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बच्चों की किलकारियां

अनाहिता और आयाम

पहाड़ी घुमावदार रास्ते,
सूरजिया रौशन दीवारें,
नीला हिलोरी सागर,
बच्चों की किलकारियां.

चाहें आप दुनिया में कहीं भी चले जाएँ, चाहें लोग कितनी ही जुबानें बोलें, चाहें संस्कृतियाँ और सरकारें कितने ही मोर्चे खोलें… बच्चों की सहज हंसी सभी के मन को आनंदमय कर देती है. बड़ों की हंसी केवल हंसी ही नहीं होती – उसमें छुपी होती है ईर्ष्या, असुरक्षा, क्रूरता, हताशा, विसंगति, मूर्खता, और मूल्यहीनता. इसके विपरीत बच्चों की निर्मल हंसी में केवल एक ही सरल सहज आदर्श कर्म दृष्टिगोचर होता है. उसमें न तो कोई सिद्धांत हैं और न ही कोई विचारधारा – उसमें केवल जीवन का अबोधगम्य आनंद है.

एक वयस्क के रूप में हम अपनी जिम्मेदारियों के बोझ तले दबकर जीवन की उलझनों से दो-चार होते हुए एक अंतहीन मृगतृष्णा में भटकते रहते हैं. कभी बच्चों को हँसते-खेलते देखकर हमारा मन भी अपने खोये हुए बचपन की ओर सहसा चला जाता है. अब हमारी काया अपने पुराने कपड़ों में तो नहीं समा सकती पर बच्चों के करीब रहकर हम उनकी निश्छलता और आशावादिता में सांत्वना पा लेते हैं. उनके आनंद का क्षेत्र विशाल होता है और उसमें सभी समा सकते हैं.

कभी हम इस हड़बड़ी में भी रहते हैं कि हमारे बच्चे जल्द-से-जल्द बड़े हो जाएँ. लेकिन उनके लिए यह ही बेहतर है कि वे अपने बचपन के हर दिन को पूरी ऊर्जा से जियें. वे अपनी अवस्था के अनुसार गतिविधियों में रत रहें और खूब खेलें. तरुणाई में उनके प्रवेश का संक्रांतिकाल सौम्यता से पूर्ण हो. उनके बचपन की किलकारियां भावी जीवन का हर्षोल्लास बनें. आशा और उमंग के स्वर जीवनपर्यंत गूंजते रहें.

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मानसिक जंजाल से मुक्ति के उपाय

इस पोस्ट के लेखक हैं जिआनपाओलो पिएत्री. हैंडसम जिआनपाओलो डिजायनर और वास्तुकार हैं. इस समय इंटरनेट पर बहुत से प्रभावशाली युवा मिनिमलिस्ट ब्लौगरों में से एक जिआनपाओलो का ब्लॉग है simplyoptimal.net. यह पोस्ट उनकी इस पोस्ट का अनुवाद है.

हमारी समस्या यह नहीं है कि मौलिक और अभिनव विचार कैसे आयें बल्कि यह है कि लम्बे समय से भीतर जड़ जमा चुके नकारात्मक विचार कैसे निकलें. हमारा मष्तिष्क ऐसा भवन है जिसमें पुराना फर्नीचर भरा हुआ है. इसके कुछ कोनों को साफ़-सुथरा कर दीजिये और रचनात्मकता इसमें तुरत अपना स्थान ढूंढ लेगी.

मैं ऐसे बहुत से ब्लॉग पढता रहता हूँ जिनमें अपने जीवन और परिवेश से अनुपयुक्त और अनावश्यक विचारों एवं वस्तुओं को निकालकर जीवन और कार्य को सहज-सरल बनाया जा सकता है.  इन ब्लौगों में Zenhabits सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे ब्लौगों में जीवन की उपादेयता, रचनात्मकता, उत्पादकता, और सरलता को बढ़ानेवाले विचारों और उपायों पर चर्चा की जाती है. इनमें न केवल हमारे घर, रसोई, कार्यालय, और फेसबुक फ्रेंड्स लिस्ट बल्कि अपने विचारों को भी जंजाल-मुक्त और निर्मल बनाने के तत्व और सूत्र मिलते हैं. ये हमें बताते हैं कि स्वास्थ्यप्रद आहार कैसे लें, अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं के संग्रह से कैसे बचें और अपरिग्रही प्रवृत्ति की ओर कैसे उन्मुख हों. मैं इन ब्लौगों को पढना पसंद करता हूँ क्योंकि मैं उनमें विश्वास करता हूँ. मैं इनमें सुझाए गए उत्पादों को भी खरीदता हूँ.

