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Posts tagged ‘सादगी’

मानसिक जंजाल से मुक्ति के उपाय


इस पोस्ट के लेखक हैं जिआनपाओलो पिएत्री. हैंडसम जिआनपाओलो डिजायनर और वास्तुकार हैं. इस समय इंटरनेट पर बहुत से प्रभावशाली युवा मिनिमलिस्ट ब्लौगरों में से एक जिआनपाओलो का ब्लॉग है simplyoptimal.net. यह पोस्ट उनकी इस पोस्ट का अनुवाद है.

हमारी समस्या यह नहीं है कि मौलिक और अभिनव विचार कैसे आयें बल्कि यह है कि लम्बे समय से भीतर जड़ जमा चुके नकारात्मक विचार कैसे निकलें. हमारा मष्तिष्क ऐसा भवन है जिसमें पुराना फर्नीचर भरा हुआ है. इसके कुछ कोनों को साफ़-सुथरा कर दीजिये और रचनात्मकता इसमें तुरत अपना स्थान ढूंढ लेगी.

मैं ऐसे बहुत से ब्लॉग पढता रहता हूँ जिनमें अपने जीवन और परिवेश से अनुपयुक्त और अनावश्यक विचारों एवं वस्तुओं को निकालकर जीवन और कार्य को सहज-सरल बनाया जा सकता है.  इन ब्लौगों में Zenhabits सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे ब्लौगों में जीवन की उपादेयता, रचनात्मकता, उत्पादकता, और सरलता को बढ़ानेवाले विचारों और उपायों पर चर्चा की जाती है. इनमें न केवल हमारे घर, रसोई, कार्यालय, और फेसबुक फ्रेंड्स लिस्ट बल्कि अपने विचारों को भी जंजाल-मुक्त और निर्मल बनाने के तत्व और सूत्र मिलते हैं. ये हमें बताते हैं कि स्वास्थ्यप्रद आहार कैसे लें, अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं के संग्रह से कैसे बचें और अपरिग्रही प्रवृत्ति की ओर कैसे उन्मुख हों. मैं इन ब्लौगों को पढना पसंद करता हूँ क्योंकि मैं उनमें विश्वास करता हूँ. मैं इनमें सुझाए गए उत्पादों को भी खरीदता हूँ.

लेकिन यह भी सच है कि इन ब्लौगों को लम्बे समय तक पढ़ते रहने के बावजूद भी मेरे भीतर वस्तु-संग्रह की इच्छा उत्पन्न होती रहती है या मैं उनकी खोज-परख करता रहता हूँ. अपनी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिए मैं अपनी डेस्क और दराज़ को साफ़ रखता हूँ. अपनी किताबों और सीडी की बेरहमी से छंटनी करता हूँ, अनुपयोगी वस्त्रों को ज़रूरतमंदों को देता हूँ और बेकार कागजों को रद्दी में डालता रहता हूँ. इन कार्यों को करने से रोज़मर्रा के जीवन में बड़ी मदद मिलती है. काम ख़त्म हो जाने पर मन में संतोष बढ़ जाता है. लेकिन कम-से-कम अपने मामले में तो मैंने यह पाया है कि कुछ ही हफ़्तों में कचरा और अनुपयोगी वस्तुएं फिर से बढ़ने लगतीं हैं. और कभी ऐसा भी होता है कि बाहरी तौर पर तो सब कुछ सरल और व्यवस्थित दिखता है पर अपने भीतर मैं खुद को बड़े असमंजस और उलझन में पाता हूँ. इस समय भी मेरे मन में ऊहापोह है और यह मुझे इस निष्कर्ष तक ले आया है:

सच्चे अर्थों में स्वतन्त्र होने, अधिक उत्पादक बनने, तनावरहित बने रहने, स्पष्ट विचार रखने, और सरल व रचनात्मक जीवन जीने के लिए हमें अपनी क्षमताओं से अधिक कर्म करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए. चीज़ों को हमेशा अलग-अलग कोण से देखकर समझने का प्रयास करना चाहिए.यह ज़रूरी है कि हम अपने भीतर झांककर देखें, स्वयं का निरीक्षण करें, और अपने मन-मष्तिष्क को अव्यवस्था और कोलाहल से मुक्त करने के लिए कदम उठायें. यदि हम यह नहीं करेंगे तो बाहर किये जाने वाले सारे प्रयत्न निष्फल जायेंगे और हमें शांति-संतोष नहीं मिलेगा.

