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Posts tagged ‘सहजता’

बच्चों की किलकारियां


अनाहिता और आयाम

पहाड़ी घुमावदार रास्ते,
सूरजिया रौशन दीवारें,
नीला हिलोरी सागर,
बच्चों की किलकारियां.

चाहें आप दुनिया में कहीं भी चले जाएँ, चाहें लोग कितनी ही जुबानें बोलें, चाहें संस्कृतियाँ और सरकारें कितने ही मोर्चे खोलें… बच्चों की सहज हंसी सभी के मन को आनंदमय कर देती है. बड़ों की हंसी केवल हंसी ही नहीं होती – उसमें छुपी होती है ईर्ष्या, असुरक्षा, क्रूरता, हताशा, विसंगति, मूर्खता, और मूल्यहीनता. इसके विपरीत बच्चों की निर्मल हंसी में केवल एक ही सरल सहज आदर्श कर्म दृष्टिगोचर होता है. उसमें न तो कोई सिद्धांत हैं और न ही कोई विचारधारा – उसमें केवल जीवन का अबोधगम्य आनंद है.

एक वयस्क के रूप में हम अपनी जिम्मेदारियों के बोझ तले दबकर जीवन की उलझनों से दो-चार होते हुए एक अंतहीन मृगतृष्णा में भटकते रहते हैं. कभी बच्चों को हँसते-खेलते देखकर हमारा मन भी अपने खोये हुए बचपन की ओर सहसा चला जाता है. अब हमारी काया अपने पुराने कपड़ों में तो नहीं समा सकती पर बच्चों के करीब रहकर हम उनकी निश्छलता और आशावादिता में सांत्वना पा लेते हैं. उनके आनंद का क्षेत्र विशाल होता है और उसमें सभी समा सकते हैं.

कभी हम इस हड़बड़ी में भी रहते हैं कि हमारे बच्चे जल्द-से-जल्द बड़े हो जाएँ. लेकिन उनके लिए यह ही बेहतर है कि वे अपने बचपन के हर दिन को पूरी ऊर्जा से जियें. वे अपनी अवस्था के अनुसार गतिविधियों में रत रहें और खूब खेलें. तरुणाई में उनके प्रवेश का संक्रांतिकाल सौम्यता से पूर्ण हो. उनके बचपन की किलकारियां भावी जीवन का हर्षोल्लास बनें. आशा और उमंग के स्वर जीवनपर्यंत गूंजते रहें.

मानसिक जंजाल से मुक्ति के उपाय


इस पोस्ट के लेखक हैं जिआनपाओलो पिएत्री. हैंडसम जिआनपाओलो डिजायनर और वास्तुकार हैं. इस समय इंटरनेट पर बहुत से प्रभावशाली युवा मिनिमलिस्ट ब्लौगरों में से एक जिआनपाओलो का ब्लॉग है simplyoptimal.net. यह पोस्ट उनकी इस पोस्ट का अनुवाद है.

हमारी समस्या यह नहीं है कि मौलिक और अभिनव विचार कैसे आयें बल्कि यह है कि लम्बे समय से भीतर जड़ जमा चुके नकारात्मक विचार कैसे निकलें. हमारा मष्तिष्क ऐसा भवन है जिसमें पुराना फर्नीचर भरा हुआ है. इसके कुछ कोनों को साफ़-सुथरा कर दीजिये और रचनात्मकता इसमें तुरत अपना स्थान ढूंढ लेगी.

मैं ऐसे बहुत से ब्लॉग पढता रहता हूँ जिनमें अपने जीवन और परिवेश से अनुपयुक्त और अनावश्यक विचारों एवं वस्तुओं को निकालकर जीवन और कार्य को सहज-सरल बनाया जा सकता है.  इन ब्लौगों में Zenhabits सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे ब्लौगों में जीवन की उपादेयता, रचनात्मकता, उत्पादकता, और सरलता को बढ़ानेवाले विचारों और उपायों पर चर्चा की जाती है. इनमें न केवल हमारे घर, रसोई, कार्यालय, और फेसबुक फ्रेंड्स लिस्ट बल्कि अपने विचारों को भी जंजाल-मुक्त और निर्मल बनाने के तत्व और सूत्र मिलते हैं. ये हमें बताते हैं कि स्वास्थ्यप्रद आहार कैसे लें, अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं के संग्रह से कैसे बचें और अपरिग्रही प्रवृत्ति की ओर कैसे उन्मुख हों. मैं इन ब्लौगों को पढना पसंद करता हूँ क्योंकि मैं उनमें विश्वास करता हूँ. मैं इनमें सुझाए गए उत्पादों को भी खरीदता हूँ.

