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सत्य का धरातल : The Land of Truth


एक बार किसी आदमी को यह लगने लगा कि सामान्य जीवन में परिपूर्णता नहीं है और उसे सत्य की प्राप्ति करनी चाहिए. उसने ज्ञानी गुरु की खोज करना शुरू कर दिया. उसने बहुत से ग्रन्थ पढ़े, कई मठों में प्रवेश लिया, एक गुरु से दूसरे गुरु तक वह ज्ञान के शब्द सुनने के लिए भटकता रहा. उसने साधना और उपासना की वे पद्धतियाँ ही चुनीं जो उसे आकर्षक और सरल जान पडीं.

उसे कुछ आध्यांत्मिक अनुभव हुआ जिसने उसे भ्रमित कर दिया. अब वह जानना चाहता था कि वह आत्मज्ञान के मार्ग पर कितनी दूर आ गया है और उसकी साधना कब पूरी होगी.

अपने मन में ये विचार उमड़ते-घुमड़ते लिए हुए वह एक दिन परमज्ञानी माने जाने वाले गुरु के आश्रम तक चला आया. आश्रम के उद्यान में उसका सामना हज़रत खिद्र से हो गया. (हज़रत खिद्र लोगों को सत्य के मार्ग पर अग्रसर करनेवाले रहस्यमय गुरु हैं).

खिद्र उस आदमी को एक जगह ले गए जहाँ बहुत से लोग दुःख और पीड़ा में थे. खिद्र ने उन व्यक्तियों से पूछा कि वे कौन हैं. उन्होंने जवाब दिया – “हम वे साधक हैं जिन्होंने वास्तविक शिक्षाओं को ग्रहण नहीं किया. हम वे हैं जिन्होंने मिथ्या गुरु-ज्ञानियों पर आस्था लुटाई.”

फिर खिद्र आदमी को उस जगह पर ले गए जहाँ सभी प्रसन्नचित्त और सुखी प्रतीत हो रहे थे. उनसे भी खिद्र ने वही सवाल किया. वे बोले – “हम वे साधक हैं जिन्होंने सत्य के मार्ग को दर्शानेवाले चिह्नों का अनुसरण नहीं किया.”

“यदि तुम लोगों ने सत्य की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक चिह्नों का अनुसरण नहीं किया तो तुम आनंदमय क्यों कर हो?” – खिद्र ने उनसे पूछा.

“क्योंकि हमने सत्य के स्थान पर प्रसन्नता का चुनाव किया” – वे व्यक्ति बोले – “जिस प्रकार मिथ्या गुरु-ज्ञानियों में आस्था रखनेवालों ने दुःख का चुनाव किया था.”

“तो क्या सुख का आदर्श मनुष्य के लिए त्याज्य है?” – आदमी ने पूछा.

उन्होंने कहा – “मनुष्य का उद्देश्य सत्य की प्राप्ति है. सत्य के सामने सुख का मूल्य कुछ भी नहीं है. जिस व्यक्ति को सत्य मिल गया हो उसके लिए किसी मनोदशा का कोई महत्व नहीं है. हम सबने सत्य को ही सुख और सुख को ही सत्य मान लिया था और सभी ने हमपर विश्वास किया जिस प्रकार तुम भी अब तक यही मानते आये हो कि सत्य की अनुभूति परमसुख और आनंद की प्राप्ति से होती होगी. लेकिन सुख हो या दुःख, आनंद हो या पीड़ा, ये सभी अनुभूतियाँ ही हैं और तुम्हें बाँधकर ही रखतीं हैं.”

सहसा उस आदमी ने स्वयं को उद्यान में खिद्र के साथ खड़ा पाया.

खिद्र ने उससे कहा – “मैं तुम्हारी एक इच्छा पूरी कर सकता हूँ. मांगो, क्या मांगते हो.”

“मैं यह जानना चाहता हूँ कि मैं पथभ्रष्ट क्यों हो गया और मुझे सफलता कब मिलगी” – आदमी ने कहा.

खिद्र बोले – “तुमने अपना पूरा जीवन व्यर्थ कर दिया क्योंकि तुम झूठा जीवन जीते आये हो. सत्य को खोजने के स्थान पर तुम केवल अपनी इच्छाओं को ही इस झूठ के जरिये पूरा करते आये हो.”