लेकिन यह भी सच है कि इन ब्लौगों को लम्बे समय तक पढ़ते रहने के बावजूद भी मेरे भीतर वस्तु-संग्रह की इच्छा उत्पन्न होती रहती है या मैं उनकी खोज-परख करता रहता हूँ. अपनी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिए मैं अपनी डेस्क और दराज़ को साफ़ रखता हूँ. अपनी किताबों और सीडी की बेरहमी से छंटनी करता हूँ, अनुपयोगी वस्त्रों को ज़रूरतमंदों को देता हूँ और बेकार कागजों को रद्दी में डालता रहता हूँ. इन कार्यों को करने से रोज़मर्रा के जीवन में बड़ी मदद मिलती है. काम ख़त्म हो जाने पर मन में संतोष बढ़ जाता है. लेकिन कम-से-कम अपने मामले में तो मैंने यह पाया है कि कुछ ही हफ़्तों में कचरा और अनुपयोगी वस्तुएं फिर से बढ़ने लगतीं हैं. और कभी ऐसा भी होता है कि बाहरी तौर पर तो सब कुछ सरल और व्यवस्थित दिखता है पर अपने भीतर मैं खुद को बड़े असमंजस और उलझन में पाता हूँ. इस समय भी मेरे मन में ऊहापोह है और यह मुझे इस निष्कर्ष तक ले आया है:

सच्चे अर्थों में स्वतन्त्र होने, अधिक उत्पादक बनने, तनावरहित बने रहने, स्पष्ट विचार रखने, और सरल व रचनात्मक जीवन जीने के लिए हमें अपनी क्षमताओं से अधिक कर्म करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए. चीज़ों को हमेशा अलग-अलग कोण से देखकर समझने का प्रयास करना चाहिए.यह ज़रूरी है कि हम अपने भीतर झांककर देखें, स्वयं का निरीक्षण करें, और अपने मन-मष्तिष्क को अव्यवस्था और कोलाहल से मुक्त करने के लिए कदम उठायें. यदि हम यह नहीं करेंगे तो बाहर किये जाने वाले सारे प्रयत्न निष्फल जायेंगे और हमें शांति-संतोष नहीं मिलेगा.

नीचे दिए गए छः तरीकों से आप अपने भीतर उन्मुख हो सकते हैं, अपने बारे में मनन कर सकते हैं, और उन चीज़ों से छुटकारा पा सकते हैं जो जंजाल की भांति आपको घेरे रहतीं है और अच्छी चीज़ों के होने में रुकावट डालतीं हैं:

1. सोचिये नहीं, फोकस कीजिये –
अपने उद्देश्यों, सपनों, और इच्छाओं पर फोकस कीजिये. आपके चाहने और होने के बीच हमेशा कुछ फासला रहेगा ही पर इससे अपने हौसले को पस्त नहीं करें. अपना ध्यान बीच की रुकावटों पर नहीं वरन मंजिल पर केन्द्रित करें और आप पायेंगे कि पॉज़िटिव रवैया रखने से सोचने और होने के बीच की दूरियां बड़ी नहीं लगतीं.


2. बीती ताहि बिसार दें –
भूल नहीं सकें तो बेशक न भूलें पर उसे अपने ऊपर हावी नहीं होनें दें.

3. विचार प्रक्रिया का सरलीकरण करें –
बहुत सीधा सा फॉर्मूला है. अच्छे और सकारात्मक विचारों को आने दें. बुरे और नकारात्मक विचारों को दरकिनार कर दें.


4. जो कुछ हमारे वश में न हो उसके लिए व्यथित न हों –
इसे साध पाना सरल नहीं है. यहाँ कही गयी सारी बातों में यह सबसे कठिन है लेकिन शांतिपूर्ण जीवन के लिए इस नीति का पालन करना बहुत ज़रूरी है. यदि आप ऐसी चीज़ों से घिरें हो जो आपके वश में नहीं हैं तो उनके बारे में सोचविचार करके चिंतित होने में कोई सार नहीं है. उस समय तक प्रतीक्षा करें जब तक चीज़ें बदल नहीं जातीं. ध्यान दें कि
सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है.

5. अपने अंतर्मन को जागृत करें – कभी-कभी खुद पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए और अपने भीतर झांककर देखना चाहिए. यह सोचिये कि कौन सी चीज़ें आपको प्रेरित करतीं हैं, आपको गतिमान रखतीं हैं. किन परिस्थितियों में आप सर्वाधिक सक्रिय, रचनाशील, और चिंतामुक्त रहते हैं? इन बातों पर फोकस कीजिये. कभी-कभार यूं ही ध्यान में बैठ जाइए और दिन भर में सिर्फ दस मिनट ही सही पर अपने आप को भीतर ही टटोलिये और खोजिये कि आप असल में क्या हैं.

