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सही समय : The Right Time

camels

ऊंटों का एक व्यापारी किसी गांव में बहुत उम्दा ऊंट वाजिब दाम पर बेचने के लिए आया. गांव में हूसेप नामक व्यक्ति को छोड़कर लगभग सभी ने कम-से-कम एक ऊंट खरीद लिया.

कुछ समय बाद एक और व्यापारी बहुत अच्छे ऊंट बेचने के लिए गांव में आया… लेकिन उसके ऊंट बहुत महंगे थे.

इस बार हूसेप ने कुछ ऊंट खरीद लिए. किसी और ने ऊंट खरीदने की हिम्मत नहीं की.

“पिछली बार तो ऊंट कौड़ियों के मोल मिल रहे थे. तब तुमने एक भी ऊंट नहीं खरीदा, लेकिन इस बार तुमने लगभग दुगनी कीमत पर ऊंट खरीद लिए,” हूसेप के दोस्त ने हैरत से पूछा.

“वे सस्ते ऊंट मेरे लिए बहुत महंगे थे क्योंकि उन दिनों मेरे पास बिल्कुल भी पैसे नहीं थे,” हूसेप ने कहा, “और ये ऊंट तुम्हें बहुत महंगे लग रहे हैं लेकिन मेरे लिए ये सस्ते हैं क्योंकि अब मेरे पास उन्हें खरीदने के लिए काफ़ी रुपये हैं.”

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A camel dealer reached a village to sell fine animals at a very good price. Everyone bought one, except Mr. Hoosep.

Some time later, the village received a visit from another dealer, with excellent camels, but they were much more expensive.

This time, Hoosep bought some animals. Others in the village could not afford those camels.

“You did not buy the camels when they were almost for free, and now you pay almost twice the price,” criticized his friends.

“Those cheap ones were very expensive for me, because at that time I had very little money,” answered Hoosep, “these animals might seem more expensive, but for me they are cheap, because I have more than enough to buy them.”

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भविष्य में छलांग

मैंने सुना है, एक वृद्ध व्यक्ति हवाईजहाज से न्यूयार्क जा रहा था. बीच के एक एयरपोर्ट पर एक युवक भी उसमें सवार हुआ. उस युवक के बैग को देखकर लगता था कि वह शायद किसी इंश्योरेंस कंपनी का एक्जीक्यूटिव था. युवक को उस वृद्ध व्यक्ति के पास की सीट मिली.

कुछ देर चुपचाप बैठे रहने के बाद उसने वृद्ध से पूछा, “सर, आपकी घड़ी में कितना समय हुआ है?”

वृद्ध कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “माफ़ करें, मैं नहीं बता सकता”.

युवक ने कहा, “क्या आपके पास घड़ी नहीं है?”

वृद्ध ने कहा, “घड़ी तो है, लेकिन मैं थोड़ा आगे का भी विचार कर लेता हूं, तभी कुछ करता हूं. अभी तुम पूछोगे ‘कितना बजा है’ और मैं घड़ी में देखकर बता दूगा. फिर हम दोनों के बीच बातचीत शुरु हो जाएगी. फिर तुम पूछोगे, ‘आप कहां जा रहे हैं’?. मैं कहूंगा, न्यूयार्क जा रहा हूं. तुम कहोगे, ‘मैं भी जा रहा हूं. आप किस मोहल्ले में रहते हैं’. तो मैं अपना मोहल्ला बताऊंगा. संकोचवश मुझे तुमसे कहना पड़ेगा कि अगर कभी वहां आओ तो मेरे यहाँ भी आ जाना. मेरी लड़की जवान और सुन्दर है. तुम घर आओगे, तो निश्चित ही उसके प्रति आकर्षित हो जाओगे. तुम उससे फिल्म देखने चलने के लिए कहोगे और वह भी राजी हो जाएगी. और एक दिन यह मामला इतना परवान चढ़ जाएगा कि मुझे विचार करना पड़ेगा कि मैं अपनी लड़की की शादी एक बीमा एजेंट से करने के लिए हामी भरूँ या नहीं क्योंकि मुझे बीमा एजेंट बिलकुल भी पसंद नहीं आते. इसलिए कृपा करो और मुझसे समय मत पूछो”

हम सभी इस आदमी पर हंस सकते हैं लेकिन हम सब इसी तरह के आदमी हैं. हमारा चित्त प्रतिपल वर्तमान से छिटक जाता है और भविष्य में उतर जाता है. और भविष्य के संबंध में आप कुछ भी सोचें, सब कुछ ऐसा ही बचकाना और व्यर्थ है, क्योंकि भविष्य कुछ है ही नहीं. जो कुछ भी आप सोचते हैं वह सब कल्पना मात्र ही है. जो भी आप सोचेंगे, वह इतना ही झूठा और व्यर्थ है जैसे इस आदमी का इतनी छोटी सी बात से इतनी लंबी यात्रा पर कूद जाना. इसका चित्त हम सबका चित्त है.