“फिर भी मैं उस अवस्था तक पहुँच गया कि आप मुझे मिल गए” – आदमी ने कहा – “ऐसा तो शायद ही किसी और के साथ हुआ होगा!?”

“हाँ, तुम मुझे मिल गए क्योंकि तुम्हारे भीतर केवल सत्य के लिए ही सत्य को पाने की चाह थी, भले ही वह कभी एक क्षण के लिए ही रही हो. उस लेश मात्र ईमानदारी के कारण ही मैं तुम्हें दर्शन देने को बाध्य हो गया.” – खिद्र ने कहा.

इतना कुछ देख लेने के बाद अब आदमी के भीतर खुद को खो देने की कीमत पर भी सत्य को पाने की उत्कंठा तीव्र हो गयी.

खिद्र अपनी राह चल पड़े थे लेकिन आदमी भी उनके पीछे चल दिया.

“मेरे पीछे मत आओ” – खिद्र ने कहा – “क्योंकि मैं सामान्य जगत में प्रवेश करने जा रहा हूँ जो असत्य का राज्य है. मुझे वहीं होना चाहिए क्योंकि मुझे अभी बहुत काम करना बाकी है”

उस क्षण जब आदमी ने अपने चारों ओर देखा तो यह पाया कि वह खिद्र के साथ उद्यान में नहीं वरन सत्य के धरातल पर खड़ा था.

(इदरीस शाह की कहानी)

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A certain man believed that the ordinary waking life, as people know it, could not possibly be complete. He sought the real Teacher of the Age. He read many books and joined many circles, and he heard the words and witnessed the deeds of one master after another. He carried out the commands and spiritual exercises which seemed to him to be most attractive. He became elated with some of his experiences. At other times he was confused; and he had no idea at all of what his stage was, or where and when his search might end.

This man was reviewing his behaviour one day when he suddenly found himself near the house of a certain sage of high repute. In the garden of that house, he encountered Khidr, the secret guide who shows the way to truth.

Khidr took him to a place where he saw people in great distress and woe, and he asked who they were.

“We are those who did not follow real teachings, who were not true to our undertakings, who revered self-appointed teachers,” they said.

Then the man was taken by Khidr to a place where everyone was attractive and full of joy.

He asked who they were. “We are those who did not follow the real Signs of the Way,” they said.

“But if you have ignored the Signs, how can you be happy?” asked the traveler.

“Because we chose happiness instead of Truth,” said the people, “just as those who chose the self-appointed chose also misery.”

“But is happiness not the ideal of man?” asked the man. “The goal of man is Truth. Truth is more than happiness. The man who has Truth can have whatever mood he wishes, or none,” they told him. “We have pretended that Truth is happiness, and happiness Truth, and people have believed us, therefore you, too, have until now imagined that happiness must be the same as Truth. But happiness makes you its prisoner, as does woe.”

Then the man found himself back in the garden with Khidr beside him. “I will grant you one desire,” said Khidr. “I wish to know why I have failed in my search and how I can succeed in it,” said the man.

“You have all but wasted your life,” said Khidr, “because you have been a liar. Your lie has been in seeking personal gratification when you could have been seeking Truth.” “And yet I came to the point where I found you,” said the man, ” and that is something which happens to hardly anyone at all.”

“And you met me,” said Khidr, “because you had sufficient sincerity to desire Truth for its own sake, just for an instant. It was that sincerity, in that single instant, which made me answer your call.” Now the man felt an overwhelming desire to find Truth, even if he lost himself.

Khidr, however, was starting to walk away, and the man began to run after him. “You may not follow me,” said Khidr, “because I am returning to the ordinary world, the world of lies, for that is where I have to be, if I am to do my work.” And when the man looked around him again, he realized that he was no longer n the garden of the sage, but standing in the Land of Truth.

(A story by Idris Shah)

संयम और संगीत ही साधना है


सुबह जा चुकी है. धूप गर्म हो रही है और मन छाया में चलने को है.

एक वृद्ध अध्यापक आये हें. वर्षों से साधना में लगे हैं. तन सूख कर हड्डी हो गया है. आंखें धूमिल हो गयी हैं और गड्ढों में खो गयी हैं. लगता है कि अपनों ने बहुत सताया है और उस आत्मपीड़न को ही साधना समझते हैं.

