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आलू, अंडे, और कॉफ़ी – Potatoes, Eggs, and Coffee


alice popkorn photo

बुरे दिनों के दौरान एक बेटी ने अपने पिता से कहा, “ये समय कितना कठिन है! मैं अब बहुत थक गई हूं, भीतर-ही-भीतर टूट गई हूं. जब तक हम एक मुसीबत से दो-चार होते हैं तब तक नई मुसीबतें मुंह बाए खड़ी हो जाती हैं. ऐसा कब तक चलेगा?”

पिता किसी जगह खाना बनाने का काम करता था. वह बिना कुछ बोले उठा और उसने सामने रखे चूल्हे पर तीन बर्तनों में पानी भरकर तेज आंच पर चढ़ा दिया.

जब पानी उबलने लगा, उसने एक बर्तन में आलू, दूसरे में अंडे, और तीसरे बर्तन में कॉफ़ी के बीज डाल दिए. फिर वह चुपचाप अपनी कुर्सी तक आकर बेटी की बातें सुनने लगा. वह वाकई बहुत दुखी थी और यह समझ नहीं पा रही थी कि पिता क्या कर रहे हैं.

कुछ देर बाद पिता ने बर्नर बंद कर दिए और आलू और अंडे को निकालकर एक प्लेट में रख दिया और एक कप में कॉफ़ी ढाल दी. फिर उसने अपनी बेटी से कहाः

“अब तुम बताओ कि ये सब क्या है?”

बेटी ने कहा, “आलू, अंडे और कॉफ़ी ही तो है. और क्या है?”

“नहीं, इन्हें करीब से देखो, छूकर देखो”, पिता ने कहा.

बेटी ने आलू को उठाकर देखा, वे नरम हो गए थे. अंडा पानी में उबलने पर सख्त हो गया था और कॉफ़ी से तरोताज़ा कर देने वाली महक उठ रही थी.

“लेकिन मैं समझी नहीं कि आप क्या बताना चाह रहे हैं”, उसने कहा.

पिता ने उसे समझाया, “मैंने आलू, अंडे और कॉफ़ी को एक जैसी यंत्रणा याने खौलते पानी से गुज़ारा, लेकिन इनमें से हर एक ने उसका सामना अपनी तरह से किया. आलू पहले तो कठोर और मजबूत थे, लेकिन खौलते पानी का सामना करने पर वे नर्म-मुलायम हो गए. वहीं दूसरी ओर, अंडे नाज़ुक और कमज़ोर थे और इनका पतला छिलका भीतर की चीज़ को बचाए रखता था. खौलते पानी ने उसको ही कठोर बना दिया. अब कॉफ़ी, इसका मामला सबसे जुदा है. उबलते पानी का साथ पाकर इन्होंने उसे ही बदल डाला. इन्होंने पानी को एक ऐसी चीज़ में रूपांतरित दिया जो तुम्हें खुशनुमा अहसास से सराबोर कर देती है.”

“अब तुम मुझे बताओ”, पिता ने पूछा, “जब मुसीबतें तुम्हारा द्वार खटखटाती हैं तो तुम क्या जवाब देती हो? तुम इन तीनों में से क्या हो?”

(~_~)

Once upon a time a daughter complained to her father that her life was miserable and that she didn’t know how she was going to make it. She was tired of fighting and struggling all the time. It seemed just as one problem was solved, another one soon followed. Her father, a chef, took her to the kitchen. He filled three pots with water and placed each on a high fire.

Once the three pots began to boil, he placed potatoes in one pot, eggs in the second pot and ground coffee beans in the third pot. He then let them sit and boil, without saying a word to his daughter. The daughter, moaned and impatiently waited, wondering what he was doing. After twenty minutes he turned off the burners. He took the potatoes out of the pot and placed them in a bowl. He pulled the eggs out and placed them in a bowl. He then ladled the coffee out and placed it in a cup.

Turning to her, he asked. “Daughter, what do you see?”

“Potatoes, eggs and coffee,” she hastily replied.

“Look closer”, he said, “and touch the potatoes.” She did and noted that they were soft.
He then asked her to take an egg and break it. After pulling off the shell, she observed the hard-boiled egg. Finally, he asked her to sip the coffee. Its rich aroma brought a smile to her face.

“Father, what does this mean?” she asked.

He then explained that the potatoes, the eggs and coffee beans had each faced the same adversity-the boiling water. However, each one reacted differently. The potato went in strong, hard and unrelenting, but in boiling water, it became soft and weak. The egg was fragile, with the thin outer shell protecting its liquid interior until it was put in the boiling water. Then the inside of the egg became hard. However, the ground coffee beans were unique. After they were exposed to the boiling water, they changed the water and created something new.

“Which one are you?” he asked his daughter. “When adversity knocks on your door, how do you respond? Are you a potato, an egg, or a coffee bean?”