लेकिन यह भी सच है कि इन ब्लौगों को लम्बे समय तक पढ़ते रहने के बावजूद भी मेरे भीतर वस्तु-संग्रह की इच्छा उत्पन्न होती रहती है या मैं उनकी खोज-परख करता रहता हूँ. अपनी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिए मैं अपनी डेस्क और दराज़ को साफ़ रखता हूँ. अपनी किताबों और सीडी की बेरहमी से छंटनी करता हूँ, अनुपयोगी वस्त्रों को ज़रूरतमंदों को देता हूँ और बेकार कागजों को रद्दी में डालता रहता हूँ. इन कार्यों को करने से रोज़मर्रा के जीवन में बड़ी मदद मिलती है. काम ख़त्म हो जाने पर मन में संतोष बढ़ जाता है. लेकिन कम-से-कम अपने मामले में तो मैंने यह पाया है कि कुछ ही हफ़्तों में कचरा और अनुपयोगी वस्तुएं फिर से बढ़ने लगतीं हैं. और कभी ऐसा भी होता है कि बाहरी तौर पर तो सब कुछ सरल और व्यवस्थित दिखता है पर अपने भीतर मैं खुद को बड़े असमंजस और उलझन में पाता हूँ. इस समय भी मेरे मन में ऊहापोह है और यह मुझे इस निष्कर्ष तक ले आया है:

सच्चे अर्थों में स्वतन्त्र होने, अधिक उत्पादक बनने, तनावरहित बने रहने, स्पष्ट विचार रखने, और सरल व रचनात्मक जीवन जीने के लिए हमें अपनी क्षमताओं से अधिक कर्म करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए. चीज़ों को हमेशा अलग-अलग कोण से देखकर समझने का प्रयास करना चाहिए.यह ज़रूरी है कि हम अपने भीतर झांककर देखें, स्वयं का निरीक्षण करें, और अपने मन-मष्तिष्क को अव्यवस्था और कोलाहल से मुक्त करने के लिए कदम उठायें. यदि हम यह नहीं करेंगे तो बाहर किये जाने वाले सारे प्रयत्न निष्फल जायेंगे और हमें शांति-संतोष नहीं मिलेगा.

नीचे दिए गए छः तरीकों से आप अपने भीतर उन्मुख हो सकते हैं, अपने बारे में मनन कर सकते हैं, और उन चीज़ों से छुटकारा पा सकते हैं जो जंजाल की भांति आपको घेरे रहतीं है और अच्छी चीज़ों के होने में रुकावट डालतीं हैं:

1. सोचिये नहीं, फोकस कीजिये –
अपने उद्देश्यों, सपनों, और इच्छाओं पर फोकस कीजिये. आपके चाहने और होने के बीच हमेशा कुछ फासला रहेगा ही पर इससे अपने हौसले को पस्त नहीं करें. अपना ध्यान बीच की रुकावटों पर नहीं वरन मंजिल पर केन्द्रित करें और आप पायेंगे कि पॉज़िटिव रवैया रखने से सोचने और होने के बीच की दूरियां बड़ी नहीं लगतीं.


2. बीती ताहि बिसार दें –
भूल नहीं सकें तो बेशक न भूलें पर उसे अपने ऊपर हावी नहीं होनें दें.

3. विचार प्रक्रिया का सरलीकरण करें –
बहुत सीधा सा फॉर्मूला है. अच्छे और सकारात्मक विचारों को आने दें. बुरे और नकारात्मक विचारों को दरकिनार कर दें.