प्रभु के मार्ग पर चलने को जो उत्सुकता है, उनमें अधिकतर का जीवन इसी भूल से विषाक्त हो जाता है. प्रभु को पाना संसार के निषेध का रूप ले लेता है, और आत्मा की साधना शरीर को नष्ट करने का. यह नकार दृष्टि उन्हें नष्ट कर देती है और उन्हें खयाल भी नहीं आ पाता है कि पदार्थ का विरोध परमात्मा के साक्षात का पर्याय नहीं हैं.

सच तो यह है कि देह के उत्पीड़क देहवादी होते हैं और संसार के विरोधी बहुत सूक्ष्म रूप से संसार से ही ग्रसित होते हैं.

संसार के प्रति भोग-दृष्टि जितनी बांधती है, विरोधी दृष्टि उससे कम नहीं बल्कि ज्यादा ही बांधती है. संसार और शरीर का विरोध नहीं वरन अतिक्रमण करना ही साधना है. वह दिशा न भोग की है और न ही दमन की है. वह दिशा दोनों से भिन्न है.

वह तीसरी दिशा है. वह दिशा संयम की है. दो बिंदुओं के बीच मध्य बिंदु खोज लेना संयम है. पूर्ण मध्य में जो है, वह अतिक्रमण है. वह कहने को ही मध्य में है, वह कुछ भोग और कुछ दमन नहीं है. वह न भोग है और न दमन है. वह समझौता नहीं, संयम है.

अति असंयम है, मध्य संयम है. अति विनाश है, मध्य जीवन है. जो अति को पकड़ता है, वह नष्ट हो जाता है. भोग और दमन दोनों जीवन को नष्ट कर देते हैं. अति ही अज्ञान है और अंधकार है, मृत्यु है.

मैं संयम और संगीत को साधना कहता हूं.

वीणा के तार जब न ढीले होते हैं और न कसे होते हैं, तब संगीत पैदा होता है. बहुत ढीले तार भी व्यर्थ हैं और बहुत कसे तार भी व्यर्थ हैं. पर तारों की एक ऐसी स्थिति भी होती है, जब वे न कसे कहे जा सकते और न ढीले कहे जा सकते हैं. वह बिंदु ही उनमें संगीत का बिंदु बनता है. जीवन में भी वही बिंदु संयम का है. जो नियम संगीत का है, वह संयम का है. संयम से सत्य मिलता है.

संयम की यह बात उनसे कही है और लगता है कि जैसे उसे उन्होंने सुना है. उनकी आंखें गवाही हैं. जैसे कोई सोकर उठा हो, ऐसा उनकी आंखों में भाव है. वे शांत और स्वस्थ प्रतीत हो रहे हैं. कोई तनाव जैसे शिथिल हो गया है और कोई दर्शन उपलब्ध हुआ है.

मैने जाते समय उनसे कहा, “सब तनाव छोड़ दें और फिर देखें. भोग छोड़ा है, दमन भी छोड़ दें. छोड़कर… सब छोड़कर देखें. सहज होकर देखें. सहजता ही स्वस्थ करती है, स्वभाव में ले जाती है.’

उन्होंने उत्तर में कहा, “छोड़ने को अब क्या रहा है? छूट ही गया. मैं शांत और निर्भार हो कर जा रहा हूं. एक दुख स्वप्न जैसे टूट गया है. मैं बहुत उपकृत हूं.” उनकी आंखें बहुत सरल और शांत हो गयी हैं और उनकी मुस्कराहट बहुत भली लग रही है. वे वृद्ध हैं, पर बिलकुल बालक लग रहे हैं.

काश, यह उन सभी को दीख सके जो प्रभु में उत्सुक होते हैं.

ओशो के पत्रों के संकलन ‘क्रांतिबीज’ से. प्रस्तुति – ओशो शेलेन्द्र

प्रसन्नता या शांति?


एक दिन बातों ही बातों में एक अन्तरंग मित्र यह पूछ बैठे, “तुम बहुत अच्छी बातें शेयर करते हो और तुमसे बातें करके अच्छा लगता है. लेकिन तुम हमेशा शांति की बात क्यों करते हो? प्रसन्नता, आनंद, और उत्सव की बात क्यों नहीं करते? वही सब तो हमें चाहिए? लोग चाहते हैं कि उनकी तकलीफें कम हों और जीवन में भरपूर आनंद हो. क्या प्रसन्नता की चाह रखना बुरी बात है?”

