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Posts tagged ‘समर्पण’

विनय और करूणा का पाठ – A Lesson into Humility and Kindness


sweet dreams by alice popkorn

एक युवक ने किसी बड़ी कंपनी में मैनेजर के पद के लिए आवेदन किया. उसने पहला इंटरव्यू पास कर लिया और उसे फाइनल इंटरव्यू के लिए कंपनी के डाइरेक्टर के पास भेजा गया. डाइरेक्टर ने युवक के CV में देखा कि उसकी शैक्षणिक योग्यताएं शानदार थीं.

डाइरेक्टर ने युवक से पूछा, “क्या तुम्हें स्कूल-कॉलेज में स्कॉलरशिप मिलती थी”?

“नहीं”, युवक ने कहा.

“तुम्हारी फीस कौन भरता था?”

“मेरे माता-पिता काम करते थे और मेरी फीस चुकाते थे.”

“वो क्या काम करते थे?”

“वो कपड़ों की धुलाई करते थे… अभी भी यही काम करते हैं.”

डाइरेक्टर ने युवक से अपने हाथ दिखाने के लिए कहा. युवक ने डाइरेक्टर को अपने हाथ दिखाए. उसके हाथ बहुत सुंदर और मुलायम थे.

“क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपने मता-पिता की मदद नहीं की?”

“कभी नहीं. वे यही चाहते थे कि मैं बहुत अच्छे से पढाई करूं. मुझे यह काम करते नहीं बनता था और वे इसे बड़ी तेजी से कर सकते थे.”

डाइरेक्टर ने युवक से कहा, “तुम एक काम करो… आज जब तुम घर जाओ तो अपने माता-पिता के हाथ साफ करो और कल मुझसे फिर मिलो.”

युवक उदास हो गया. जब वह अपने घर पहुंचा, उसने अपने माता-पिता से कहा कि वह उनके हाथ धोना चाहता है. माता-पिता को सुनकर अजीब-सा लगा. वे झेंप गए लेकिन उन्हें मिलीजुली सुखकर अनुभूतियां भी हुईं. युवक ने इनके हाथों को अपने हाथ में लेकर साफ करना शुरु किया. उसकी आंखों से आंसू बहने लगे.

जीवन में पहली बार उसे यह अहसास हुआ कि उसके माता-पिता के हाथ झुर्रियों से भर गए थे और ज़िंदगी पर कठोर काम करने के कारण वे रूखे और चोटिल हो गए थे. उन हाथों के जख्म इतने नाज़ुक थे कि सहलाने पर उनमें टीस उठने लगी.

पहली मर्तबा युवक को यह बात गहराई से महसूस हुई कि उसे पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाने के लिए उसके माता-पिता इस उम्र तक कपड़े धोते रहे ताकि उसकी फीस चुका सकें. माता-पिता ने अपने हाथों के जख्मों से अपने बेटे की स्कूल-कॉलेज की पढाई की फीस चुकाई और उसकी हर सुख-सुविधा का ध्यान रखा.

उनके हाथ धोने के बाद युवक ने खामोशी से धुलने से छूट गए कपड़ों को साफ किया. उस रात वे तीनों साथ बैठे और देर तक बातें करते रहे.

अगले दिन युवक डाइरेक्टर से मिलने गया. डाइरेक्टर ने युवक की आंखों में नमी देखी और उससे पूछा, “अब तुम मुझे बताओ कि तुमने घर में कल क्या किया और उससे क्या सीख ली?”

युवक ने कहा, “मैंने उनके हाथ धोए और धुलाई का बचा हुआ काम भी निबटाया. अब मैं जान गया हूं कि उनकी करुणा का मूल्य क्या है. यदि वे यह सब न करते तो मैं आज यहां आपके सामने साथ नहीं बैठा होता. उनके काम में उनकी मदद करके ही मैं यह जान पाया हूं कि अपनी हर सुख-सुविधा को ताक पर रखकर परिवार के हर सदस्य का ध्यान रखना और उसे काबिल बनाना बहुत महत्वपूर्ण बात है और इसके लिए बड़ा त्याग करना पड़ता है.”

डाइरेक्टर ने कहा, “यही वह चीज है जो मैं किसी मैनेजर में खोजता हूं. मैं उस व्यक्ति को अपनी कंपनी में रखना चाहता हूं जो यह जानता हो कि किसी भी काम को पूरा करने के लिए बहुत तकलीफों से गुज़रना पड़ता है. इस बात को समझने वाला व्यक्ति अधिक-से-अधिक रुपए-पैसे कमाने की होड़ में अपने जीवन को व्यर्थ नहीं करेगा. मैं तुम्हें नौकरी पर रखता हूं.”