4. जो कुछ हमारे वश में न हो उसके लिए व्यथित न हों –
इसे साध पाना सरल नहीं है. यहाँ कही गयी सारी बातों में यह सबसे कठिन है लेकिन शांतिपूर्ण जीवन के लिए इस नीति का पालन करना बहुत ज़रूरी है. यदि आप ऐसी चीज़ों से घिरें हो जो आपके वश में नहीं हैं तो उनके बारे में सोचविचार करके चिंतित होने में कोई सार नहीं है. उस समय तक प्रतीक्षा करें जब तक चीज़ें बदल नहीं जातीं. ध्यान दें कि
सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है.

5. अपने अंतर्मन को जागृत करें – कभी-कभी खुद पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए और अपने भीतर झांककर देखना चाहिए. यह सोचिये कि कौन सी चीज़ें आपको प्रेरित करतीं हैं, आपको गतिमान रखतीं हैं. किन परिस्थितियों में आप सर्वाधिक सक्रिय, रचनाशील, और चिंतामुक्त रहते हैं? इन बातों पर फोकस कीजिये. कभी-कभार यूं ही ध्यान में बैठ जाइए और दिन भर में सिर्फ दस मिनट ही सही पर अपने आप को भीतर ही टटोलिये और खोजिये कि आप असल में क्या हैं.

6. अकेलेपन से घबराइये नहीं –
एकांत के भी अनेक फायदे हैं. क्या आप कभी अकेले ही फिल्म देखने गए हैं? रेस्तरां में अकेले खाना खाया है? अकेले ही लम्बी चहलकदमी की है? कभी करके देखिये. जब आप निपट अकेले होते हैं तो आपकी विचार प्रक्रिया बदल जाती है. आप अधिक गहराई से सोचने लगते हैं क्योंकि आपके चारों ओर अक्सर ही मौजूद रहनेवाला कोलाहल कम हो जाता है और शांति से कुछ भी करने के लिए समय मिल जाता है.

तीन संत


यह लेव तॉल्स्तॉय की बहुत प्रसिद्द कहानी है. रूस के ऑर्थोडॉक्स चर्च के आर्चबिशप को यह पता चला कि उसके नियमित प्रवचन में भाग लेने वाले बहुत से लोग एक झील के पास जाने लगे हैं. उस झील के बीच में छोटा सा एक टापू था जहाँ एक पेड़ के नीचे तीन बूढ़े रहते थे. गाँव वालों का यह कहना था कि वे तीनों संत हैं. आर्चबिशप को यह बात बहुत नागवार गुज़री क्योंकि ईसाई धर्म में संत केवल उन्हें ही माना जाता है जिन्हें वेटिकन द्वारा विधिवत संत घोषित किया गया हो.

आर्चबिशप क्रोधित हो गया – “वे तीनों संत कैसे हो सकते हैं? मैंने सालों से किसी को भी संतत्व की पदवी के लिए अनुशंसित नहीं किया है! वे कौन हैं और कहाँ से आये हैं?”. लेकिन आम लोग उन तीनों के दर्शनों के लिए जाते रहे और चर्च में आनेवालों की तादाद कम होती गयी.

अंततः आर्चबिशप ने यह तय किया कि वह उन तीनों को देखने के लिए जाएगा. वह नाव में बैठकर टापू की ओर गया. वे तीनों वहां मिल गए. वे बेहद साधारण अनपढ़ और निष्कपट देहातियों जैसे थे. दूसरी ओर, आर्चबिशप बहुत शक्तिशाली व्यक्ति था. रूस के ज़ार के बाद उस क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण आदमी था वह. उन तीनों को देखकर वह खीझ उठा – “तुमें संत किसने बनाया?” – उसने पूछा. वे तीनों एक दूसरे का मुंह ताकने लगे. उनमें से एक ने कहा – “किसी ने नहीं. हम लोग खुद को संत नहीं मानते. हम तो केवल साधारण मनुष्य हैं”.

“तो फिर तुम लोगों को देखने के लिए इतने सारे लोग क्यों आ रहे हैं?”

वे बोले – “यह तो आप उन्हीं से पूछिए.”

“क्या तुम लोगों को चर्च की आधिकारिक प्रार्थना आती है?” – आर्चबिशप ने पूछा.

“नहीं. हम तो अनपढ़ हैं और वह प्रार्थना बहुत लंबी है. हम उसे याद नहीं कर सके.”

“तो फिर तुम लोग कौन सी प्रार्थना पढ़ते हो?”