मेरे मित्र किसी गुरु के अधीन एक ध्यान समुदाय से जुड़े हैं जिसके सदस्य जीवन के आनंद की प्राप्ति के लिए कोई जप साधना आदि करते हैं. उस समय तो मैंने उन्हें यही कहकर टाल दिया कि मेरे लिए शांति अधिक महत्वपूर्ण विचार है पर बाद में विस्तार से सोचने पर मेरे मन में जो विचार आये उन्हें मैं आपसे शेयर करना चाहता हूँ.

यह सच है कि हम अपने हर उद्देश्य में सुख और प्रसन्नता की ही खोज करते हैं. संसार की बहुत सी समस्याओं से जूझते हुए हमारे मन में यही कामना सतत बनी रहती है कि हम सदैव सुखी रहें, प्रसन्नचित्त रहें. मैं भी सुख और प्रसन्नता की बातें करता हूँ लेकिन मेरे अब तक के जीवन का निचोड़ यह कहता है कि सुख और प्रसन्नता को लेकर हम सबके विचार भिन्न हैं. इन्हें किसी तय सांचे में परिभाषित नहीं किया जा सकता.

बहुत सरसरे अंदाज़ में कहूं तो प्रसन्नता आनंद की वह अनुभूति है जब हम किन्हीं दुःख-दर्द का अनुभव नहीं कर रहे हों. लेकिन यह प्रसन्नता की बहुत औसत परिभाषा है. प्रसन्नता बहुत उथला और अयथार्थ भाव है. उथला इसलिए क्योंकि यह देर तक साथ नहीं रहता. यह परिवर्तनशील है और बहुत सारे बाहरी तत्वों पर निर्भर करता है. इसके साथ ही यह अयथार्थ भी है क्योंकि जीवन में कुछ भी नियत नहीं है एवं दुःख-दर्द कभी भी सर उठा सकते हैं.

जीवन में आनंद प्राप्त करने और प्रसन्नता का मार्ग दिखानेवाली पुस्तकों के बारे में भी मेरी राय विषम है हांलांकि मैं उन्हें बुरा नहीं मानता. यदि आप उनमें दी गयी टिप्स को अपने जीवन में उतारकर स्वयं में आनंद और आशा का संचार कर सकते हैं तो मैं उन्हें पढ़ने का समर्थन करता हूँ. लेकिन ऐसी किताबों के साथ सबसे अधिक अखरने वाली बात मुझे यह लगती है कि ये किताबें लोगों को यह मानने पर विवश कर देती हैं कि आनंद की प्राप्ति ही जीवन का ध्येय है और मनुष्य को हर परिस्तिथि में प्रसन्न ही रहना चाहिए. समाज के बड़े अंश में इस धारणा के दुष्प्रचार के कारण ही अब उन औषधियों (mood elevating drugs) की मांग और खपत बढ़ती जा रही है जो रसायनों के द्वारा चित्त की अवस्था में बदलाव लाती हैं. ज़ाहिर है कि इस सबके पीछे अरबों डॉलर का व्यवसाय करनेवाली कंपनियों की सोची-समझी नीति है जिसके कारण आयेदिन नए-नवेले डिसॉर्डर और कॉम्प्लेक्स खोजे जा रहे हैं जिन्हें एक मैजिक पिल लेकर चुटकियों में दूर भगाया जा सकता है. इस बात की ओर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है कि पेड़ को हरा-भरा रखने के लिए उसकी पत्तियों को नहीं बल्कि जड़ को सींचा जाता है. जीवन में होने वाली तमाम विसंगतियों और उतार-चढ़ाव का उपचार हम बाहरी तत्वों में खोज रहे हैं जबकि वास्तविक समस्या हमारे भीतर है.