नीचे दिए गए छः तरीकों से आप अपने भीतर उन्मुख हो सकते हैं, अपने बारे में मनन कर सकते हैं, और उन चीज़ों से छुटकारा पा सकते हैं जो जंजाल की भांति आपको घेरे रहतीं है और अच्छी चीज़ों के होने में रुकावट डालतीं हैं:

1. सोचिये नहीं, फोकस कीजिये –
अपने उद्देश्यों, सपनों, और इच्छाओं पर फोकस कीजिये. आपके चाहने और होने के बीच हमेशा कुछ फासला रहेगा ही पर इससे अपने हौसले को पस्त नहीं करें. अपना ध्यान बीच की रुकावटों पर नहीं वरन मंजिल पर केन्द्रित करें और आप पायेंगे कि पॉज़िटिव रवैया रखने से सोचने और होने के बीच की दूरियां बड़ी नहीं लगतीं.


2. बीती ताहि बिसार दें –
भूल नहीं सकें तो बेशक न भूलें पर उसे अपने ऊपर हावी नहीं होनें दें.

3. विचार प्रक्रिया का सरलीकरण करें –
बहुत सीधा सा फॉर्मूला है. अच्छे और सकारात्मक विचारों को आने दें. बुरे और नकारात्मक विचारों को दरकिनार कर दें.


4. जो कुछ हमारे वश में न हो उसके लिए व्यथित न हों –
इसे साध पाना सरल नहीं है. यहाँ कही गयी सारी बातों में यह सबसे कठिन है लेकिन शांतिपूर्ण जीवन के लिए इस नीति का पालन करना बहुत ज़रूरी है. यदि आप ऐसी चीज़ों से घिरें हो जो आपके वश में नहीं हैं तो उनके बारे में सोचविचार करके चिंतित होने में कोई सार नहीं है. उस समय तक प्रतीक्षा करें जब तक चीज़ें बदल नहीं जातीं. ध्यान दें कि
सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है.

5. अपने अंतर्मन को जागृत करें – कभी-कभी खुद पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए और अपने भीतर झांककर देखना चाहिए. यह सोचिये कि कौन सी चीज़ें आपको प्रेरित करतीं हैं, आपको गतिमान रखतीं हैं. किन परिस्थितियों में आप सर्वाधिक सक्रिय, रचनाशील, और चिंतामुक्त रहते हैं? इन बातों पर फोकस कीजिये. कभी-कभार यूं ही ध्यान में बैठ जाइए और दिन भर में सिर्फ दस मिनट ही सही पर अपने आप को भीतर ही टटोलिये और खोजिये कि आप असल में क्या हैं.

6. अकेलेपन से घबराइये नहीं –
एकांत के भी अनेक फायदे हैं. क्या आप कभी अकेले ही फिल्म देखने गए हैं? रेस्तरां में अकेले खाना खाया है? अकेले ही लम्बी चहलकदमी की है? कभी करके देखिये. जब आप निपट अकेले होते हैं तो आपकी विचार प्रक्रिया बदल जाती है. आप अधिक गहराई से सोचने लगते हैं क्योंकि आपके चारों ओर अक्सर ही मौजूद रहनेवाला कोलाहल कम हो जाता है और शांति से कुछ भी करने के लिए समय मिल जाता है.