उन तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा. “तुम बता दो” – एक ने कहा.

“तुम ही बता दो ना” – वे आपस में कहते रहे.

आर्चबिशप यह सब देखसुनकर अपना आप खो बैठा. “इन लोगों को प्रार्थना करना भी नहीं आता! कैसे संत हैं ये?” – उसने मन में सोचा. वह बोला – “तुम लोगों में से कोई भी बता सकता है. जल्दी बताओ!”

वे बोले – “दरअसल हम आपके सामने बहुत ही साधारण व्यक्ति हैं. हम लोगों ने खुद ही एक प्रार्थना बनाई है पर हमें यह पता नहीं था कि इस प्रार्थना को चर्च की मंजूरी मिलना ज़रूरी है. हमारी प्रार्थना बहुत साधारण है. हमें माफ़ कर दीजिये कि हम आपकी मंजूरी नहीं ले पाए. हम इतने संकोची हैं कि हम आ ही न सके.”

“हमारी प्रार्थना है – ईश्वर तीन है और हम भी तीन हैं, इसलिए हम प्रार्थना करते हैं – ‘तुम तीन हो और हम तीन हैं, हम पर दया करो’ – यही हमारी प्रार्थना है.”

आर्चबिशप बहुत क्रोधित हो गया – “ये प्रार्थना नहीं है! मैंने ऐसी प्रार्थना कभी नहीं सुनी!” – वह ज़ोरों से हंसने लगा.

वे बोले – “आप हमें सच्ची प्रार्थना करना सिखा दें. हम तो अब तक यही समझते थे कि हमारी प्रार्थना में कोई कमी नहीं है. ‘ईश्वर तीन है, और हम तीन हैं’, और भला क्या चाहिए? बस ईश्वर की कृपा ही तो चाहिए?

उनके अनुरोध पर आर्चबिशप ने उन्हें चर्च की आधिकारिक प्रार्थना बताई और उसे पढ़ने का तरीका भी बताया. प्रार्थना काफी लंबी थी और उसके ख़तम होते-होते उनमें से एक ने कहा – “हम शुरू का भाग भूल गए हैं”. फिर आर्चबिशप ने उन्हें दोबारा बताया. फिर वे आख़िरी का भाग भूल गए…

आर्चबिशप बहुत झुंझला गया और बोला – “तुम लोग किस तरह के आदमी हो!? तुम एक छोटी सी प्रार्थना भी याद नहीं कर सकते?”

वे बोले – “माफ़ करें लेकिन हम लोग अनपढ़ हैं और हमारे लिए इसे याद करना थोडा मुश्किल है, इसमें बहुत बड़े-बड़े शब्द हैं… कृपया थोड़ा धीरज रखें. यदि आप इसे दो-तीन बार सुना देंगे तो शायद हम इसे याद कर लेंगे”. आर्चबिशप ने उन्हें तीन बार प्रार्थना सुना दी. वे बोले – “ठीक है, अबसे हम यही प्रार्थना करेंगे, हांलाकि हो सकता है कि हम इसका कुछ हिस्सा कहना भूल जाएँ पर हम पूरी कोशिश करेंगे”.

आर्चबिशप संतुष्ट था कि अब वह लोगों को जाकर बताएगा कि उसका पाला कैसे बेवकूफों से पड़ा था. उसने मन में सोचा – ‘अब लोगों को जाकर बताऊँगा कि वे जिन्हें संत कहते हैं उन्हें तो धर्म का क-ख-ग भी नहीं पता. और वे ऐसे जाहिलों के दर्शन करने जाते हैं!’. यही सोचते हुए वह नाव में जाकर बैठ गया. नाव चलने लगी और वह अभी झील में आधे रास्ते पर ही था कि उसे पीछे से उन तीनों की पुकार सुनाई दी. उसने मुड़कर देखा, वे तीनों पानी पर भागते हुए नाव की तरफ आ रहे थे! उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ! वे लोग पानी पर भागते हुए आये और नाव के पास पानी में खड़े हुए बोले – “माफ़ कीजिये, हमने आपको कष्ट दिया, कृपया चर्च की प्रार्थना एक बार और दोहरा दें, हम कुछ भूल गए हैं”.