मुझे यह भी लगता है कि हमारे धर्मों और आध्यात्मिक परम्पराओं ने हमारे मन में आनंद की ऐसी छवि गढ़ दी है जिससे हम नहीं निकल पा रहे हैं. जो व्यक्ति किसी-न-किसी साधना या पद्धति का पालन कर रहे हैं उनमें भी अधिकांश का यह मानना है कि अपने ध्येय में सफल होने पर उन्हें अतीव आनंददायक पारलौकिक अनुभूतियों की प्राप्ति होगी. स्वर्ग की प्राप्ति, अमरता की संकल्पना, ध्यान, समाधि, आत्मज्ञान, निर्वाण आदि को हमने परमानंद से सम्बद्ध कर दिया है. मानव जीवन के हर संघर्ष और दुःख के लिए मैं आनंदपूर्ण दीर्घजीवन तथा ईश्वर-दर्शन की कामना, स्वार्थमय सुख-संचय, और अनात्म की भावना को उत्तरदायी मानता हूँ.

मैं स्वयं को पारंपरिक अर्थ में आध्यात्मिक नहीं मानता. कभी तो मैं ईश्वरवादी बन जाता हूँ और कभी जड़ नास्तिक. चाहे जो हो, आध्यात्म मेरे लिए आनंद की खोज नहीं बल्कि जीवन को क्षण-प्रतिक्षण उसकी पूर्णता और विहंगमता में जीने का अनुशासन है. मैं इसे शांति से देखता और अनुभव करता रहता हूँ… या ईमानदारी से कहूं तो ऐसा करने का सजग प्रयास करता रहता हूँ. मुझे लगता है कि यह संभव है. इसके लिए मुझे किसी आसन में बैठकर कोई ध्यान या जप करने की ज़रुरत नहीं है. आध्यात्म के प्रति मेरी यह धारणा प्रारंभ से ही ऐसी नहीं थी. मुझे हमेशा से ही यह लगता था कि कोई ईश्वर न भी हो तो भी हमारे भीतर आत्मा जैसा कुछ है जिसे कुछ विधियों के कठोर अभ्यास से देखा या अनुभूत किया जा सकता है. इस विषय पर मैं किसी प्रामाणिकता का दावा नहीं करता पर बहुत वर्षों के चिंतन-मनन और अभ्यास के बाद मुझे यह लगने लगा है कि हम बाहरी या भीतरी आनंद के छलावे में अपने जीवन को रेत की मांनिंद फिसलने दे रहे हैं. सिर्फ मन की सरल सहज शांति ही वह चीज़ है जिसे हम चाहें तो आसानी से प्राप्त कर सकते हैं पर उसे हम अवास्तविक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पीछे धकेल देते हैं.

मैं अपने अनुभव से यह कह सकता हूँ कि वास्तविकता में घट रही घटनाओं को साक्षी भाव से देखने से हमारे मानस और काया को शांति मिलती है, भले ही यह श्रमसाध्य और अप्रीतिकर हो. यह हमें उस दशा में ले जाता है जिसमें द्वैत नहीं होता. आप इसे आनंद भी कह सकते हैं पर इसमें कोई हिलोर नहीं है. यह संभवतः मथते हुए सागर की तलहटी है जहाँ सब कुछ एकसम है, जिसका अपना आनंद है. यह सुनने में आश्चर्यजनक लग सकता है पर किसी घोर वेदना से गुज़रनेवाले व्यक्ति के भीतर भी ऐसी ही भावना उपज सकती है क्योंकि उसके सामने कोई विकल्प नहीं होते. आपने भी किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में पढ़ा होगा या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते होंगे जो बड़े-से-बड़े दर्द को भी अपार शांति से झेल गया होगा. यदि आप उसे निर्मोही कहेंगे तो मैं उसे अनासक्त कहूँगा. उस व्यक्ति का वर्णन करने के लिए ये दो भिन्न दृष्टिकोण हैं जिसमें आप किसी एक में अधिक सकारात्मकता देख सकते हैं.

सभी धार्मिक-दार्शनिक मान्यताओं में मैंने बौद्ध धर्म का गहराई से अध्ययन किया है और उससे अधिक साम्य रखता हूँ. बौद्ध मत में यह विचार बहुत प्रबल है कि प्रसन्नता और सुख की कामना अंतत दुःख की उत्पत्ति का कारण बनती है. आप इसे कर्म सिद्धांत और अन्य संबंधित प्रत्ययों से जोड़कर भी देख सकते हैं. इस विषय पर गंभीर मतभेद हो सकते हैं पर मुझे अब यही लगने लगा है कि सुखी या प्रसन्न रहने की चाह हमें ऐसे संघर्ष तक ले जाती है जिसकी परिणति निराशा और पश्चाताप में होती है.