(~_~)

जिन बच्चों को बहुत जतन और एहतियात सा पाला पोसा जाता है और जिनकी सुख-सुविधा में कभी कोई कोर-कसर नहीं रखी जाती, उन्हें यह लगने लगता है कि उनका हक हर चीज पर है और उन्हें उनकी पसंद की चीज किसी भी कीमत पर सबसे पहले मिलनी चाहिए. ऐसे बच्चे अपने माता-पिता की मेहनत और उनके समर्पण का मूल्य नहीं जानते.

यदि हम भी अपने बच्चों की हर ख़्वाहिश को पूरा करके उन्हें खुद से पनपने का मौका नही दे रहे हैं तो हम उनकी आनेवाली ज़िंदगी को बिगाड़ रहे हैं. उन्हें बड़ा घर, महंगे खिलौने, और शानदार लाइफस्टाइल देना ही पर्याप्त नहीं है, उन्हें रोजमर्रा के काम खुद से करने के लिए प्रेरित करना चाहिए. उन्हें सुविधापूर्ण जीवन का गुलाम नहीं बनाना चाहिए. उनमें यह आदत डालनी चाहिए कि वे अपना भोजन कभी नहीं छोड़ें, अन्न का तिरस्कार नहीं करें और अपनी थाली खुद धोने के लिए रखने जाएं.

हो सकता है कि आपके पास अपने बच्चों की सभी ज़रूरतें पूरा करने के लिए बहुत अधिक पैसा हो और घर में नौकर-चाकर लगें हों लेकिन उनमें दूसरों के प्रति संवेदना पनपाने के लिए आपको ऐसे कदम ज़रूर उठाने चाहिए. उन्हें यह समझना चाहिए कि उनके माता-पिता कितने भी संपन्न हों लेकिन एक दिन वे भी सबकी तरह बूढ़े हो जाएंगे और शायद उन्हें दूसरों की सहायता की ज़रूरत पड़ेगी.

सभी बच्चों में यह बात विकसित करनी चाहिए कि वे दुनिया के हर व्यक्ति की जरूरतों, प्रयासों, और कठिनाइयों को समझें और उनके साथ मिलकर चलना सीखें ताकि हर व्यक्ति का हित हो.

(हिंदीज़ेन पर ही यह भी पढ़ें “प्रार्थना के हाथ“)


One young man went to apply for a managerial position in a big company. He passed the initial interview, and now would meet the director for the final interview. The director discovered from his CV that the youth’s academic achievements were excellent.

He asked, “Did you obtain any scholarships in school?”

The youth answered, “NO”.

“Who paid for your school fees?”

“My parents”, he replied.

“Where did they work?”

“They worked as clothes cleaner… they still do”

The director requested the youth to show his hands. The youth showed his hands that were smooth and perfect.

“Have you ever helped your parents wash the clothes?”

“Never, my parents always wanted me to study and read more books. Besides, they could wash clothes faster than me.”

The director said, “I have a request. When you go home today, go and clean hand of your parents. See me tomorrow morning.”

The youth felt dejected. When he went back home, he asked his parents to let him clean their hands. His parents felt strange, happy but with mixed feelings. They showed their hands to their son. The youth cleaned their hands slowly. His tear fell as he did that.

It was the first time he noticed that his parents hands were so wrinkled, and there were so many bruises in their hands. Some bruises were so painful that they winced when he touched it. This was the first time the youth realized that it was this pair of hands that washed the clothes everyday to enable him to pay the school fees. The bruises in the hands were the price that the parents had to pay for his education, his school activities and his future.

After cleaning his parents hands, the youth quietly washed all the remaining clothes for them. That night, parents and son talked for a very long time.

Next morning, the youth went to the director’s office. The Director noticed the tears in the youth’s eyes, and asked, “tell me what have you done and learned yesterday in your house?”

The youth answered, “I cleaned my parents hand, and also finished cleaning all the remaining clothes. I now know what appreciation is. Without my parents, I would not be who I am today. By helping my parents, only now do I realize how difficult and tough it is to get something done on your own And I have come to appreciate the importance and value of helping one’s family.”

The director said, “this is what I am looking for in a manager. I want to recruit a person who can appreciate the help of others, a person who knows the sufferings of others to get things done, and a person who would not put money as his only goal in life. You are hired.”