आर्चबिशप ने कहा – “तुम लोग अपनी प्रार्थना ही पढो. मैंने तुम्हें जो कुछ भी बताया उसपर ध्यान मत दो. मुझे माफ़ कर दो, मैं बहुत दंभी हूँ. मैं तुम्हारी सरलता और पवित्रता को छू भी नहीं सकता. जाओ, लौट जाओ.”

लेकिन वे अड़े रहे – “नहीं, ऐसा मत कहिये, आप इतनी दूर से हमारे लिए आये… बस एक बार और दोहरा दें, हम लोग भूलने लगे हैं पर इस बार कोशिश करेंगे कि इसे अच्छे से याद कर लें.”

लेकिन आर्चबिशप ने कहा – “नहीं भाइयों, मैं खुद सारी ज़िंदगी अपनी प्रार्थना को पढ़ता रहा पर ईश्वर ने उसे कभी नहीं सुना. हम तो बाइबिल में ही यह पढ़ते थे कि ईसा मसीह पानी पर चल सकते थे पर हम भी उसपर शंका करते रहे. आज तुम्हें पानी पर चलते देखकर मुझे अब ईसा मसीह पर विश्वास हो चला है. तुम लोग लौट जाओ. तुम्हारी प्रार्थना संपूर्ण है. तुम्हें कुछ भी सीखने की ज़रुरत नहीं है”.

गांधीजी के सिखाये हुए मितव्ययता और अपरिग्रह के पांच पाठ


क्या आप मितव्ययता और अपरिग्रह के पाठ ग्रहण करना चाहते हैं?

गांधीजी के जीवन और दर्शन में मितव्ययता और अपरिग्रह के सर्वश्रेष्ठ सूत्रों का सार मिलता है. उन्होंने अपने जीवन के हर पक्ष में सादगी और मितव्ययता को अपनाया और इन्हीं के कारण उनका जीवन एक अनुकरणीय उदाहरण है.

गांधीजी के जैसा जीवन जीनेवाला और कोई व्यक्ति दोबारा न होगा. अपनी मृत्यु के समय वे उसी दरिद्रनारायण की प्रतिमूर्ति थे जिनके श्रेय के लिए उन्होंने अपने शरीर को भी ढंकना उचित न जाना. उनके जीवन प्रसंग युगों-युगों तक सभी को प्रेरणा देते रहेंगे.

अपने अंतिम दिनों में गांधीजी के पास कुल जमा दस-बारह वस्तुएं ही रह गईं थीं जो उनके निजी उपयोग में आती थीं. ये थीं उनका चश्मा, घड़ी, चप्पलें, लाठी और खाने के बर्तन. अपना घर और फ़ार्म आदि वे बहुत पहले ही लोक को अर्पित कर चुके थे.

“सांसारिक वस्तुओं के उपभोग और स्वामित्व से कौन दूर रह सकता है? लेकिन जीवन का रहस्य इसमें है कि उनकी कमी कभी न खले” – महात्मा गांधी

यह तो हम जानते ही हैं कि गांधीजी का जन्म धनाढ्य परिवार में हुआ था और उन्हें वे सभी सुख-सुविधाएँ मिलीं जो आज भी अधिकांश भारतीयों को दुर्लभ हैं. उन दिनों क़ानून की पढ़ाई के लिए लन्दन जाने में कई सप्ताह लग जाते थे. बचपन में धन-संपत्ति के बीच पले-बढ़े युवा मोहनदास ने जीवन के हर मोड़ पर सबक सीखे और अंततः स्वयं को व्यय और अर्जन के जंजाल से मुक्त कर दिया. जिस अवस्था में युवाओं को नित-नूतनता आकर्षित करती है उसमें उन्होंने कठोरतापूर्वक न केवल स्वयं को बल्कि अपने सानिध्य में आनेवाले हर व्यक्ति को सादगी पूर्ण जीवन जीने में प्रवृत्त किया. इसके महत्वपूर्ण सूत्र ये थे:-

1. कम संचित करें  - अपने पहनने के दो जोड़ी कपड़ों और बनाने-खाने के बर्तनों के अलावा उन्होंने किसी चीज़ की चाह नहीं की. उन्हें प्रतिदिन कई उपहार मिलते थे जिन्हें वे दूसरों को दे देते थे या उनकी नीलामी कर देते थे. हमारे लिए आज यह संभव नहीं है कि हम भी अपनी आवश्यकताओं को इतना कम कर लें. एक बार मैंने उन चीज़ों की सूची बनाने का सोचा जिनके बिना मेरा जीना दुश्वार हो जायेगा और सूची में चालीस-पचास आइटम आ गए. फिर भी, कम वस्तुओं का संचय ही संतुष्टिकारक होता है. आवश्यकता से अधिक वस्तुओं को ऐसे व्यक्तियों को दे देना चाहिए जिन्हें उसकी आवश्यकता है या जो उन्हें खरीद नहीं सकते.