जीवन अनुभवों की सतत धारा है. आप इसमें बहकर डूब भी सकते हैं और इसके विपरीत तैरने की जद्दोजहद में स्वयं को नष्ट भी कर सकते हैं. दोनों ही स्थितियों में आपका मिटना तय है. यदि आप इसे केवल बहते हुए देखेंगे तो सुरक्षित रहेंगे. तब आप स्थिर रहेंगे, शांत रहेंगे, और अन्तःप्रज्ञ बनेंगे. उस दशा में आपके भीतर मौलिक बोध उपजेगा और आप सभी वस्तुओं को खंड-खंड उनके परिदृश्य में देख पायेंगे. आवश्यकता सिर्फ दर्शक बनने की है, न तो नाटक का निर्देशन करना है और न ही उसमें कूद पड़ना है. आप जागृत अवस्था में जो कुछ भी करेंगे वही आपका ध्यान बन जाएगा. आप कितनी ही पुस्तकें पढ़ लें या पद्धतियाँ सीख लें पर स्वयं के भीतर उतरे बिना और स्वयं में परिवर्तन लाये बिना वे सब व्यर्थ ही रहेंगीं और आप प्रसन्नता या शांति (जो भी आपका ध्येय हो) से सदैव दूर रहेंगे.

Walking on Water – पानी पर चलना


तीन संन्यासियों ने एक साथ बैठकर ध्यान करने का निश्चय किया. वे एक छोटे तालाब के पास बैठ गए और अपना आसन जमाने के बाद ध्यान करने लगे.

अचानक ही उनमें से एक उठा और बोला – “मैं अपनी चटाई लाना भूल गया हूँ!” – फिर वह चमत्कारिक रूप से तालाब में उतरा और पानी की सतह पर चलते हुए उस पार अपनी कुटिया तक चला गया.

जब वह लौटा तब दूसरा संन्यासी उठ गया और बोला – “मैं अपनी धोती सुखाने के लिए टांगना भूल गया!” – फिर वह भी तालाब के पानी में उतरा और पानी पर चलता हुआ अपनी कुटिया तक गया और उसी प्रकार वापस आ गया.

तीसरे संन्यासी ने जब दोनों को यह चमत्कार करते देखा तो उसने भी अपनी क्षमताओं को परखने का निर्णय कर दिया. उसने अपने मन में कहा – “क्या तुम लोग मेरे से भी अधिक शक्ति-संपन्न हो?” – “मैं भी वह सब कर सकता हूँ जो तुम दोनों करके दिखा सकते हो!” – उसने चिल्लाकर कहा और तालाब की ओर चल दिया.

पानी पर पैर रखते ही वह छपाक से गिर पड़ा.पहले प्रयास में मिली असफलता से विचलित हुए बिना वह तालाब से बाहर आया और उसने दोबारा प्रयत्न किया लेकिन वह फिर से गिर गया. उसने बारंबार पानी पर चलने का प्रयास किया पर हर बार वह पानी में गिरा और डूबते-डूबते बचा. अपने आसनों पर बैठे शेष दोनों संन्यासी यह सब होता देखते रहे.

कुछ समय बाद उनमें से एक उठकर दुसरे संन्यासी के पास गया और बोला – “क्या हम उसे बता दें कि तालाब में पत्थर कहाँ-कहाँ लगे हैं?”

* * * * * * * * * *

Three monks decided to practice meditation together. they sat by the side of a lake and closed their eyes in concentration.

Then suddenly, the first one stood up and said, “I forgot my mat.” He steeped miraculously onto the water in front of him and walked across the lake to their hut on the other side.

When he returned, the second monk stood up and said, “I forgot to put my other underwear to dry.” He too walked calmly across the water and returned the same way. The third monk watched the first two carefully in what he decided must be the test of his own abilities. “Is your learning so superior to mine? I too can match any feat you two can perform,” he declared loudly and rushed to the water’s edge to walk across it. He promptly fell into the deep water.

Undeterred, the monk climbed out of the water and tried again, only to sink into the water. Yet again he climbed out and yet again he tried, each time sinking into the water. This went on for some time as the other two monks watched.

After a while, the second monk turned to the first and said, “Do you think we should tell him where the stones are?”

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