खोटा सिक्का


यह एक सूफी कथा है. किसी गाँव में एक बहुत सरल स्वभाव का आदमी रहता था. वह लोगों को छोटी-मोटी चीज़ें बेचता था. उस गाँव के सभी निवासी यह समझते थे कि उसमें निर्णय करने, परखने और आंकने की क्षमता नहीं थी. इसीलिए बहुत से लोग उससे चीज़ें खरीदकर उसे खोटे सिक्के दे दिया करते थे. वह उन सिक्कों को ख़ुशी-ख़ुशी ले लेता था. किसी ने उसे कभी भी यह कहते नहीं सुना कि ‘यह सही है और यह गलत है’. कभी-कभी तो उससे सामान लेनेवाले लोग उसे कह देते थे कि उन्होंने दाम चुका दिया है, और वह उनसे पलटकर कभी नहीं कहता था कि ‘नहीं, तुमने पैसे नहीं दिए हैं’. वह सिर्फ इतना ही कहता ‘ठीक है’, और उन्हें धन्यवाद देता.

दूसरे गाँवों से भी लोग आते और बिना कुछ दाम चुकाए उससे सामान ले जाते या उसे खोटे पैसे दे देते. वह किसी से कोई शिकायत नहीं करता.

समय गुज़रते वह आदमी बूढ़ा हो गया और एक दिन उसकी मौत की घड़ी भी आ गयी. कहते हैं कि मरते हुए ये उसके अंतिम शब्द थे: – “मेरे खुदा, मैंने हमेशा ही सब तरह के सिक्के लिए, खोटे सिक्के भी लिए. मैं भी एक खोटा सिक्का ही हूँ, मुझे मत परखना. मैंने तुम्हारे लोगों का फैसला नहीं किया, तुम भी मेरा फैसला मत करना.”

ऐसे आदमी को खुदा कैसे परखता?

प्रेमचंद का कोट


Premchandहिंदी के महानतम कथाकार प्रेमचंद का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था. उनके पास एक पुराना कोट था जो फट गया था लेकिन वे उसी को पहने रहते थे.

उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने कई बार उनसे नया कोट बनवाने के लिए कहा लेकिन प्रेमचंद ने हर बार पैसों की कमी बताकर बात टाल दी. एक दिन शिवरानी देवी ने उन्हें कुछ रुपये निकालकर दिए और कहा – “बाजा़र जाकर कोट के लिए अच्छा कपड़ा ले आइये.”

प्रेमचंद ने रुपये ले लिए और कहा – “ठीक है. आज कोट का कपड़ा आ जाएगा.”

शाम को उन्हें खाली हाथ लौटा देखकर शिवरानी देवी ने पूछा – “कोट का कपड़ा क्यों नहीं लाए?”

प्रेमचंद कुछ क्षणों के लिए चुप रहे, फिर बोले – “मैं कपड़ा लेने के लिए निकला ही था कि प्रैस का एक कर्मचारी आ गया. उसकी लड़की की शादी के लिए पैसों की कमी पड़ गई थी. उसने मुझे वह सब इतनी लाचारी और उदासी से बताया कि मुझसे रहा नहीं गया. मैंने कोट के रुपये उसे दे दिए. कोट तो फिर कभी बन सकता है लेकिन लड़की की शादी नहीं टल सकती.”

शिवरानी देवी मन मसोस कर धीरे से बोलीं – “वो नहीं तो तुम्हें कोई और मिल जाता. मैं पहले ही जानती थी कि तुम्हारे हाथों में पैसे देकर कोट कभी नहीं आ सकता.”

प्रेमचंद के चेहरे पर संतोष की मुस्कान खिली हुई थी.

चित्र साभार – विकीपीडिया

(A motivational / inspirational anecdote of Munshi Premchand – in Hindi)

जेफरसन की सादगी


अमेरिकी डालर के अलग-अलग डिनोमिनेशन के नोटों पर किन-किन के चित्र छपे होते है? मेरी जानकारी में वे महानुभाव हैं जॉर्ज वाशिंगटन, अब्राहम लिंकन, बेंजामिन फ्रेंकलिन, और थॉमस जेफरसन। यदि किसी को कोई और महाशय का नाम याद आता हो तो वो बताये। खैर, यह प्रसंग थॉमस जेफरसन के बारे में है जो अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थे।