आप भी 100 वस्तुओं का चैलेन्ज लेकर देखें कि क्या आप 100 से कम या 50 से भी कम वस्तुओं से अपना काम चला सकते हैं?

हम सभी अपने संचय को बढ़ाने और उसे व्यवस्थित रखने में बहुत सी ऊर्जा और बहुत सारा समय लगाते हैं. कम वस्तुओं को रखने और उनकी देखभाल करने से जीवन सरल और सहज हो जाता है.

2. सादा भोजन करें - गांधीजी को कभी भी मोटापे के डर ने नहीं सताया. वे अपना शाकाहारी भोजन स्वयं उगाते और बनाते थे. धातु के एक ही पात्र में वे भोजन करते थे. इस प्रकार भोजन संतुलित मात्रा में ग्रहण कर लिया जाता है. भोजन के पहले और बाद में वे प्रार्थना भी करते थे.

3. सादे वस्त्र पहनें - गांधीजी के सादे वस्त्रों में कपडा तो कम होता था पर उनका सन्देश बड़ा था. जब वे लन्दन में किंग से मिलने गए तब भी उन्होंने छोटी धोती और शाल पहना हुआ था. इस बारे में एक पत्रकार ने उनसे पूछा – “मिस्टर गांधी, किंग से मिलते समय आपको यह नहीं लगा कि आपने वास्तव में लगभग कुछ-नहीं पहना हुआ था?” गांधीजी ने इसका उत्तर दिया – “नहीं. किंग ने इतने वस्त्र पहने थे जो हम दोनों के लिए पर्याप्त थे.”

आज के समय में खुद अपने हाथों से करघा चलाकर सूत कातकर कपड़ा बुनना अप्रासंगिक हो चला है. वैसे भी, करघा चलाकर वस्त्र बुनना प्रतीकात्मक अधिक था, आज यह व्यावहारिक नहीं है. जो भी हो, सादे-सरल वस्त्रों में जो गरिमा है वह दिखावटी और तड़क-भड़क वाले डिजायनर कपड़ों में नहीं है.

4. तनावमुक्त जीवन जियें - गांधीजी को कभी किसी ने तनावग्रस्त नहीं देखा. कई अवसरों पर वे विषादग्रस्त और व्यथित ज़रूर हुए लेकिन दुःख के क्षणों में उन्होंने आत्ममंथन और प्रार्थना का ही सहारा लिया.

गांधीजी वैश्विक स्तर के नेता थे भले ही वे किसी राजनैतिक पद पर कभी नहीं रहे. करोड़ों व्यक्ति आज भी उन्हें पूजते हैं और उनके प्रति असीम श्रद्धा रखते हैं. अपने सरल जीवन में उन्होंने किसी भटकाव या वचनबद्धता को नहीं आने दिया. बच्चों के साथ समय बिताने के लिए वे अपनी राजनैतिक बैठकें भी निरस्त कर दिया करते थे.

गांधीजी के आसपास हर समय उपस्थित रहनेवाले लोग उनकी हर ज़रुरत और सुविधा का ध्यान रखते थे लेकिन उन्होंने हमेशा अपने हाथों से ही सभी काम करने को तरजीह दी. आत्मनिर्भरता उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण सद्गुण था.

आप भी जीवन को गंभीरता से लें पर इसका भी ध्यान रखें कि जीवन-यापन के कार्य और रोज़मर्रा की प्रतिबद्धताएं सुखी और संतोषी जीवन का विकल्प नहीं हैं.