6. अकेलेपन से घबराइये नहीं –
एकांत के भी अनेक फायदे हैं. क्या आप कभी अकेले ही फिल्म देखने गए हैं? रेस्तरां में अकेले खाना खाया है? अकेले ही लम्बी चहलकदमी की है? कभी करके देखिये. जब आप निपट अकेले होते हैं तो आपकी विचार प्रक्रिया बदल जाती है. आप अधिक गहराई से सोचने लगते हैं क्योंकि आपके चारों ओर अक्सर ही मौजूद रहनेवाला कोलाहल कम हो जाता है और शांति से कुछ भी करने के लिए समय मिल जाता है.

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तीन संत

यह लेव तॉल्स्तॉय की बहुत प्रसिद्द कहानी है. रूस के ऑर्थोडॉक्स चर्च के आर्चबिशप को यह पता चला कि उसके नियमित प्रवचन में भाग लेने वाले बहुत से लोग एक झील के पास जाने लगे हैं. उस झील के बीच में छोटा सा एक टापू था जहाँ एक पेड़ के नीचे तीन बूढ़े रहते थे. गाँव वालों का यह कहना था कि वे तीनों संत हैं. आर्चबिशप को यह बात बहुत नागवार गुज़री क्योंकि ईसाई धर्म में संत केवल उन्हें ही माना जाता है जिन्हें वेटिकन द्वारा विधिवत संत घोषित किया गया हो.

आर्चबिशप क्रोधित हो गया – “वे तीनों संत कैसे हो सकते हैं? मैंने सालों से किसी को भी संतत्व की पदवी के लिए अनुशंसित नहीं किया है! वे कौन हैं और कहाँ से आये हैं?”. लेकिन आम लोग उन तीनों के दर्शनों के लिए जाते रहे और चर्च में आनेवालों की तादाद कम होती गयी.

अंततः आर्चबिशप ने यह तय किया कि वह उन तीनों को देखने के लिए जाएगा. वह नाव में बैठकर टापू की ओर गया. वे तीनों वहां मिल गए. वे बेहद साधारण अनपढ़ और निष्कपट देहातियों जैसे थे. दूसरी ओर, आर्चबिशप बहुत शक्तिशाली व्यक्ति था. रूस के ज़ार के बाद उस क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण आदमी था वह. उन तीनों को देखकर वह खीझ उठा – “तुमें संत किसने बनाया?” – उसने पूछा. वे तीनों एक दूसरे का मुंह ताकने लगे. उनमें से एक ने कहा – “किसी ने नहीं. हम लोग खुद को संत नहीं मानते. हम तो केवल साधारण मनुष्य हैं”.

“तो फिर तुम लोगों को देखने के लिए इतने सारे लोग क्यों आ रहे हैं?”

वे बोले – “यह तो आप उन्हीं से पूछिए.”

“क्या तुम लोगों को चर्च की आधिकारिक प्रार्थना आती है?” – आर्चबिशप ने पूछा.

“नहीं. हम तो अनपढ़ हैं और वह प्रार्थना बहुत लंबी है. हम उसे याद नहीं कर सके.”

“तो फिर तुम लोग कौन सी प्रार्थना पढ़ते हो?”

उन तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा. “तुम बता दो” – एक ने कहा.

“तुम ही बता दो ना” – वे आपस में कहते रहे.

आर्चबिशप यह सब देखसुनकर अपना आप खो बैठा. “इन लोगों को प्रार्थना करना भी नहीं आता! कैसे संत हैं ये?” – उसने मन में सोचा. वह बोला – “तुम लोगों में से कोई भी बता सकता है. जल्दी बताओ!”

वे बोले – “दरअसल हम आपके सामने बहुत ही साधारण व्यक्ति हैं. हम लोगों ने खुद ही एक प्रार्थना बनाई है पर हमें यह पता नहीं था कि इस प्रार्थना को चर्च की मंजूरी मिलना ज़रूरी है. हमारी प्रार्थना बहुत साधारण है. हमें माफ़ कर दीजिये कि हम आपकी मंजूरी नहीं ले पाए. हम इतने संकोची हैं कि हम आ ही न सके.”

“हमारी प्रार्थना है – ईश्वर तीन है और हम भी तीन हैं, इसलिए हम प्रार्थना करते हैं – ‘तुम तीन हो और हम तीन हैं, हम पर दया करो’ – यही हमारी प्रार्थना है.”