प्रार्थना : प्रेम और समर्पण


प्रार्थना क्या है? – प्रेम और समर्पण. जहां प्रेम नहीं है, वहां प्रार्थना नहीं है.

प्रेम के स्मरण में एक अद्भुत घटना का उल्लेख है. नूरी, रक्काम एवं कुछ अन्य सूफी फकीरों पर काफिर होने का आरोप लगाया गया था और उन्हें मृत्यु दण्ड दिया जा रहा था.

जल्लाद जब नंगी तलवार लेकर रक्काम के निकट आये, तो नूरी ने उठकर स्वयं को अपने मित्र के स्थान पर अत्यंत प्रसन्नता और नम्रता के साथ पेश कर दिया. दर्शक स्तब्ध रह गये. हजारों लोगों की भीड़ थी. उनमें एक सन्नाटा दौड़ गया. जल्लाद ने कहा, “हे युवक, तलवार ऐसी वस्तु नहीं है, जिससे मिलने के लिए लोग इतने उत्सुक और व्याकुल हों. और फिर तुम्हारी अभी बारी भी नहीं आयी है.”

और, पता है कि फकीर नूरी ने उत्तर में क्या कहा? उसने कहा, “प्रेम ही मेरा धर्म है. मैं जानता हूं कि जीवन संसार में सबसे मूल्यवान वस्तु है, लेकिन प्रेम के मुकाबले वह कुछ भी नहीं है. जिसे प्रेम उपलब्ध हो जाता है, उसके लिए जीवन खेल से ज्यादा नहीं है. संसार में जीवन श्रेष्ठ है लेकिन प्रेम जीवन से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि वह संसार का नहीं, सत्य का अंग है. और प्रेम कहता है कि जब मृत्यु आये, तो अपने मित्रों के आगे हो जाओ और जब जीवन मिलता हो तो पीछे. इसे हम प्रार्थना कहते हैं.”

प्रार्थना का कोई ढांचा नहीं होता है. वह तो हृदय का सहज अंकुरण है. जैसे पर्वत से झरने बहते हैं, ऐसे ही प्रेम-पूर्ण हृदय से प्रार्थना का आविर्भाव होता है.

ओशो के पत्रों के संकलन ‘पथ के प्रदीप’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेंद्र

समर्पण


सुबह के साढ़े आठ बजे थे. अस्पताल में बहुत से मरीज़ थे. ऐसे में एक बुजुर्गवार अपने अंगूठे में लगे घाव के टाँके कटवाने के लिए बड़ी उतावली में थे. उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें ठीक नौ बजे एक बहुत ज़रूरी काम है.

मैंने उनकी जांच करके उन्हें बैठने के लिए कहा. मुझे पता था कि उनके टांकों को काटनेवाले व्यक्ति को उन्हें देखने में लगभग एक घंटा लग जाएगा. वे बेचैनी से अपनी घड़ी बार-बार देख रहे थे. मैंने सोचा कि अभी मेरे पास कोई मरीज़ नहीं है इसलिए मैं ही इनके टांकों को देख लेता हूँ.

घाव भर चुका था. मैंने एक दूसरे डॉक्टर से बात की और टांकों को काटने एवं ड्रेसिंग करने का सामान जुटा लिया.

अपना काम करने के दौरान मैंने उनसे पूछा – “आप बहुत जल्दी में लगते हैं? क्या आपको किसी और डॉक्टर को भी दिखाना है?”

बुजुर्गवार ने मुझे बताया कि उन्हें पास ही एक नर्सिंग होम में भर्ती उनकी पत्नी के पास नाश्ता करने जाना है. मैंने उनसे उनकी पत्नी के स्वास्थ्य के बारे में पूछा. उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी ऐल्जीमर की मरीज है और लम्बे समय से नर्सिंग होम में ही रह रही है.

बातों के दौरान मैंने उनसे पूछा कि उन्हें वहां पहुँचने में देर हो जाने पर वह ज्यादा नाराज़ तो नहीं हो जायेगी.

उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी उन्हें पूरी तरह से भूल चुकी है और पिछले पांच सालों से उन्हें पहचान भी नहीं पा रही है.

मुझे बड़ा अचरज हुआ. मैंने उनसे पूछा – “फिर भी आप रोज़ वहां उसके साथ नाश्ता करने जाते हैं जबकि उसे आपके होने का कोई अहसास ही नहीं है!?”

वह मुस्कुराए और मेरे हाथ को थामकर मुझसे बोले:

“वह मुझे नहीं पहचानती पर मैं तो यह जानता हूँ न कि वह कौन है!”