5. अपने जीवन को अपना सन्देश बनायें - गांधीजी बहुत अच्छे लेखक और प्रभावशाली वक्ता थे पर निजी माहौल में वे शांत ही रहा करते थे और उतना ही बोलते थे जितना ज़रूरी हो. उनका लेखन टु-द-पॉइंट होता था. अपनी लेखनी से अधिक शब्द उन्होंने अपने जीवन के मार्फ़त दिए.

सरल-सहज जीवन जीने की योग्यता ने गांधीजी को सदैव महत्तर उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए गतिमान रखा. जनता और विश्व के प्रति उनकी प्रतिबद्धताएं उनकी प्राथमिकता थीं.

गांधीजी जैसा न तो कोई दोबारा कभी होगा और न ही कोई हो सकता है. हम सिर्फ इतना ही कर सकते हैं कि उनके जीवन का कुछ अनुकरण करने का प्रयास करें ताकि हमारा जीवन भी शांति और संतुष्टि से युक्त हो जाये.

“धन-दौलत की बहुतायत हो तो इसका परित्याग करके परिजनों को बेघर कर देने का कोई औचित्य नहीं है. महत्वपूर्ण केवल यह है कि इन सांसारिक विषयों से आसक्ति न हो” – महात्मा गांधी.

अपने जीवन में सरलता को उतार कर देखें. आप पाएंगे कि आपके लिए समय और ऊर्जा में बढ़ोतरी हो रही है. इससे आपको अवसर मिलेगा कि आप परिपूर्ण और प्रेरणास्पद जीवन जी सकें.

(यह पोस्ट इस ब्लौग पर प्रकाशित अरविन्द देवलिया की अतिथि पोस्ट का स्वतन्त्र अनुवाद है. अरविन्द ने ‘गेट द लाइफ यू लव’ ई-बुक लिखी है और उनका ब्लौग यह है)

(The lessons in minimalism/frugality by Mahatma Gandhi – in Hindi)

ऐसा है क्या?


baby cryज़ेन मास्टर हाकुइन जिस गाँव में रहता था वहां के लोग उसके महान गुणों के कारण उसको देवता की तरह पूजते थे।

उसकी कुटिया के पास एक परिवार रहता था जिसमें एक सुंदर युवा लड़की भी थी। एक दिन उस लड़की के माता-पिता को इस बात का पता चला कि उनकी अविवाहित पुत्री गर्भवती थी।

लड़की के माता-पिता बहुत क्रोधित हुए और उनहोंने होने वाले बच्चे के पिता का नाम पूछा। लड़की अपने प्रेमी का नाम नहीं बताना चाहती थी पर बहुत दबाव में आने पर उसने हाकुइन का नाम बता दिया।

लड़की के माता-पिता आगबबूला होकर हाकुइन के पास गए और उसे गालियाँ बकते हुए सारा किस्सा सुनाया। सब कुछ सुनकर हाकुइन ने बस इतना ही कहा – ”ऐसा है क्या?”

पूरे गाँव में हाकुइन की थू-थू होने लगी। बच्चे के जन्म के बाद लोग उसे हाकुइन की कुटिया के सामने छोड़ गए। हाकुइन ने लोगों की बातों की कुछ परवाह न की और वह बच्चे की बहुत अच्छे से देखभाल करने लगा। वह अपने खाने की चिंता नहीं करता था पर बच्चे के लिए कहीं-न-कहीं से दूध जुटा लेता था।

लड़की यह सब देखती रहती थी। साल बीत गया। एक दिन बच्चे का रोना सुनकर माँ का दिल भर आया। उसने गाँव वालों और अपने माता-पिता को सब कुछ सच-सच बता दिया। लड़की के पिता के खेत में काम करने वाला एक मजदूर वास्तव में बच्चे का पिता था।

लड़की के माता-पिता और दूसरे लोग लज्जित होकर हाकुइन के पास गए और उससे अपने बुरे बर्ताव के लिए क्षमा माँगी। लड़की ने हाकुइन से अपने बच्चा वापस माँगा।

हाकुइन ने मुस्कुराते हुए बस इतना कहा – ”ऐसा है क्या?”

(इस पोस्ट को कुछ सुधार व चित्र के साथ दोबारा पोस्ट किया गया है)

चित्र साभार – फ्लिकर

(A zen story/anecdote of Master Hakuin)

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