बात बहुत पुरानी है। जेफरसन सन १८०० के आसपास अमेरिका के राष्ट्रपति थे। उन दिनों तक फोटोग्राफी का आविष्कार नहीं हुआ था। अख़बार वगैरह भी न के बराबर छपते थे। अमेरिका की राजधानी की शक्ल आज के किसी गाँव से बेहतर नहीं रही होगी। लोग अपने राष्ट्रपति को नहीं पहचानते थे।

जेफरसन मूलतः एक किसान थे। वे कृषकों और मजदूरों के प्रबल समर्थक थे। अमेरिका ने उन जैसा सादगीपूर्ण राष्ट्रपति कोई और न देखा होगा। राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनका जीवन अत्यन्त सादा था।

एक बार वे किसी अन्य नगर में बड़े से होटल में गए और ठहरने के लिए कमरा माँगा। होटल मालिक ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा और कमरा देने से इंकार कर दिया। जेफरसन चुपचाप वहां से चल दिए।

होटल में मौजूद किसी दूसरे व्यक्ति ने उन्हें पहचान लिया और उसने होटल मालिक को बताया कि उसने अमेरिका के राष्ट्रपति को कमरा देने से मना कर दिया है!

होटल का मालिक अपने नौकरों के साथ भागा-भागा उनकी तलाश में गया। जेफरसन अभी थोड़ी दूर ही गए थे। मालिक ने उनसे अपने बर्ताव के लिए माफ़ी मांगी और होटल में चलने के लिए कहा।

जेफरसन ने उससे कहा – “यदि तुम्हारे होटल में एक साधारण आदमी के लिए जगह नहीं है तो अमेरिका का राष्ट्रपति वहां कैसे ठहर सकता है!?” यह कहकर वे किसी और होटल में ठहरने के लिए चले गए।

(थॉमस जेफरसन का चित्र विकिपीडिया से लिया गया है)

लिंकन की सहृदयता


संयुक्त राज्य अमेरिका के महानतम राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन लोकतंत्र के मसीहा माने जाते हैं। राष्ट्रपति बनने से पहले भी वे बहुत लोकप्रिय नेता थे। वे हमेशा जनमत का आदर करते थे। साधारण से साधारण व्यक्ति के अच्छे सुझाव को मान लेने में उन्हें संकोच नहीं होता था।

१८६० की बात है। ग्रेस नामक एक ११ वर्षीय बालिका ने अपने पिता के कमरे में टंगी लिंकन की तस्वीर पर दाढ़ी बना दी। पिता बहुत नाराज़ हुए लेकिन ग्रेस ने कहा कि लिंकन के चेहरे पर दाढ़ी होती तो वे ज्यादा अच्छे लगते क्योंकि वे दुबले-पतले हैं।

ग्रेस ने तय किया कि वह लिंकन को दाढ़ी रखने के लिए लिखेगी। उसने लिंकन को पत्र में लिखा – “चूंकि आप दुबले-पतले हैं इसलिए यदि आप दाढ़ी रख लें तो आप ज्यादा अच्छे दिखेंगे और आपके समर्थकों कि संख्या भी बढ़ जायेगी।”

लिंकन ने ग्रेस को उसके सुझाव के लिए धन्यवाद का पत्र भेजा। कुछ दिनों बाद वे जब ग्रेस के नगर में पहुंचे तो सभी ने उनका स्वागत किया। उन्होंने ग्रेस से मिलने कि इच्छा प्रकट की।

ग्रेस से मिलने पर उन्होंने बड़े प्यार से उसे गले लगा लिया और बोले – “प्यारी बिटिया, देखो मैंने तुम्हारा सुझाव मानकर दाढ़ी रख ली है।”

नन्ही ग्रेस खुशी से फूली न समाई।

बाद में लिंकन की दाढ़ी उनकी खास पहचान बन गई। एक नन्ही बालिका के सुझाव को भी इतना महत्त्व देनेवाले लिंकन अमेरिका के कुछ ही ऐसे राष्ट्रपतियों में गिने जाते हैं जिनका सम्मान पूरी दुनिया करती है।

(लिंकन का चित्र विकिपीडिया से लिया गया है)

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