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कुछ करिए…


स्टीवन कोवी (Steven Covey) की पुस्तक The 7 Habits of Highly Effective People में एक चित्र है जिसे मैं हमेशा ध्यान में रखता हूँ. बाईं ओर दिए चित्र को देखिये:

इस चित्र में वर्तुलों द्वारा दो क्षेत्र प्रदर्शित किये गए हैं जिनपर हम अपने समय और शक्तियों को केन्द्रित करते हैं. अधिकांश लोग प्रभाव क्षेत्र के बाहर अपने समय और शक्ति को लगाते हैं जो कि चिंताओं का क्षेत्र है. ऐसे लोग आमतौर पर ऐसी बातों पर सोच-विचार करते हैं जिनपर उनका नियंत्रण नहीं होता, जैसे अगले सप्ताह का मौसम या मध्य पूर्व के देशों की दशा. ऐसे ही विषयों पर स्वयं को चिंतन या विवाद में व्यस्त रखकर वे अपने मूल्यवान समय और ऊर्जा को व्यर्थ कर देते हैं.

कोवी के अनुसार सफल व्यक्ति मुख्यतः अपने प्रभाव क्षेत्र के दायरे में ही चिंतन-मनन करते हैं. वे उन बातों की परवाह नहीं करते जिनपर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता. वे अपने समय और सामर्थ्य का निवेश एवं नियोजन उन क्षेत्रों में करते हैं जिनसे वास्तव में कुछ मूल्यवान और महत्वपूर्ण की प्राप्ति हो. अपने प्रभाव क्षेत्र को क्रमशः बढ़ाते हुए वे अधिक शक्तिसंपन्न व प्रभावशाली होते जाते हैं.

आप अपने समय और सामर्थ्य का उपयोग किस प्रकार करते हैं?

यदि आप रोज़ शाम को टीवी पर ख़बरों में बढ़ते अपराध और बिगड़ते हालात को देखकर यह अफसोस करते रहते हैं कि दुनिया रसातल में जा रही है तो आप चिंता के वर्तुल में भ्रमण कर रहे हैं. इसके विपरीत यदि आप प्रभाव क्षेत्र में हैं तो आप ऐसे सकारात्मक प्रयास करते हैं जिनसे लोगों में जागरूकता आये. आप नए विचारों के साथ आगे आते हैं, लोगों को उनकी योग्यताओं और शक्तियों का अहसास कराते हैं, और उनका मार्गदर्शन करते हैं ताकि अधिकाधिक लोगों के जीवन में सुधार आये.

मैं कई लोगों के बीच में वार्ता करने से झिझकता था क्योंकि मेरे भीतर यह भय व्याप्त था कि मैं कुछ भी ठीक से नहीं कह पाऊंगा और सभी मुझे मूर्ख समझेंगे. मैं इतना संकोची था कि किसी गोष्ठी में कुछ पूछने के लिए या अपने विचार रखने के लिए हाथ उठाने से भी हिचकिचाता था. यदि मैं कुछ पूछता भी तो मेरा दिल बेतहाशा धड़कने लगता और मैं खुद से यह पूछता रहता कि मैं कोई बेवकूफी भरा सवाल तो नहीं पूछ रहा हूँ! मैं हमेशा चिंताओं के क्षेत्र में ही फंसा रहता था. किसी तरह मैं उसमें से निकलकर प्रभाव क्षेत्र में जा सका. ऐसा करने के लिए मुझे पब्लिक स्पीकिंग कोचिंग से बड़ी मदद मिली. अपने चिंता क्षेत्र से बाहर निकले बिना मैं लोगों के सामने बिना किसी तैयारी के भाषण देने के बारे में सोच भी नहीं सकता था.

अब मैं आपको यह बताता हूँ कि वे कौन सी बातें (चिंता का क्षेत्र) हैं जिनके बारे में लोग बड़ी चिंता करते हैं. उसके ठीक बाद मैं उन उपायों (प्रभाव क्षेत्र) को इंगित करूंगा जो खराब दशाओं में सुधार ला सकते हैं:

पर्यावरण/प्रदूषण – रिसाइकल करें. कम उपयोग करें. आवश्यकताएं घटाएं.
आय-व्यय/घरेलू खर्च – आमदनी बढ़ाएं. खर्चे कम करें. छोटी-छोटी बचत करें.
स्वास्थ्य – व्यायाम करें. पैदल चलें.
अकेलापन/अवसाद – अपने मेलजोल का दायरा बढ़ाएं. खुशमिजाज़ बनें.
भविष्य – टाइम मशीन बनाएं.

जब भी आप किसी मसले पर काम करें तो खुद से यह ज़रूर पूछें, “मैं इस स्थिति में किस प्रकार सुधार ला सकता हूँ? मैं इसे बेहतर कैसे बना सकता हूँ?”

कुछ नए विचार एकत्र करें और उनपर कार्रवाई शुरू कर दें. यदि आप कुछ नहीं सोच पा रहे हों तो यह अवश्य अनुभव करें कि किसी समस्या के बारे में चिंता करना केवल अपने समय और शक्तियों की बर्बादी है. फिर अपने संसाधनों को उस दिशा में मोड़ दें जहां आप वाकई कुछ करके दिखा सकते हों.

