकर हमारी ओर बढ़ने … Continue reading

13 Comments

Filed under Zen Stories

प्रवाह

एक ज़ेन शिष्य ने गुरु से पूछा, “क्या आप मुझे जीवन में सदैव काम आनेवाली सलाह देंगे?” गुरु ने कहा, “अवश्य, हर परिस्थिति के अनुरूप स्वयं में परिवर्तन लाते रहो.” शिष्य ने कहा, “हम्म… क्या आप मुझे कुछ सरल सलाह … Continue reading

7 Comments

Filed under Zen Stories

घृणा

एक ज़ेन संन्यासी ने अपने गुरु से पूछा, “हमें अपने शत्रुओं से कैसा व्यवहार करना चाहिए?” गुरु ने कहा, “तुम अपने शत्रुओं से केवल घृणा ही कर सकते हो?” शिष्य ने अचरज से कहा, “ऐसा कहकर क्या आप घृणा का … Continue reading

12 Comments

Filed under Zen Stories

उचित-अनुचित

“क्या आप उचित-अनुचित में विश्वास करते हैं?”, युवक ज़ेन संन्यासी ने अपने गुरु से पूछा. गुरु ने उत्तर दिया, “नहीं, मैं इनमें विश्वास नहीं करता.” “लेकिन कल ही मैंने आपको एक निर्धन व्यक्ति को दान देते देखा. यदि आप उचित … Continue reading

11 Comments

Filed under Zen Stories

सिनेमा और ध्यान

एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, “मैं ग्रन्थ में विचारों को विराम देने, जगत से स्वयं का एकात्म्य अनुभव करने, और अपने शुद्ध वास्तविक स्वरूप को जानने के बारे में पढ़ता रहता हूँ. मैं यह सब बहुत बार पढ़ … Continue reading

15 Comments

Filed under Stories