हम वर्तमान पर अपनी पूरी पकड़ से टिकते नहीं हैं और भविष्य या अतीत में कूद जाते हैं. जो क्षण हमारे सामने मौजूद है उसमें हम मौजूद नहीं हो पाते, लेकिन इसी क्षण की सत्ता है, वही वास्तविक है. अतीत और भविष्य इन दोनों के बंधनों में मनुष्य की चेतना वर्तमान से अपरिचित रह जाती है. अतीत और भविष्य दोनों मनुष्य की ईजाद हैं. जगत की सत्ता में उनका कोई भी स्थान नहीं, उनका कोई भी अस्तित्व नहीं.

भविष्य और अतीत कल्पित समय हैं, स्यूडो टाइम हैं, वास्तविक समय नहीं. वास्तविक समय तो केवल वर्तमान का क्षण है. वर्तमान के इस क्षण में जो जीता है, वह सत्य तक पहुंच सकता है, क्योंकि वर्तमान का क्षण ही द्वार है. जो अतीत और भविष्य में भटकता है, वह सपने देख सकता है, स्मृतियों में खो सकता है, लेकिन सत्य से उसका साक्षात कभी भी संभव नहीं है.

प्रस्तुति : ओशो शैलेन्द्र.

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Franklin’s Lesson on the Value of Time – बेंजामिन फ्रेंकलिन और समय की कीमत

485px-Benjamin_Franklin_by_Joseph_Siffred_Duplessisबेंजामिन फ्रेंकलिन की किताबों की दुकान थी. एक दिन उनकी दुकान पर एक ग्राहक आया. कुछ किताबें देखने के बाद उसने दुकान के एक कर्मचारी से पूछा – “इस किताब की कीमत क्या है?”

कर्मचारी ने कहा – “एक डॉलर”.

ग्राहक ने कहा – “यह तो ज्यादा है. कुछ कम नहीं हो सकता क्या?”

कर्मचारी ने स्पष्ट कहा – “नहीं”.

ग्राहक ने कहा – “क्या बेन फ्रेंकलिन यहाँ हैं? मैं उनसे मिलना चाहता हूँ”.

वे अभी आने वाले हैं” – कर्मचारी ने कहा.

फ्रेंकलिन के आने के बाद ग्राहक ने उनसे पूछा – “इस किताब की कम-से-कम कीमत क्या होगी?”

फ्रेंकलिन ने कहा – “सवा डॉलर”.

ग्राहक ने आश्चर्य से कहा – “लेकिन आपकी दुकान के कर्मचारी ने तो इसकी कीमत एक डॉलर बताई है!”

“उसने ठीक बताया है. चौथाई डॉलर मेरे समय की कीमत है”.

ग्राहक ने आग्रह किया – “ठीक है. अब आप इसकी सही कीमत बता दीजिये”.

“अब डेढ़ डॉलर. आप लेने में जितनी देर करते जायेंगे, समय का मूल्य भी इसमें जुड़ता जायेगा”.

ग्राहक के पास अब कोई रास्ता न था. एक डॉलर के बदले डेढ़ डॉलर देकर उसने वह किताब खरीद ली. किताब के साथ ही उसे समय का मूल्य भी ज्ञात हो गया.

समय के महत्त्व को जानने वाले यही बेंजामिन फ्रेंकलिन अमेरिका के महान वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ और चिन्तक बने.

चित्र साभार : विकिपीडिया

(A motivational / inspiring anecdote of Benjamin Franklin – value of time – in Hindi)

This story from the life of Benjamin Franklin is a great reminder and perhaps even motivator for us to always place a value on our time, even if only to charge ourselves. Franklin not only understood the value of time, but he put a price upon it that made others appreciate its worth.

A customer who came one day to his little bookstore in Philadelphia, not being satisfied with the price demanded by the clerk for the book he desired, asked for the owner. “Mr. Franklin is very busy just now in the press room,” replied the clerk. The potential customer, however, who had already spent an hour aimlessly turning over books, insisted on seeing him. In answer to the clerk’s summons, Mr. Franklin hurried out from the newspaper office in the back of the store.

“What is the lowest price you can take for this book, sir?” asked the leisurely customer, holding up the volume. “A dollar and a quarter,” was the prompt reply. “A dollar and a quarter! Why, your clerk offered it to me for only a dollar just now.” “True,” said Franklin, “and I could have afforded to take a dollar before having to leave my work.”

The man, who seemed to be in doubt as to whether Mr. Franklin was in serious, said jokingly, “Well, come now, tell me your lowest price for this book.” “A dollar and a half,” was the grave reply. “A dollar and a half! Why, you just offered it for a dollar and a quarter.” “Yes, and I could have taken that price then, but I need a dollar and a half now.”

Without another word, the purchaser, disappointed with his attempt, laid the money on the counter and left the store. He had learned not only that he who squanders his own time is foolish, but that he who wastes the time of others is a thief.

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