This is a guest post of Niall Doherty of ‘Disrupting the Rabblement’. Niall is on a mission to become a self-employed vagabond, pursuing his passions and helping other people escape mediocrity while he travels the world.

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दूसरों के दुःख : Others’ Sorrows


हिमालय के पर्वतों पर कहीं एक ज्ञानी महात्मा रहते थे. अनुयाइयों और श्रृद्धालुओं द्वारा बहुत तंग किये जाने के कारण उन्होंने पर्वतों पर ही एकाकी और सरल जीवन व्यतीत करना बेहतर समझा.

लेकिन उसकी प्रसिद्धि इतनी अधिक थी कि उनके दर्शनों के लिए लोग नदियाँ और घाटियाँ पार करके चले आते. लोग यह मानते थे कि महात्मा उन्हें दुखों और समस्याओं से छुटकारा दिला सकते हैं.

ऐसे ही कुछ श्रृद्धालुओं को महात्मा ने तीन दिनों तक खाली बैठाकर इंतज़ार कराया. इस बीच और भी लोग आ पहुंचे. जब वहां और लोगों के लिए जगह नहीं बची तो महात्मा ने सभी उपस्थितों से कहा – “आज मैं तुम सभी को दुखों और कष्टों से मुक्ति का उपाय बताऊँगा लेकिन तुम्हें यह वचन देना होगा कि तुम किसी को भी नहीं बताओगे कि मैं यहाँ रहता हूँ, और किसी और को यहाँ नहीं भेजोगे. अब मुझे एक-एक करके अपनी समस्याएँ बताओ”.

किसी ने बोलना शुरू किया, लेकिन उसे किसी और ने टोक दिया – सभी समझ गए थे कि महात्मा से संवाद का यह अंतिम अवसर था. जब वहां बहुत शोरगुल होने लगा तब महात्मा ने चिल्ला कर कहा – “शांत हो जाइए! आप सभी अपने-अपने कष्ट और तकलीफें एक पर्चे में लिखकर मेरे सामने रख दीजिये!”

जब सभी लोग लिख चुके तब महात्मा ने एक टोकरी में सारे पर्चों को गड्ड-मड्ड कर दिया और कहा – “ये टोकरी एक दूसरे को फिराते जाओ. हर व्यक्ति इसमें से एक परचा उठाये और पढ़े, फिर यह तय करे कि वह अपने दुःख ही अपने पास रखना चाहेगा या किसी और के दुःख लेना पसंद करेगा”.

सारे व्यक्तियों ने टोकरी से पर्चे उठाकर पढ़े और पढ़ते ही सभी बहुत चिंता में पड़ गए. वे इस नतीजे तक पहुंचे कि उनके दुःख और तकलीफें कितनी ही बड़ी क्यों न हों पर औरों के दुःख-दर्द के सामने वे कुछ भी नहीं थीं. दो घंटे के भीतर उनमें से हर किसी ने सारे पर्चे देख लिए और सभी को अपने ही पर्चे अपनी जेब के हवाले करने पड़े. दूसरों के दुखों की झलक पाकर उन्हें अपने दुःख हल्के लगने लगे थे.

जीवन का यह ज़रूरी सबक सीखकर वे सभी अपने-अपने घर को चले गए. उनके दुःख तो बरकरार थे पर उनका बोझ अब दिल और दिमाग पर उतना नहीं लग रहा था. फिर उनमें से किसी ने भी किसी और को महात्मा के आसरे का पता नहीं बताया.

(यह कहानी पाउलो कोएलो के ब्लॉग से लेकर पोस्ट की गयी है)

(~_~)

There was once a well-known scholar, who lived in a mountain in the Himalayas. Tired of living with men, he had chosen a simple life and spent most of his time meditating.

His fame, however, was so great that people were willing to walk narrow paths, climb steep hills, swim rivers – to meet the holy man who was believed to be able to resolve any trouble of the human heart.

The wise man said nothing but asked them to sit and wait. Three days passed, and more people arrived. When there was no room for anyone else, he addressed the people who were outside his door.

“Today I will give the answer that everyone wants. But you must promise that, to have your problems solved, you will not tell the new pilgrims that I moved here – so that you can continue to live in the solitude you so much crave. Tell me your problems” .

Someone began to speak, but was soon interrupted by others, as everyone knew that this was the last public hearing that the holy man was giving. The wise man let the situation be prolonged a little, until he cried, “Silence! Write your problems down and put the papers in front of me,” he said.

When everyone finished, the wise man mixed all the papers in a basket, then said, “Keep this basket moving amongst you. Each of you will take a paper, and read it. You will then choose whether to keep your problems, or take the one given to you.”

Each person took a sheet of paper, read it, and was horrified. They concluded that what they had written, however bad it was, was not as serious as what ailed his neighbor. Two hours later, they exchanged papers amongst themselves, and each one had to put their personal problems back into his or her pocket, relieved that their distress was not as hard as they once thought.

Grateful for the lesson, they went down the mountain with the certainty that they were happier than all the others, and – fulfilling the promise made – never let anyone disturb the peace of the holy man.

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