लेखक – अज्ञात

आस्था और विश्वास


everestपर्वतारोहियों का एक दल एक अजेय पर्वत पर विजय पाने के लिए निकला. उनमें एक अतिउत्साही पर्वतारोही भी था जो यह चाहता था कि पर्वत के शिखर पर विजय पताका फहराने का श्रेय उसे ही मिले. रात्रि के घने अन्धकार में वह अपने तम्बू से चुपके से निकल पड़ा और अकेले ही उसने पर्वत पर चढ़ना आरंभ किया. गहरी काली रात में, जब हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था, वह शिखर की ओर बढ़ता रहा. बहुत प्रयास करने के बाद शिखर जब कुछ ही दूर प्रतीत हो रहा था तभी अचानक उसका पैर फिसला और वह तेजी से नीचे की तरफ गिरने लगा. उसे अपनी मृत्यु सामने ही दिख रही थी लेकिन उसकी कमर से बंधी रस्सी ने झटके से उसे रोक दिया. घने अन्धकार में उसे नीचे कुछ नहीं दिख रहा था. रस्सी को जकड़कर ऊपर पहुँच पाना संभव नहीं था. बचने की कोई सूरत न पाकर वह चिल्लाया: – ‘हे ईश्वर… मेरी मदद करो!’

तभी अचानक एक गंभीर स्वर कहीं गूँज उठा – “तुम मुझ से क्या चाहते हो?”

पर्वतारोही बोला – “हे ईश्वर! मेरी रक्षा करो!”

“क्या तुम्हें सच में विश्वास है कि मैं तुम्हारी रक्षा कर सकता हूँ ?

“हाँ ईश्वर! मुझे तुम पर पूरा विश्वास है” – पर्वतारोही बोला.

“ठीक है, अगर तुम्हें मुझ पर विश्वास है तो अपनी कमर से बंधी रस्सी काट दो…..”

यह सुनकर पर्वतारोही का दिल डूबने लगा. कुछ क्षण के लिए वहाँ एक चुप्पी सी छा गई और उस पर्वतारोही ने अपनी पूरी शक्ति से रस्सी को पकड़े रहने का निश्चय कर लिया.

अगले दिन बचाव दल को एक रस्सी के सहारे लटका हुआ पर्वतारोही का ठंड से जमा हुआ शव मिला. उसके हाथ रस्सी को मजबूती से थामे थे और वह धरती से केवल दस फुट की ऊँचाई पर था. यदि उसने रस्सी को छोड़ दिया होता तो वह पर्वतीय ढलान से लुढ़कता हुआ मामूली नुकसान के साथ जीवित बच गया होता.

ईश्वर में सम्पूर्ण आस्था और विश्वास रखना सहज नहीं है. ऐसी दशा में क्या आप अपनी रस्सी छोड़ देते?

(A story of a mountaineer – doubt – submission – in Hindi)

इच्छाशक्ति और लगन का करिश्मा


1883 में अमेरिका में एक जॉन रैम्ब्लिंग नामक एक इंजीनियर को न्यू यार्क और लॉन्ग आईलेंड को जोड़ने वाले एक भव्य पुल को बनाने का विचार आया. इस बारे में जब दूसरे इंजीनियरों को पता चला तो उन्होंने जॉन रैम्ब्लिंग की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि ऐसा पुल बनाना असंभव था. उन्होंने जॉन रैम्ब्लिंग से कहा कि वह अपना विचार त्याग दे. ऐसा हो ही नहीं सकता था. किसी ने ऐसा करने का प्रयास भी कभी नहीं किया था.

जॉन रैम्ब्लिंग ने अपने मन में उस भव्य पुल की जो छवि बनाई थी उसे वह मिटाने के लिए तैयार नहीं थे. उनका ह्रदय कहता था कि ऐसा हो सकता था. कोई भी उनके विचार का महत्त्व नहीं समझ पा रहा था. किसी तरह उन्होंने अपने अड़ियल पुत्र वाशिंगटन को इस हेतु राजी कर लिया. दोनों ने मिलकर पुल बनाने की योजना पर काम शुरू कर दिया.

दोनों ने रात दिन एक करके पुल के सैंकडों नक्शे बनाए और उन सभी व्यवधानों के बारे में भी सोचा जो उनके मार्ग में आड़े आ सकती थे. अपूर्व उत्साह और लगन से एवं चुनौतिपूर्वक उन्होंने अपने दल का चुनाव किया और पुल बनाने के काम में जुट गए.