आर्चबिशप बहुत क्रोधित हो गया – “ये प्रार्थना नहीं है! मैंने ऐसी प्रार्थना कभी नहीं सुनी!” – वह ज़ोरों से हंसने लगा.

वे बोले – “आप हमें सच्ची प्रार्थना करना सिखा दें. हम तो अब तक यही समझते थे कि हमारी प्रार्थना में कोई कमी नहीं है. ‘ईश्वर तीन है, और हम तीन हैं’, और भला क्या चाहिए? बस ईश्वर की कृपा ही तो चाहिए?

उनके अनुरोध पर आर्चबिशप ने उन्हें चर्च की आधिकारिक प्रार्थना बताई और उसे पढ़ने का तरीका भी बताया. प्रार्थना काफी लंबी थी और उसके ख़तम होते-होते उनमें से एक ने कहा – “हम शुरू का भाग भूल गए हैं”. फिर आर्चबिशप ने उन्हें दोबारा बताया. फिर वे आख़िरी का भाग भूल गए…

आर्चबिशप बहुत झुंझला गया और बोला – “तुम लोग किस तरह के आदमी हो!? तुम एक छोटी सी प्रार्थना भी याद नहीं कर सकते?”

वे बोले – “माफ़ करें लेकिन हम लोग अनपढ़ हैं और हमारे लिए इसे याद करना थोडा मुश्किल है, इसमें बहुत बड़े-बड़े शब्द हैं… कृपया थोड़ा धीरज रखें. यदि आप इसे दो-तीन बार सुना देंगे तो शायद हम इसे याद कर लेंगे”. आर्चबिशप ने उन्हें तीन बार प्रार्थना सुना दी. वे बोले – “ठीक है, अबसे हम यही प्रार्थना करेंगे, हांलाकि हो सकता है कि हम इसका कुछ हिस्सा कहना भूल जाएँ पर हम पूरी कोशिश करेंगे”.

आर्चबिशप संतुष्ट था कि अब वह लोगों को जाकर बताएगा कि उसका पाला कैसे बेवकूफों से पड़ा था. उसने मन में सोचा – ‘अब लोगों को जाकर बताऊँगा कि वे जिन्हें संत कहते हैं उन्हें तो धर्म का क-ख-ग भी नहीं पता. और वे ऐसे जाहिलों के दर्शन करने जाते हैं!’. यही सोचते हुए वह नाव में जाकर बैठ गया. नाव चलने लगी और वह अभी झील में आधे रास्ते पर ही था कि उसे पीछे से उन तीनों की पुकार सुनाई दी. उसने मुड़कर देखा, वे तीनों पानी पर भागते हुए नाव की तरफ आ रहे थे! उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ! वे लोग पानी पर भागते हुए आये और नाव के पास पानी में खड़े हुए बोले – “माफ़ कीजिये, हमने आपको कष्ट दिया, कृपया चर्च की प्रार्थना एक बार और दोहरा दें, हम कुछ भूल गए हैं”.

आर्चबिशप ने कहा – “तुम लोग अपनी प्रार्थना ही पढो. मैंने तुम्हें जो कुछ भी बताया उसपर ध्यान मत दो. मुझे माफ़ कर दो, मैं बहुत दंभी हूँ. मैं तुम्हारी सरलता और पवित्रता को छू भी नहीं सकता. जाओ, लौट जाओ.”

लेकिन वे अड़े रहे – “नहीं, ऐसा मत कहिये, आप इतनी दूर से हमारे लिए आये… बस एक बार और दोहरा दें, हम लोग भूलने लगे हैं पर इस बार कोशिश करेंगे कि इसे अच्छे से याद कर लें.”

लेकिन आर्चबिशप ने कहा – “नहीं भाइयों, मैं खुद सारी ज़िंदगी अपनी प्रार्थना को पढ़ता रहा पर ईश्वर ने उसे कभी नहीं सुना. हम तो बाइबिल में ही यह पढ़ते थे कि ईसा मसीह पानी पर चल सकते थे पर हम भी उसपर शंका करते रहे. आज तुम्हें पानी पर चलते देखकर मुझे अब ईसा मसीह पर विश्वास हो चला है. तुम लोग लौट जाओ. तुम्हारी प्रार्थना संपूर्ण है. तुम्हें कुछ भी सीखने की ज़रुरत नहीं है”.