काम ठीकठाक शुरू हुआ लेकिन कुछ महीने ही गुज़रे थे कि निर्माणस्थल पर एक दुखद हादसे में जॉन रैम्ब्लिंग की मृत्यु हो गयी. वाशिंगटन भी जख्मी हो गया था और उसके मष्तिष्क को आघात पहुंचा था. अब वह चलने-फिरने और बात करने लायक नहीं रहा.

“हमने तो उन्हें पहले ही चेतावनी दे दी थी.”
“मूर्ख लोग अपने पागलपन भरे सपने को पूरा करने में लगे हैं”.
“ऐसे असंभव लक्ष्य का पीछा करना नामुमकिन है.”

और ऐसी ही अनेक बातें उनके बारे में लोग करने लगे. शायद ही कोई हो जिसने उनके हौसले की तारीफ की हो. दूसरे इंजीनियरों ने कहा कि उन्हें अब काम समेट लेना चाहिए क्योंकि जॉन रैम्ब्लिंग ही था जो पुल बनाने के बारे में कुछ जानता था.

अपनी नई-नई शारीरिक असमर्थता के बावजूद वाशिंगटन हतोत्साहित नहीं हुआ और अब वह दुगनी लगन से अपने पिता के सपने को पूरा करने की दिशा में सोचने लगा, हांलाकि पुल कैसे बनेगा उसे भी इसका पता नहीं था. उसका शरीर ध्वस्त हो चुका था लेकिन उसका दिमाग अभी भी पहले की भांति तीक्ष्ण था. उसने अपने कुछ मित्रो को सहयोग करने के लिए कहवाया  लेकिन वे भी इस उद्देश्य के प्रति शंकालु थे.

अस्पताल में अपने कमरे में लेटे हुए खिड़की से आती हुई सूरज की किरणों को वह देख रहा था. कमरे के भीतर मंद-मंद आती हवा खिड़की के परदे को थिरका रही थी और उसे बाहर आसमान में एक पेड़ की शाखाएँ हवा में डोलती दिख रही थीं. इस सबने उसके मन में एक अद्भुत विचार को जन्म दिया. उसने अपनी एक उंगली हिलाने की कोशिश की और इस प्रकार उसे अपनी पत्नी से संवाद स्थापित करने का तरीका सूझ गया.

उसने अपनी पत्नी के हाथ को उंगली से छूकर उसे यह बताया की वह अपने दल से मिलना चाहता है. फिर उसने पत्नी के हाथ पर उँगलियों की थिरकन से उसे यह बताया की इंजीनियरों को क्या करना चाहिए. यह सब बहुत बेतुका प्रतीत हो रहा था लेकिन काम किसी तरह फिर से शुरू हो चुका था.

अगले 13 सालों तक वाशिंगटन अपनी पत्नी की बांह पर अपनी उँगलियों से दर्शाकर निर्देश देता रहा. अंततः पुल बन गया. आज वह भव्य ब्रुकलिन पुल अपनी विराटता और कारीगरी से देखनेवालों को मंत्रमुग्ध कर देता है. वह हमें बताता है कि मनुष्य की अदम्य इच्छाशक्ति और लगन के सामने परिस्थितियां भी हार मान लेती हैं. साथ ही वह हमें उन जीवट वाले लोगों के बारे में भी बताता है जिन्हें दुनिया पागल समझती थी. वह उस स्त्री के अपने पति के लिए प्रेम और समर्पण की कहानी भी सुनाता है जो सालों तक अपनी बांहों पर अपने विकलांग पति के संदेशों को उसकी उंगली की थिरकन से समझ-समझ कर इंजीनियरों को बताती रही कि उन्हें क्या करना है.

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यह सच्ची कहानी शारीरिक असमर्थता पर विजय और असंभव लक्ष्य को संभव बनाने का सन्देश देती है. हमारे रोजमर्रा के जीवन में भी हमारे सामने कितनी ही बाधाएं और चुनौतियाँ आती हैं जो बहुत मामूली होती हैं. संसार में अब तक हजारों-लाखों लोग उनसे भी कहीं विराट और विकराल मुश्किलों से जूझे हैं और उन्होंने उनपर विजय पाई है. अपनी लगन और परिश्रम से अपने सपने को पूरा करने में लगे रहनेवाले व्यक्ति को किस्मत भी परास्त नहीं कर सकती.


(ब्रुकलिन ब्रिज का चित्र विकिपीडिया से लिया गया है)

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