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ऐसा है क्या?

baby cryज़ेन मास्टर हाकुइन जिस गाँव में रहता था वहां के लोग उसके महान गुणों के कारण उसको देवता की तरह पूजते थे।

उसकी कुटिया के पास एक परिवार रहता था जिसमें एक सुंदर युवा लड़की भी थी। एक दिन उस लड़की के माता-पिता को इस बात का पता चला कि उनकी अविवाहित पुत्री गर्भवती थी।

लड़की के माता-पिता बहुत क्रोधित हुए और उनहोंने होने वाले बच्चे के पिता का नाम पूछा। लड़की अपने प्रेमी का नाम नहीं बताना चाहती थी पर बहुत दबाव में आने पर उसने हाकुइन का नाम बता दिया।

लड़की के माता-पिता आगबबूला होकर हाकुइन के पास गए और उसे गालियाँ बकते हुए सारा किस्सा सुनाया। सब कुछ सुनकर हाकुइन ने बस इतना ही कहा – ”ऐसा है क्या?”

पूरे गाँव में हाकुइन की थू-थू होने लगी। बच्चे के जन्म के बाद लोग उसे हाकुइन की कुटिया के सामने छोड़ गए। हाकुइन ने लोगों की बातों की कुछ परवाह न की और वह बच्चे की बहुत अच्छे से देखभाल करने लगा। वह अपने खाने की चिंता नहीं करता था पर बच्चे के लिए कहीं-न-कहीं से दूध जुटा लेता था।

लड़की यह सब देखती रहती थी। साल बीत गया। एक दिन बच्चे का रोना सुनकर माँ का दिल भर आया। उसने गाँव वालों और अपने माता-पिता को सब कुछ सच-सच बता दिया। लड़की के पिता के खेत में काम करने वाला एक मजदूर वास्तव में बच्चे का पिता था।

लड़की के माता-पिता और दूसरे लोग लज्जित होकर हाकुइन के पास गए और उससे अपने बुरे बर्ताव के लिए क्षमा माँगी। लड़की ने हाकुइन से अपने बच्चा वापस माँगा।

हाकुइन ने मुस्कुराते हुए बस इतना कहा – ”ऐसा है क्या?”

(इस पोस्ट को कुछ सुधार व चित्र के साथ दोबारा पोस्ट किया गया है)

चित्र साभार – फ्लिकर

(A zen story/anecdote of Master Hakuin)

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विक्रम साराभाई की सरलता

Vikram_Sarabhai

वर्ष १९४८ में अहमदाबाद की महात्मा गाँधी विज्ञान अन्वेषणशाला में कुछ विद्यार्थी भौतिकी के महत्वपूर्ण प्रयोग कर रहे थे. यह प्रयोगशाला विक्रम साराभाई ने हाल में ही शुरू की थी. प्रयोग के दौरान भारी विद्युत प्रवाह के कारण एक बहुमूल्य यंत्र जल गया. वह यंत्र विदेश से मंगाया गया था और भारत में उपलब्ध नहीं था. यंत्र के अभाव में अनेक महत्वपूर्ण प्रयोग स्थगित करने पड़ जाते.

विद्यार्थी डर गए कि वे साराभाई को इस बारे में कैसे बताएं. साराभाई कुछ ही क्षणों में प्रयोगस्थल पर आनेवाले थे.

“वे आ रहे हैं. तुम बता दो कि यंत्र जल गया है”.

“हमने जानबूझ कर तो ऐसा नहीं किया! कहीं वे नाराज़ हो गए तो?”

“क्या करें, कैसे बताएं? मुझे डर लग रहा है”.

साराभाई ने उन्हें फुसफुसाते हुए सुन लिया. उन्होंने पूछा – “क्या बात है? कोई समस्या है क्या?”

“सर, प्रयोग के दौरान विद्युत मीटर जल गया. उसमें से भारी विद्युत प्रवाह हो गया. हम…”

“इतनी सी बात! परेशान मत हो. वैज्ञानिक अध्ययन और प्रयोगों में ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं. विद्यार्थी गलतियों से ही तो सीखते हैं! अगली बार प्रयोग से पहले अच्छे से जांच कर लेना” – साराभाई बहुत सरलता से बोले.

उनके इस उत्तर को सुनकर दोनों युवा वैज्ञानिकों के मन में उनके प्रति असीम श्रद्धा भर गई. भविष्य में वे प्रयोगों के दौरान पर्याप्त सावधानी बरतने लगे.

साराभाई इस हानि पर न तो क्रोधित हुए और न ही उन्होंने इसके लिए दुःख व्यक्त किया.

भाग्यशाली विद्यार्थियों को ही ऐसा गुरु मिलता है.

(A motivational / inspiring anecdote of Vikram Sarabhai – in Hindi)

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